mantr drashta rshi atriशिक्षा, तप, यज्ञ मन्त्र द्रष्टा ऋषि अत्रि
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शिक्षा, तप, यज्ञ मन्त्र द्रष्टा ऋषि अत्रि

mantr drashta rshi atri

श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को नमन – 5:  तपस्या, शौच, संतोष, अपरिग्रह, अनासक्ति तथा विश्व कल्याण की उदात्त भावना से परिपूर्ण मन्त्र द्रष्टा ऋषि अत्रि ने न केवल भारतीय सभ्यता- संस्कृति, ज्ञान- विज्ञान के अभ्युदय के क्षेत्र में महती भूमिका का निर्वहन कर वैदिक विचारधारा का प्रचार- प्रसार किया, बल्कि देश में कृषि के विकास में भी पृथु और ऋषभ की भांति महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। अत्रियों ने ही सर्वप्रथम यज्ञ के प्रचार के लिए सिन्धु पार कर वर्तमान के इरान तक जाकर भारतीय सभ्यता- संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया। अत्रि के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रचलित कथा के अनुसार ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूइया (अनुसूया) के पति थे। सृष्टि के प्रारम्भ में अत्रि- अनसुइया दम्पति को ब्रह्मा के द्वारा सृष्टि प्रवर्द्धन की आज्ञा दिए जाने पर इन्होंने उस ओर उन्मुख न हो तपस्या का ही आश्रय लिया। इनकी तपस्या से ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने प्रसन्न होकर इन्हें दर्शन दिया और दम्पति की प्रार्थना पर इनका पुत्र बनना स्वीकार किया।

कथा के अनुसार एक बार अत्रि के बाहर जाने पर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा माँगने पहुंचे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतारकर भिक्षा देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे। तब अनुसूया ने अपने सतीत्व के बल पर त्रिदेवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। श्रीमद्भागवत पुराण 4/1/33 के अनुसार अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में आविर्भूत हुए। एक अन्य मान्यतानुसार उनके तीन पुत्र- दत्तात्रेय, दुर्वासा और सोम माने गये हैं। शिक्षा, तप व यज्ञ के लिए समर्पित ऋषि अत्रि ज्योतिष से जुड़े अठारह ऋषियों में से एक थे। ऋषि अत्रि द्वारा ज्योतिष में शुभ मुहुर्त एवं पूजा अर्चना की विधियों का भी उल्लेख मिलता है। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था।

उल्लेखनीय है कि दस मंडलों में विभक्त ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा महर्षि अत्रि हैं, इसलिए पंचम मंडल को अत्रि ऋषि के नाम पर आत्रेय मंडल कहा जाता है। इस मंडल के 87 सूक्त में विशेष रूप से अग्नि, इन्द्र, मरूत, विश्वेदेव तथा सविता आदि देवों की महनीय स्तुतियाँ निबद्ध हैं, इन्द्र तथा अग्निदेवता के महनीय कर्मों का वर्णन है। पौराणिक ग्रन्थों में वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि महर्षि अत्रि के आविर्भाव व उनके चरित्र का बृहत रूप से वर्णन अंकित है। पुराणों के अनुसार महर्षि अत्रि ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं, और उनके चक्षु भाग से इनका प्रादुर्भाव हुआ। ये सोम के पिता थे जो इनके नेत्र से आविर्भूत हुए थे। अपने महान कार्यों के लिए सप्तर्षियों में परिगणित महर्षि अत्रि को प्रजापत्ति भी कहा गया है। इनकी पत्नी अनुसूया थी, जिससे उन्हें दत्तात्रेय नामक एक पुत्र हुआ। देवी अनुसूइया को पतिव्रताओं की आदर्शभूता और महान दिव्यतेज से सम्पन्न माना जाता है। महर्षि अत्रि जहाँ ज्ञान, तपस्या, सदाचार, भक्ति एवं मन्त्रशक्ति के मूर्तिमान स्वरूप हैं, वहीं देवी अनुसूइया पतिव्रता धर्म एवं शील की मूर्तिमती विग्रह हैं। वाल्मीकि रामायण में अंकित वर्णन के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने भक्त महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूइया की भक्ति को सफल करने स्वयं उनके आश्रम पर पधारे। माता अनुसूइया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया। अनुसुइया ने अपनी पतिव्रता शक्ति के बल पर ब्राह्मणी शैव्या के मृत पति को जीवित कराया तथा बाधित सूर्य को उदित कराकर संसार का कल्याण किया। सती अनुसूइया सोलह सतियों में से एक सर्वश्रेष्ठ थी। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता  संस्कृति में देवी अनुसूइया को बड़ा ही आदर, सम्मान व महत्व का स्थान प्राप्त है।

