वचनों की दरिद्रता, स्थानीय बोली व राजनीति

विषैले शब्दों के कारण राजनीति में कटुता बढ़ती जा रही है। तभी बाल्यकाल से विद्धतजन निरंतर हमें स्मरण कराते रहे हैं कि

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।

तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥

प्रियवचनों से सभी संतुष्ट होते है, इस लिए प्रिय ही बोलना । बोलने में क्यों दरिद्री बनना ?

सत्य तो यही है कि शब्दों की दरिद्रता के कारण समाज में वैमस्यनता उत्पन्न हो रही है। राजनेता,अभिनेता पत्रकार और अन्य विद्धतजनों को सामाजिक क्षेत्र में रहते हुए विवादित विषयों पर टिप्पणी करते समय वाणी पर संयम रखना चाहिए। राजनीतिक कारणों से ऐसा नहीं हो पा रहा है। महाराष्ट्र के एक समाचार पत्र में द्विअर्थी शीर्षक उखाड़ दिया प्रकाशित हुआ। निश्चय ही ऐसे शब्दों के उपयोग से पत्रकारिता की गरिमा को आघात पहुंचता है।

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मौत के कारणों की जांच को लेकर राजनीति गर्माई हुई है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोग एक-दूसरे पर लांछन लगा रहे हैं। शब्दों की मर्यादा होती है। मुंबई में अभिनेत्री कंगना रनौत को कार्यालय को राजनीतिक कारणों से ध्वस्त कराया गया। क्रोध में कंगना ने महाराष्ट्र के माननीय मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को तू कह दिया। अब ठाकरे जी को तू कहने पर तूफान खड़ा कर दिया गया।

राजनीति और मीडिया में कहा जा रहा है कि कंगना ने महाराष्ट्र के अंगना में तू कहकर उद्धव ठाकरे का अपमान किया है। अब यहां स्थानीय बोलचाल का असर भी उठता है। क्रोध और दुख में हम अपनी ही बोलचाल की भाषा में बात करते हैं। आप उसे मुंबई में घुसने पर चुनौती दे रहे हैं। एक ही नोटिस में उसके कार्यालय को ध्वस्त कर दिया गया। शिवसेना के एक नेता ने कंगना को हरामखोर तक कह दिया। कंगना पर तमाम आरोप लगाने के बाद अगर उसने तू कह किया तो आप उद्धव ठाकरे का अपमान करन का आरोप लगा रहे हो। जिन शिवाजी को लेकर शिवसेना राजनीति करने की बात करती है, उन्होंने तो शत्रुपक्ष की महिलाओं तक का अपमान नहीं होने दिया था। इतिहास में दर्ज है कि मराठे किसी मुस्लिम महिला को उठा लाए तो शिवाजी ने उसे ससम्मान विदा किया। यहां तो आपने महिलाओं को पूरी अस्मिता को ही तार-तार कर दिया।

हम अगर कंगना के तू कहने पर बात करें तो यह उनके इलाके की सामान्य बोलचाल का हिस्सा है। हरियाणा और पश्चिम उत्तर में तू-तड़ाक की भाषा ही चलती है। कंगना पर भी स्थानीय बोलचाल का असर रहा होगा। हरियाणा विधानसभा के 2014 के चुनाव में भाजपा की तरफ से मुझे चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा गया था।  हरियाणा में कार्य करने के दौरान हम मालवावासियों को वहां के लोगों का तू कहना बुरा लगता था। मैं सब को आप कहकर संबोधित करता था और वहां के लोग लाड़ जताते हुए तू ही कहते थे।

शुरुआत में तो बुरा लगा पर लोगों ने बताया कि यहां तो नू ही बोल्ले हैं। मेरे सामने ही लोग अपने पिता या ताऊ से तू कहकर ही बात करते थे। अरे ताऊ कित जा रहा है, कुछ इसी तरह बोलते थे। बाद में समझ आया कि हरियाणा में इसी तरह बोला जाता है। हरियाणा और आसपास के इलाकों में तू और तुम वरिष्ठजनों के साथ भी उपयोग किया जाता है।

लोग बताते हैं कि दिल्ली पुलिस और दिल्ली परिवहन निगम की बसों में हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश कर्मचारी बड़ी संख्या में हैं। उनकी बोलचाल की भाषा को लेकर वरिष्ठ अधिकारी भी कई बार असहज महसूस करते हैं। एक बार सड़क मार्ग से मथुरा से दिल्ली जाते समय कार खराब हो गई। एक ढाबे पर रुके तो नट-नटनिया आकर अपने करतब दिखाने लगे। एक नट बोला यह हमारा लौंडा बहुत अच्छे करतब दिखाता है। बेटे को लौंडा कहने पर मुझे बहुत खराब भी लगा। बाद में बातचीत करने पर पता चला कि कुछ इलाकों में लड़के को लौंडा और लड़की को लौंडिया कहा जाता है। मुझे हैरानी भी हुई कि ब्रज क्षेत्र में जहां लल्ला-लल्ली और लाला-लाली बोलते हैं, वहां इस तरह बोला जाता है।

कंगना की तू तड़ाक की भाषा के विवाद को दरकिनार करते हुए यह आवश्यकता है कि मुद्दे की गंभीरता को समझा जाए। शिवसेना की तरफ से जो गलतियां की गई हैं उन्हें कंगना के तू कहने से दबाया नहीं जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के कारणों का खुलासा होना चाहिए।

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