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वेदपाठ शुरू करने का श्रावणी उपाकर्म

श्रावण पूर्णिमा को दक्षिण भारत में नारयली पूर्णिमा व अवनी अवित्तम, मध्य भारत में कजरी पूनम, उत्तर भारत में रक्षा बंधन और गुजरात में पवित्रोपना के रूप में मनाया जाता है। इसे श्रावणी उपाकर्म (उपक्रमम) भी कहा जाता है। उपक्रमम का अर्थ होता है शुरूआत, प्रारम्भ करना। इसी दिन से यजुर्वेदी ब्राह्मण अगले छः महीने तक यजुर्वेद पाठ की शुरूआत करते हैं। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने ज्ञान के देवता हयग्रीव के रूप में अवतार लिया था।

प्राचीन काल में एकमेव वेद और वैदिक साहित्य के स्वाध्याय का प्रचलन था। लोग प्रतिदिन वैदिक साहित्य का पठन- पाठन तो किया करते थे, लेकिन वर्षा काल में वेद पाठ का आयोजन विशेष रुप से किया जाता था। भारत में विक्रमी संवत के पंचम मास श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को प्राचीन काल से ही श्रावणी पर्व के रुप में मनाया जाता रहा है। श्रावण पूर्णिमा को दक्षिण भारत में नारयली पूर्णिमा व अवनी अवित्तम, मध्य भारत में कजरी पूनम, उत्तर भारत में रक्षा बंधन और गुजरात में पवित्रोपना के रूप में मनाया जाता है। इसे श्रावणी उपाकर्म (उपक्रमम) भी कहा जाता है। उपक्रमम का अर्थ होता है शुरूआत, प्रारम्भ करना। इसी दिन से यजुर्वेदी ब्राह्मण अगले छः महीने तक यजुर्वेद पाठ की शुरूआत करते हैं। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने ज्ञान के देवता हयग्रीव के रूप में अवतार लिया था। उपाकरण का अर्थ है आरम्भ करने के लिए निमंत्रण या निकट लाना। वैदिक काल में यह वेदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल था।

स्मृति ग्रन्थों के अनुसार जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) अथवा हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है। यह क्रिया यजुर्वेदी रक्षाबंधन के दिन तथा सामवेदी भाद्रपद शुक्ला दूज को पवित्र नदी के घाट पर सामूहिक रूप से करते है। वस्तुतः उपाकर्म ब्राह्मणों के द्वारा किया जाने वाला एक वैदिक अनुष्ठान है। यह अनुष्ठान क्षत्रिय और वैश्य समुदाय द्वारा भी किया जाता है। क्योंकि वे भी द्विज हैं, इसलिए उन्हें संध्यावंदनम, दैनिक स्नान अनुष्ठान करने का अधिकार है। उपाकर्म एक वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन अथवा धनिष्ठा नक्षत्र में ब्राह्मण धार्मिक आयोजन कर वैदिक मन्त्रों के साथ उपनयन धागा धारण करते हैं। इस अध्ययन सत्र के समापन को उत्सर्जन या उत्सर्ग कहा जाता है। यह सत्र माघ शुक्ल प्रतिपदा अथवा पौष पूर्णिमा तक चलता है। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के शुभ दिन रक्षाबंधन के साथ ही श्रावणी उपाकर्म का पवित्र संयोग बनता है। विशेषकर यह पुण्य दिन मनुष्य के लिए बहुत महत्व रखता है।

उल्लेखनीय है कि मनुष्य के जन्म लेने की प्रक्रिया तो प्रकृति की सहज प्रक्रिया मानी जाती है, किन्तु यह पुरुषार्थ साध्य है। पोषक और पोषित- दोनों को इसके अंतर्गत प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। इसीलिए कहावत प्रचलित है कि मनुष्य जन्म तो सहजता से प्राप्त हो जाता है, किन्तु मनुष्यता विकसित करने के लिए कठोर पुरुषार्थ करना पड़ता है। प्राचीन काल में श्रावण पूर्णिमा को गुरुकुलों में विद्यार्थियों का प्रवेश होता था। इस दिन को विशेष रुप से विद्यारंभ दिवस के रुप में मनाया जाता था। बटूकों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया जाता था। श्रावणी पूर्णिमा को जीर्ण यज्ञोपवीत को उतार कर नवीन यज्ञोपवीत को धारण करने की परम्परा भी रही है। कृषि पर आश्रित भारतीय अर्थव्यवस्था में आषाढ़- श्रावण मास फसलों की बुआई का होता है।

प्राचीन काल में ॠषि-मुनि अरण्य में वर्षा की अधिकता के कारण गांव के निकट आकर रहने लगते थे, और एक जगह वर्षा काल के चार महीनों तक ठहर जाते थे। जिसका लाभ ग्रामवासी उठाते थे, और उनसे धर्म चर्चा किया करते थे। जिसे चातुर्मास या चौमासा करना कहते हैं। आज भी यह परम्परा जारी है। इन चार महीनों में वेद अध्ययन, धर्म उपदेश और ज्ञान चर्चा होती थी। श्रद्धालु एवं वेदाभ्यासी इनकी सेवा करते थे और ज्ञान प्राप्त करते थे। इस अवधि को ॠषि तर्पण कहा जाता था। जिस दिन से वेद पारायण का उपक्रम आरम्भ होता था उसे उपाकर्म कहते हैं। यह वेदाध्यन श्रावण सुदी पूर्णिमा से प्रारंभ किया जाता था। इसलिए इसे श्रावणी उपाकर्म भी कहा जाता है। पारस्कर गुह्य सूत्र 2/10/2-2 में कहा गया है-