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असूइया नाम है परदोष दर्शन का, गुणों में भी दोष बुद्धि का और जो इन विकारों से रहित हो, वही अनसूया है। इसी प्रकार अत्रि शब्द भी अ+त्रि शब्दों के मिश्रण से बना है। अर्थात वे तीन गुण- सत्त्व, रजस, तमस गुणों से अतीत है, गुणातीत हैं। अत्रि दम्पति अपने नामानुरूप जीवन यापन करते हुए सदाचार परायण हो चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। रामचरितमानस 2/132/5-6 के अनुसार अत्रि पत्नी अनुसूया के तपोबल से ही भागीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और मंदाकिनी नाम से प्रसिद्ध हुई। पौराणिक ग्रन्थों में प्राप्त उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि प्रजापति महर्षि अत्रि ने ही अलर्क, प्रह्लाद आदि को अन्वीक्षकी विद्या प्रदान की थी। महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह के शर-शैय्या पर पड़े होने के समय ये उनसे मिलने गये थे। पुत्रोत्पत्ति के लिए इन्होंने ऋक्ष पर्वत पर पत्नी के साथ तप किया था। परीक्षित के प्रायोपवेश का अभ्यास करते समय भी अत्रि का उन्हें देखने जाने का उल्लेख प्राप्य है।

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इन्होंने दो बार पृथु को घोड़े चुराकर भागते हुए इन्द्र को दिखलाकर इन्द्र को उसकी हत्या करने के लिए उकसाया था। इसी प्रकार वैवस्वत युग के मुनि अत्रि ने मन्त्रकार के रूप में उत्तानपाद को अपने पुत्र के रूप में ग्रहण किया था। इनकी ब्रह्मवादिनी नाम की एक कन्या थी। परशुराम जब ध्यानावस्थित रूप में थे, उस समय ये उनके पास गये थे। इन्होंने श्राद्ध द्वारा पितरों की अराधना की थी और सोम को राजक्ष्मा रोग से मुक्त किया था। ब्रह्मा के द्वारा सृष्टि की रचना के लिए नियुक्त किये जाने पर इन्होंने अनुत्तम तप किया था, उस समय शिव इनसे मिले थे। सोम के राजसूय यज्ञ में इन्होंने होता का कार्य किया था। वैदिक यज्ञ परम्परा क इन्होने आजीवन प्रचार किया। त्रिपुर के विनाश के लिए इन्होंने शिव की आराधना की थी। बनवास के समय राम अत्रि के आश्रम भी गये थे।

यद्यपि वेदों में मनुष्य इतिहास की बात वैदिक विद्वान नहीं मानते, और वेदों में अत्रि सम्बन्धी पौराणिक वृत्तान्त यथावत नहीं मिलता है, कहीं-कहीं नामों में अन्तर भी है, तथापि ऋग्वेद में अत्रि:सांख्य: शब्द स्पष्ट रूप से अंकित है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 51वें तथा 112वें सूक्त में अंकित प्रसंगों के अनुसार महर्षि अत्रि को अश्विनीकुमारों की कृपा प्राप्त थी। एक बार जब ये समाधिस्थ थे, तब दैत्यों ने इन्हें उठाकर शतद्वार यन्त्र में डाल दिया और आग लगाकर इन्हें जलाने का प्रयत्न किया, किंतु समाधिस्थ होने के कारण अत्रि को उसका कुछ भी ज्ञान नहीं था। उस समय अश्विनीकुमारों ने वहाँ पहुँचकर इन्हें बचाया। ऋग्वेद के दशम मण्डल में महर्षि अत्रि के दीर्घ तपस्या के अनुष्ठान का वर्णन अंकित करते हुए कहा गया है कि यज्ञ तथा तप आदि करते-करते जब अत्रि वृद्ध हो गये, तब अश्विनीकुमारों ने इन्हें नवयौवन प्रदान किया। ऋग्वेद के पंचम मण्डल में अत्रि के वसूयु, सप्तवध्रि नामक अनेक पुत्रों का वृत्तान्त आया है, जो अनेक मन्त्रों के द्रष्टा ऋषि रहे हैं। इसी प्रकार अत्रि के गोत्रज आत्रेयगण ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों के द्रष्टा हैं। इससे स्पष्ट है कि वेद से लेकर महाकाव्यों और पुराणों तक में उल्लिखित अत्रि सम्बन्धी ये सभी वर्णन एक समय की और एक व्यक्ति की नहीं,वरन विभिन्न युगों अर्थात सतयुग, त्रेता, द्वापरादि युगों में हुए अत्रि अर्थात अत्रिकुल के विभिन्न ऋषियों की हैं, जिन्होंने भारतीय सभ्यता- संस्कृति के विकास में महती भूमिकाओं का निर्वहन किया।

