nayaindia Swami Vivekananda inspiration Netaji नेताजी के प्रेरणा स्रोत थे स्वामी विवेकानंद
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नेताजी के प्रेरणा स्रोत थे स्वामी विवेकानंद

Swami Vivekananda inspiration Netaji

आज 23 जनवरी को दिल्ली के इंडिया गेट पर स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा लगेगी, ये घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई। भारत सरकार द्वारा जन आकांक्षा का सम्मान करते हुए सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि दी जा रही है। ऐसे सकारात्मक माहौल में राष्ट्र अपने नेताजी को 125वीं जयंती पर याद कर रहा है। विदित हो कि 21 अक्तूबर, 2018 को नई दिल्ली स्थित लाल किले में आजाद हिंद सरकार के गठन की 75वीं वर्षगांठ मनाई गई थी। सन 1943 ईस्वी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद (जिसे अरजी हुकुमत-ए-आजाद हिंद के रूप में भी जाना जाता है) के रूप में अस्थायी सरकार की स्थापना की घोषणा की थी। इसे इंपीरियल जापान, नाजी जर्मनी, इतालवी सोशल रिपब्लिक और उनके सहयोगियों की ध्रुवीय शक्तियों का समर्थन प्राप्त था। इस नाते वे एकीकृत भारत के पहले प्रधानमंत्री थे।

इस सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी ने द्वितीय विश्वयुद्ध के उत्तरार्द्ध के दौरान निर्वासन में अस्थायी सरकार के ध्वज के तहत ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त करने के लिये संघर्ष शुरू किया था। सुभाष चंद्र बोस को इस बात का दृढ़ विश्वास था कि सशस्त्र संघर्ष ही भारत को स्वतंत्र करने का एकमात्र तरीका है। 1920 और 1930 के दशक में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कट्टरपंथी दल के नेता रहे, 1938-1939 में कांग्रेस अध्यक्ष बने पर महात्मा गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के साथ मतभेदों के बाद उन्हें हटना पड़ा था।

उनकी अस्थायी सरकार के अंतर्गत विदेशों में रहने वाले भारतीय एकजुट हो गए थे। इंडियन नेशनल आर्मी ने मलाया (वर्तमान में मलेशिया) और बर्मा (अब म्यांमार) में रहने वाले प्रवासी भारतीयों, पूर्व कैदियों और हजारों स्वयंसेवक नागरिकों को आकर्षित किया। अस्थायी सरकार के तहत, बोस राज्य के मुखिया, प्रधानमंत्री और युद्ध तथा विदेश मामलों के मंत्री थे। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने महिला संगठन की अध्यक्षता की, जबकि एसए अय्यर ने प्रचार और प्रसार विंग का नेतृत्व किया। क्रांतिकारी नेता रास बिहारी बोस को सर्वोच्च सलाहकार नियुक्त किया गया था। जापानी कब्जे वाले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भी अस्थायी सरकार बनाई गई थी। 1945 में अंग्रेजों द्वारा इन द्वीपों पर पुनः कब्जा कर लिया गया था। बोस की मौत आजाद हिंद आंदोलन के अंत के रूप में देखी गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध भी 1945 में ध्रुवीय शक्तियों की हार के साथ समाप्त हुआ था।

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निश्चित रूप से आज़ाद हिंद फौज या इंडियन नेशनल आर्मी की भूमिका स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण रही थी। नेताजी के जीवन और व्यक्तित्व से जुड़ी अनेकों घटनाएं, स्मृतियां चर्चा में हैं। ये सुखद बात है नई पीढ़ी के लोग नेताजी के शूरवीर, साहस, और शौर्य वाले चरित्र को न सिर्फ याद कर रहे हैं, बल्कि बदलता भारत नेताजी के चरित्र के माध्यम से भविष्य के भारत को सबल बनाने का प्रयास कर रहा है। आज जबकि नेताजी की 125वीं जयंती का उत्सव मनाया जा रहा है नेताजी के बहुआयामी चरित्र के अनेक पक्षों पर चर्चा होना स्वाभाविक है। मैं आज इस मौके पर स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का नेताजी के जीवन पर क्या असर पड़ा इस ओर ध्यान दिलाना अपना कर्तव्य समझता हूं ताकि आने वाली पीढ़ियां आधुनिक भारत के निर्माण में इन महापुरुषों के प्रभावों का मूल्यांकन कर सके।

पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति की धवल पताका फहराने और सनातन वैदिक धर्म का ओजस्वी संदेश देने के बाद स्वामी विवेकानंद का कई वर्षों के अंतराल के उपरांत 15 जनवरी 1887 को जब भारत भूमि पर पुनः पदार्पण हुआ और संपूर्ण भारत का भ्रमण करते हुए राष्ट्र का पुनर्गठन करने हेतु जन साधारण और विशेषकर नव युवकों का आह्वान उन्होंने किया तब चेन्नई में अपने भारत का भविष्यविषयक व्याख्यान में उन्होंने कहा- आगामी पचास वर्षों के लिए यह जननी जन्मभूमि ही मानो तुम्हारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मष्तिष्क से व्यर्थ के देवी देवताओं के हट जाने में भी कोई हानि नहीं है अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है।

स्वामी विदेहात्मानन्द जी रचित अद्वैत प्रकाशन से प्रकाशित नेता जी सुभाष के प्रेरणा पुरुष स्वामी विवेकानंदनामक पुस्तक में वर्णित है कि स्वामी विवेकानंद जी द्वारा दिए व्याख्यानों का सुभाष चंद्र बोस के मानस पर कितना बड़ा असर था कि पूरे जीवन स्वामी जी विचारों को साकार करते रहे नेता जी। इसी पुस्तक में एक संदर्भ नेता जी के अंतिम समय का चित्रण है कि जब नेता जी बुरी तरह घायल हो गए थे और उनको अस्पताल लाया गया जहां वो अचेत पड़े हुए थे रात्रि नौ बजे देहावसान से थोड़ी देर पूर्व होश आया उनकी संज्ञा लौटी तो सामने कर्नल हबीबुर्रहमान थे उन्होंने अपने किताब में लिखा है कि नेता जी ने कहा था कि- हबीब, मेरा अंत आसन्न है मैं अपनी सारी जिंदगी अपने देश की आजादी के लिए लड़ता रहा हूं और आज अपने देश की आजादी के लिए मर रहा हूं, जाकर मेरे देशवासियों से कह देना कि वो भारत की आजादी के लिए लड़ाई जारी रखें, भारत आजाद जरूर होगा और शीघ्र होगा।

कर्नल हबीबुर्रहमान अपनी किताब में कहते हैं कि यहीं नेता जी के अंतिम शब्द थे और यहीं उनका राष्ट्र के लिए अंतिम संदेश भी था। इन संदर्भो के आधार पर स्वामी विदेहात्मानन्द ने अपने किताब में कहा है स्वामी विवेकानंद जी राष्ट्र देवता की आराधना का मंत्र को ही जीवन का ध्येय बना लिया था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी के आदेश शिरोधार्य करके अन्य सभी देवी देवताओं की अपेक्षा पूर्ण मनोयोग से भारत माता की उपासना की थी। बंगला के सुप्रसिद्ध लेखक श्री मोहित लाल मजूमदार ने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को स्वामी विवेकानंद का मानस पुत्र कहा है। नेताजी को बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय अपना संपूर्ण जीवन होम कर देने की प्रेरणा का मंत्र स्वामी विवेकानंद जी से लिया था। नेता जी के सशक्त व्यक्तित्व, साहस, वीरता, समर्पण, आध्यात्म जीवन के गठन में स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का अति महत्वपूर्ण योगदान था।(लेखक मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार के पूर्व उपाध्यक्ष और भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष हैं।)

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