अथातोSध्यायोपाकर्म। औषधिनां प्रादुर्भावे श्रावण्यां पौर्णमासस्यम्।  – पारस्कर गुह्य सूत्र 2/10/2-2

अर्थात- यह वेदाध्ययन का उपाकर्म श्रावणी पूर्णिमा से प्रारंभ होकर पौष मास की अमावस्या तक साढ़े चार मास चलता था। पौष में इस उपाकर्म का उत्सर्जन किया जाता था।

इसी परम्परा में आज भी हिन्दू संत व जैन मुनियों द्वारा चातुर्मास का आयोजन किया जाता है, और ये भ्रमण त्याग कर चार मास एक स्थान पर ही रह कर प्रवचन और उपदेश करते हैं। मनुस्मृति के अनुसार श्रावणी और पौष्ठपदी भ्राद्रपद, पौर्णमासी तिथि से प्रारम्भ करके ब्राह्मण लगनपूर्वक साढ़े चार मास तक छन्द वेदों का अध्ययन करे और पौष मास में अथवा माघ शुक्ल प्रतिपदा को इस उपाकर्म का उत्सर्जन करे। इस कालावधि में प्रतिदिन वेदाध्यन किया जाता था, प्रतिदिन संध्या और अग्निहोत्र किया जाता था। नए यज्ञोपवीत को धारण करके स्वाध्याय में शिथिलता न लाने का व्रत लिया जाता था। वेद का स्वाध्याय न करने से द्विजातियां शुद्र एवं स्वाध्याय करने से शुद्र भी ब्राह्मण की कोटि में चला जाता है। इस तरह वेदादि अध्ययन एव स्वाध्याय का प्राचीनकाल में बहुत महत्व था।

श्रावणी पर्व के तीन लाभ है, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक। श्रावण का अर्थ होता है -जिसमें सुना जाये। संसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय ज्ञान वेद है। इसलिए इस मास में वेदों को सुना जाता है। श्रावण में गर्मी के पश्चात वर्षा आरम्भ होने से वातावरण के अनुकूल होने के कारण चित्त शांत हो जाता है, मन प्रसन्न हो जाता है। वर्षा होने के कारण मनुष्य अधिकाधिक समय अपने घर पर व्यतीत करता है। ऐसे अवसर को प्राचीन काल से ही वेदों के स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं आचरण के लिए अनुकूल माना जाता रहा है। वेदों के स्वाध्याय एवं आचरण से मनुष्य का अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना, श्रावणी पर्व के प्रचलन का आध्यात्मिक प्रयोजन है। श्रावण में वर्षा के कारण कीट, पतंगे से लेकर वायरस, बैक्टीरिया आदि का प्रकोप बढ़ जाने से अनेक बीमारियां फैलती है। भारत में प्राचीन काल से अग्निहोत्र के माध्यम से बिमारियों पर अंकुश लगाये जाने की वृहत परम्परा रही है। श्रावण मास में वेदों के स्वाध्याय के साथ- साथ दैनिक अग्निहोत्र का विशेष प्रावधान किया गया है। इसीलिए वेद परायण यज्ञ को इसमें सम्मिलित किया गया था। इससे न केवल श्रुति परम्परा को जीवित रखने वाले वेद-पाठी ब्राह्मणों का संरक्षण होता है, अपितु वेदों के प्रति जनमानस की रूचि में वृद्धि भी होती है। श्रावणी पर्व का वैज्ञानिक पक्ष पर्यावरण रक्षा के रूप में प्रचलित है।

श्रावण मास में वर्षा के कारण वन त्यागकर नगर के समीपस्थ स्थानों पर सन्यासियों के आकर वास करने का लाभ गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया करते हैं। महात्माओं के धर्मानुसार जीवन यापन, वैदिक ज्ञान, योग उन्नति एवं अनुभव गृहस्थियों को जीवन में मार्गदर्शन एवं प्रबंध में लाभदायक होता है। श्रावण पर्व का सामाजिक पक्ष ज्ञानी मनुष्यों द्वारा समाज को दिशा-निर्देशन एवं धर्म भावना को समृद्ध करना है। कालान्तर में वैदिक ज्ञान से दूर होने के कारण विदेशी संस्कृति के प्रचार से भारतीय जनमानस इसे भूल गया। और यह पर्व राखी अर्थात रक्षाबंधन के रुप में परिवर्तित हो गया। स्त्रियों को मुस्लिम आततायियों, यवनों से शील भंग होने का खतरा रहता था। वे बलात अपहरण कर लेते थे।

इससे बचने के लिए स्त्रियों के द्वारा वीरों को कलाई पर सूत्र बांध कर अपनी रक्षा का संकल्प दिलाने की परम्परा चल पड़ी। और रक्षाबंधन का पर्व भी श्रावण सुदी पूर्णिमा को मनाया जाने लगा। राख का अर्थ ही होता है, रखना, सहेजना, रक्षित करना। कोई भी नारी किसी भी वीर को रक्षा सूत्र (राखी) भेज अपना राखी-बंध भाई बना लेती थी वह आजीवन उसकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझाता था। इसके पूर्व रक्षा सूत्र बांधने का काम द्विज, ब्राह्मण लोग करते थे। वर्तमान में रक्षासूत्र के बंधन का व्यापक प्रचार प्रसार होने के कारण वृहत रूप से रक्षाबंधन पर्व मनाया जाने लगा है।

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