nayaindia singapore pm lee hsien ली-ली की बातें और मंदबुद्धियों की हू-हू हा-हा
गेस्ट कॉलम | बेबाक विचार| नया इंडिया| singapore pm lee hsien ली-ली की बातें और मंदबुद्धियों की हू-हू हा-हा

ली-ली की बातें और मंदबुद्धियों की हू-हू हा-हा

War truth and history

कोई अहमक़ ही इस बात से नाइत्तिफ़ाकी रख सकता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने वक़्त के सबसे बड़े वैश्विक जनतंत्र-पुरोधा थे। इसलिए अगर सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सिएन लांग ने वहां की संसद में दिए ताज़ा भाषण में नेहरू के असाधारण साहस, समर्पण और क़ाबलियत की तारीफ़ में दो शब्द कह दिए तो किसी को इतना बिलबिलाने की ज़रूरत भी नहीं है कि हायतौबा मचने लगे। नेहरू से ख़ार खाने वालों के पुश्तैनी हक़ को कोई कैसे छीन सकता है? ऐसा करना तो नेहरू की जनतंत्र के प्रति निष्ठा के बुनियादी उसूल का अपमान होगा। सो, लांग की बातों पर निगाहें रख कर नेहरू पर निशाना साधने वालों को अपना काम करने दीजिए। singapore pm lee hsien

लेकिन लांग का प्रमाणपत्र ले कर बल्लियों उछल रहे मंदचेताओं को देख कर भी मेरी हंसी नहीं रुक रही है। अब क्या हम इतने गए-बीते हो गए हैं कि अगर नेहरू के लोकतांत्रिक मूल्यों के माथे पर लांग रोली-चंदन नहीं लगाएंगे तो भारतवासी नेहरू के वैचारिक ढोल की थाप पर नृत्य करना बंद कर देंगे? नेहरू के विचारों के सामने नतमस्तक हो कर लांग ने हम पर कोई एहसान नहीं किया है। उलटे मुझे तो इस पर एतराज़ है कि नेहरू का नाम लेते हुए उन्होंने डेविड बेन-गुरियों को भी उनके समकक्ष सरीख़ा दर्ज़ा दे दिया। इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री की भारत के पहले प्रधानमंत्री से तुलना मुझे तो कुछ सुहाई नहीं। क्या आप को भारत के स्वाधीनता संग्राम और इज़राइल की स्थापना के संघर्ष की मूल अवधारणा, उपादान और प्रक्रिया एक-सी लगती है?

लांग समझदार हैं। न होते तो 32 साल से सिंगापुर के परोक्ष-अपरोक्ष भाग्यविधाता कैसे बने रहते? नेहरू के बहाने भारतीय संसद के सदस्यों की मौजूदा चरित्रावली पर उनकी टिप्पणी ग़लत नहीं है। लेकिन वे होते कौन हैं हमें यह बताने वाले कि हमारे आंगन में कितना कूड़ा-करकट जमा हो गया है? क्या हम नहीं जानते कि नेहरू के जनतंत्र का ज़र्रा-ज़र्रा कितना बिखर गया है? क्या हमें नहीं मालूम कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के संसदीय प्रवेश का चलन पिछले सात-आठ बरस की अपना-तेरी के चलते कितनी भद्दी शक़्ल अख़्तियार कर चुका है? मगर लांग को फिर भी मैं यह हक़ नहीं दे सकता कि वे हमें अपने ग़िरेबां में झांकने की सांकेतिक सलाह दें। हमारे दामन के धब्बे, हमारे दामन के धब्बे हैं। हम उन्हें धोएं, न धोएं, हमारी मर्ज़ी। सो, सिंगापुर के उच्चायुक्त साइमन वांग को तलब कर उन्हें फटकार लगाने का नरेंद्र भाई मोदी की सरकार को पूरा अधिकार है और इस मामले में मैं उनके साथ हूं।

अपराध कहां नहीं होते? क्या सिंगापुर में अपराध नहीं होते हैं? क्या सिंगापुर में बलात्कार नहीं होते हैं? क्या अपराध-बलात्कार पिछड़े और विकासशील देशों की ही समस्या हैं? सिंगापुर में भी अपराधों की दर लगातार बढ़ रही है। आंकड़े कभी पूरी तरह सच उजागर नहीं करते। वे हमेशा और हर ज़गह सरकारों की सहूलियत से घटा-बढ़ा कर पेश किए जाते हैं। बावजूद इसके, सिंगापुर में प्रति एक लाख की आबादी पर क़रीब पौने सात सौ अपराध होने का आंकड़ा है। इनमें क़ानूनन अपराध की श्रेणी में आने वाले हर तरह के मामले शामिल हैं। भारत में हर एक लाख की आबादी पर सकल अपराध का आंकड़ा पौने पांच सौ का है। सिंगापुर में प्रति एक लाख की आबादी पर बलात्कार के सालाना पांच मामले दर्ज़ होते हैं। भारत में सालाना छह मामले दर्ज़ होते हैं। सिंगापुर में बलात्कार के सिर्फ़ 13 प्रतिशत मामलों में सज़ा हो पाती है। भारत में 30 प्रतिशत मामले सज़ा की दहलीज़ तक पहुंचते हैं। अपराध के ये आंकड़े तो बताते हैं कि बड़े मियां अगर बड़े मियां हैं तो छोटे मियां भी तो सुभानअल्लाह हैं। तो अगर आपराधिक प्रकरणों से गुज़र रहे लोगों के भारत की संसद में बैठे होने की वज़ह से सिंगापुर के प्रधानमंत्री को नींद नहीं आ रही है तो क्या सिंगापुर के अपराध-दृश्य पर भारत के प्रधानमंत्री को भी अपनी नींद गंवा लेने का हक़ नहीं होना चाहिए?