ऋग्वेद के पंचम आत्रेय मंडल का कल्याण सूक्त ऋग्वेदीय स्वस्ति-सूक्त महर्षि अत्रि की ऋतम्भरा प्रज्ञा की ही देन है। कल्याण-सूक्त, मंगल-सूक्त तथा श्रेय-सूक्त के नाम से भी विख्यात यह सूक्त आज भी प्रत्येक मांगलिक कार्यों, शुभ संस्कारों तथा पूजा, अनुष्ठानों में स्वस्ति-प्राप्ति, कल्याण-प्राप्ति, अभ्युदय-प्राप्ति, भगवत्कृपा-प्राप्ति तथा अमंगल के विनाश के लिए सस्वर पाठ में प्रयोग होता है। इस मांगलिक सूक्त में अश्विनी, भग, अदिति, पूषा, द्यावा, पृथिवी, बृहस्पति, आदित्य, वैश्वानर, सविता तथा मित्रा वरुण और सूर्य-चंद्रमा आदि देवताओं से प्राणिमात्र के लिए स्वस्ति की प्रार्थना की गई है। इससे महर्षि अत्रि के उदात्त-भाव तथा लोक-कल्याण की भावना का परिचय होता है। महर्षि अत्रि ने मंडल की पूर्णता में भी सविता देव से प्रार्थना करते हुए मनुष्य के सम्पूर्ण दु:खों को-अनिष्टों को, शोक-कष्टों को दूर कर देने और मनुष्य के लिए जो हितकर हो, कल्याणकारी हो, उसे उपलब्ध कराने की प्रार्थना की है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि महर्षि अत्रि की मनोभावना अत्यन्त ही कल्याणकारी थी। एक ओर जहाँ उन्होंने वैदिक ऋचाओं का दर्शन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी प्रजा को सदाचार और धर्माचरणपूर्वक एक उत्तम जीवनचर्या में प्रवृत्त होने के लिये प्रेरित करते हुए कर्तव्या-कर्तव्य का निर्देश भी दिया है। इन शिक्षोपदेशों को उन्होंने स्वनिर्मित ग्रन्थ आत्रेय धर्मशास्त्र में भी उपनिबद्ध करते हुए वेदों के सूक्तों तथा मन्त्रों की अत्यन्त महिमा बताई है। अत्रिस्मृति का षष्टम  अध्याय वेदमन्त्रों की महिमा को ही समर्पित है। वहां ऋग्वेद 1/50/1, सामवेद 31, अथर्ववेद 13/2/16, यजुर्वेद 7/41 में उल्लिखित अघमर्षण के मन्त्र, सूर्योपस्थान का मन्त्र, पावमानी ऋचाएँ, शतरुद्रिय, गो-सूक्त, अश्व-सूक्त एवं इन्द्र-सूक्त आदि का निर्देश कर उनकी महिमा और पाठ का फल बताया गया है। इससे महर्षि अत्रि की वेद मन्त्रों पर गहरी दृढ़ निष्ठा का पता चलता है।

महर्षि अत्रि का कहना है कि वैदिक मन्त्रों के अधिकारपूर्वक जप से सभी प्रकार के पाप-क्लेशों का विनाश हो जाता है। पाठ कर्ता पवित्र हो जाता है, उसे जन्मान्तरीय ज्ञान हो जाता है, जाति-स्मरता प्राप्त हो जाती है और वह जो चाहता है, वह प्राप्त कर लेता है। ज्योतिष शास्त्र का चिकित्सा में ज्योतिषीय उपयोग करने के सिद्धांत के प्रतिपादक महर्षि अत्रि को बौद्धिक, मानसिक ज्ञान, कठोर तप, उचित धर्म आचरण युक्त व्यवहार, ईश्वर भक्ति एवं मन्त्रशक्ति के ज्ञाता के रुप में सदैव पूजा जाता रहा है। ऐसे में महर्षि अत्रि के द्वारा द्रष्ट मन्त्रों में, धर्मसूत्रों में अथवा उनके सदाचरण में निहित शिक्षा को स्वयं के सत्कर्म का अनुष्ठान बनाए बिना श्राद्ध पक्ष की सार्थकता सिद्ध होने की उम्मीद बेमानी ही है । mantr drashta rshi atri

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