Read also विरोधी वोट वोकल होता है

farmer and the country

ऐसा करेंगे तो हमारे नरेंद्र भाई तो ताज़िंदगी सो ही नहीं पाएंगे। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में प्रति एक लाख की आबादी पर बलात्कार के 92 मामले दर्ज़ होते हैं। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में यह आंकड़ा 28 का है। ब्रिटेन में 27, न्यूज़ीलैंड में 26 और स्विट्ज़रलैंड और इटली तक में बलात्कार के 7-7 मामले हर एक लाख की आबादी पर सामने आते हैं। भारत में तो यह आंकड़ा 6 का है। इस हिसाब से तो भारत की गलियां और चौबारे अमेरिका और ब्रिटेन से भी ज़्यादा महफ़ूज़ नज़र आते हैं। अब बताइए, अपना मुंह ढांपने की ज़रूरत किसे ज़्यादा है? ली लांग को या नरेंद्र भाई को?

लांग मामूली आदमी नहीं हैं। वे सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू के बेटे हैं। ली कुआन 17 साल पहले जवाहरलाल नेहरू स्मृति व्याख्यान देने दिल्ली आए थे। 2005 की कड़कड़ाती सर्दियों में उन्होंने अपनी आवाज़ में गर्माहट लाते हुए कहा था कि ब्रिटिश राज में मैं ने भी नेहरू की तरह भेदभाव और दमन का सामना किया था और इसलिए मैं नेहरू के सेकुलर-समाजवादी-सर्वसमावेशी विचारों से भावनात्मक और बौद्धिक तौर बहुत प्रभावित रहा हूं। लेकिन लोक-कल्याण की योजनाओं के उनके रास्ते से मैं इसलिए परे हो गया कि मैं जल्दी ही समझ गया कि बिना कुछ पकाए मैं कुछ भी बांट कैसे पाऊंगा? मैं मानता हूं कि लोक-कल्याण की निःशुल्क और रियायती योजनाओं से लोगों में आत्मनिर्भर होने, आगे बढ़ने और सफलता हासिल करने की चाहत ख़त्म हो जाती है।

कुआन ने इस व्याख्यान के दौरान कहा कि मैं ने आयात के बजाय औद्योगीकरण करने की नेहरू की नीति को भी जल्दी ही छोड़ दिया। जब तीसरी दुनिया के बाकी देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से आशंकित थे, मैं ने सिंगापुर को उनके लिए खोल दिया। इससे हमें बहुत फ़ायदा हुआ। दूसरी तरफ़ नेहरू का लोकतांत्रिक समाजवाद भारत की अफ़सरशाही की केंद्रीयकृत योजनाओं के चंगुल में फंस कर लाइसेंस राज, भ्रष्टाचार और बेहद धीमी आर्थिक प्रगति का शिकार हो गया।

ली कुआन 26 साल पहले भी भारत आए थे। तब उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बीच बोलते हुए कहा था कि भारत का ‘नियति से साक्षात्कार’ बार-बार टलता रहा और अब जा कर लगता है कि इस साक्षात्कार की दिशा में आपका कुछ देश आगे बढ़ेगा। यह 1996 में पी. वी. नरसिंहराव के आर्थिक सुधारों की शुरुआत का ज़माना था। चार साल बाद 2000 में कुआन की आत्मकथा का दूसरा खंड प्रकाषित हुआ। उस में उन्होंने लिखा कि भारत अब भी अधूरी महानताओं का देश है। वह अपनी क्षमताओं का अब भी बहुत कम इस्तेमाल कर रहा है। भारत को ले कर कुआन की इन तमाम चिंताओं में एक छटपटाहट साफ है कि लोक-कल्याण के रास्ते पर चल रहा भारत समाजवादी रास्ते को छोड़ कर पूंजीवाद की राह पर रपटना क्यों तेज़ी से शुरू नहीं कर रहा? 

क्या आज लोक कल्याण मार्ग पर रह रहे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को यह भूल जाना चाहिए कि ली लांग इन्हीं ली कुआन के बेटे हैं? नहीं। लेकिन नरेंद्र भाई को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया का ध्यान इस पर जाने लगा है कि उनके राज में समान अपराध से निपटने में अपने-पराए का भाव बेहद हावी हो गया है और हमारी संसद इसीलिए बदरंग होती जा रही है। ली-ली क्या कहते हैं, जाने दीजिए, आंचल अगर गंदला हो रहा है तो उसे धोना तो हमें ही है।

लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

Leave a comment

Your email address will not be published.

16 − seven =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
मोदी ने डिजिटल वीक का उद्घाटन किया
मोदी ने डिजिटल वीक का उद्घाटन किया