jammu and kashmir terrorism आतंकवाद तब खत्म होगा जब.....
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आतंकवाद तब खत्म होगा जब…..

घाटी में 1989-91 के कालखंड में चुन-चुनकर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा जा रहा था, उनकी महिलाओं से बलात्कार किया जा रहा था- तब देश में लोकतांत्रिक सरकारें और संविधानप्रद अदालतें थी। अब तीन दशक बाद, जब घाटी में गिनेचुने बचे गैर-मुस्लिमों और भारतपरस्त मुस्लिमों को चिन्हित करके सरेआम मारा जा रहा है, तब भी सरकार और न्यायालय देश में विद्यमान है। इन दोनों कालखंडों में अंतर यह है कि अब न केवल मजहब प्रेरित हत्याकांड सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है, अपितु शासकीय कार्रवाई धरातल में प्रत्यक्ष भी है।

कश्मीर में हाल मे आतंकवादियों द्वारा चार “काफिरों” (3 हिंदू, 1 सिख) की नृशंस हत्या की गई। प्रश्न उठता है कि क्या लोकतांत्रिक, मानवीय, संवैधानिक, न्यायिक, बहुमत आधारित शासन व्यवस्था- जिहादी इको-सिस्टम को समाप्त कर सकता है? जब घाटी में 1989-91 के कालखंड में चुन-चुनकर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा जा रहा था, उनकी महिलाओं से बलात्कार किया जा रहा था- तब देश में लोकतांत्रिक सरकारें और संविधानप्रद अदालतें थी। अब तीन दशक बाद, जब घाटी में गिनेचुने बचे गैर-मुस्लिमों और भारतपरस्त मुस्लिमों को चिन्हित करके सरेआम मारा जा रहा है, तब भी सरकार और न्यायालय देश में विद्यमान है। इन दोनों कालखंडों में अंतर यह है कि अब न केवल मजहब प्रेरित हत्याकांड सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन रहे है, अपितु शासकीय कार्रवाई धरातल में प्रत्यक्ष भी है।

जिस मजहबी चिंतन से कश्मीर 90 वर्षों से जकड़ा हुआ है, उसे वैचारिक खुराक “काफिर-कुफ्र” अवधारणा और उसी चिंतन के गर्भ से जनित “दो राष्ट्र सिद्धांत” से मिल रही है। सर सैयद अहमद खां ने मेरठ में 16 मार्च 1888 को अपने भाषण में कहा था, “अंग्रेजों के चले जाने के बाद हिंदू और मुस्लिम कौमों का एक सिंहासन पर बैठना असंभव और अकल्पनीय है। इसके लिए दोनों को एक-दूसरे पर विजय पाना होगा।” क्या यह सत्य नहीं कि मजहब प्रेरित इस द्वंद का परिणाम भारत 1947 में रक्तरंजित विभाजन, कश्मीरी पंडितों के नरसंहार-पलायन के रूप में भुगत चुका है और यह संघर्ष आज भी जारी है? बिंदरू, पासवान, दीपक और सुपिंदर के साथ 3 मुस्लिमों की हत्या- इसका एक और प्रमाण है। इनका संहार इसलिए हुआ, क्योंकि वे सभी “काफिर” भारत के ध्वजावाहक थे, जिनकी “कुफ्र” सनातन संस्कृति का आधार बहुलतवाद, लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता है।

Jammu and Kashmir Indian Army :

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इस अमानवीय चिंतन को संविधान-निर्माता डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने भी रेखांकित किया था। ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ लेखन में बाबासाहेब ने कहा था, “इस्लाम का भ्रातृत्व, सार्वभौमिक भ्रातृत्व का सिद्धांत नहीं है। यह केवल मुसलमानों तक सीमित है। जो बाहरी है, उनके प्रति शत्रुता और तिरस्कार के सिवाय कुछ नहीं है। इस्लाम कभी भी एक सच्चे मुसलमान को भारत को अपनी मातृभूमि के रूप में अपनाने और एक हिंदू को अपने स्वजन और रिश्तेदार के रूप में मानने की अनुमति नहीं दे सकता। संभवत: यही कारण है कि मौलाना मोहम्मद अली (जौहर)… ने एक सच्चे मुसलमान के नाते भारत के बजाय जेरूसलम में दफन होना पसंद किया।” जिस मौलाना जौहर का उल्लेख डॉ.अंबेडकर इसमें कर रहे थे, वे और उनके बड़े भाई मौलाना शौकत अली 1919-24 तक चले उस जिहादी खिलाफत आंदोलन के मुख्य संयोजकों में से थे, जिसकी प्रक्रिया ने कालांतर में पाकिस्तान का मानचित्र उकेर दिया। इसी योगदान के कारण पाकिस्तान में अली बंधुओं के नाम पर डाक टिकट तक जारी किए गए है। विडंबना देखिए कि सेकुलरवाद के नाम पर घोर सांप्रदायिक और इस्लामी निजाम में विश्वास रखने वालों ने उत्तरप्रदेश के रामपुर में उसी जौहर के नाम पर निजी विश्वविद्यालय स्थापित की है।

 क्या जिहाद प्रेरित इको-सिस्टम को शिक्षा, समुचित विकास और आधुनिकता के बल पर ध्वस्त किया जा सकता है? यदि उच्च शिक्षा से जिहादी मानसिकता का खात्मा संभव होता, तो गणित स्नातक हिज्बुल आतंकी रियाज नायकू, सुरक्षाबलों के हाथों मुठभेड़ में क्यों ढेर होता? वर्ष 2018 में मारा गया हिज्बुल आतंकवादी मोहम्मद रफी भट जम्म-कश्मीर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर था। इसी वर्ष जुलाई में कश्मीर के चार अध्यापकों सहित 11 सरकारी कर्मचारियों को आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था। हालिया हत्याकांड में भी 40 से अधिक अध्यापक जांच के घेरे में है।

 वास्तव में, आधुनिकता और शिक्षा केवल एक माध्यम है- इनका उपयोग कैसे किया जाता है, यह सब उपयोगकर्ता की मानसिकता पर निर्भर है। कटु सत्य है कि जिहाद का आधुनिकता और शिक्षा से मिलन- वैश्विक मानवता के लिए ही घातक है। वर्ष 2001 में न्यूयॉर्क का भीषण 9/11 आतंकवादी हमला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसका मुख्य षड़यंत्रकर्ता ओसामा बिन लादेन सिविल इंजीनियर था, तो बहुमंजिला भवन से जहाज टकराने वाले जिहादी कंप्यूटर शिक्षित, अंग्रेजी बोलने वाले, आधुनिक विषयों में स्नातक या परास्नातक और कुशल पायलट थे।

 कश्मीर की बर्बादी में भी “शिक्षा” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शेख अब्दुल्ला, उस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से रसायन में स्नातकोत्तर के डिग्रीधारक थे, जिसे स्वयं उच्च-शिक्षित जिन्नाह ने “पाकिस्तान के शस्त्रागार” की संज्ञा दी थी। जब उसी शैक्षणिक संस्थान रूपी जहरीली भट्टी में तपकर शेख 1931 में कश्मीर लौटे, तब उन्होंने घाटी का वातावरण विषाक्त कर दिया। शेख ने श्रीनगर स्थित खानकाह-ए-मौला और जामा-मस्जिद से सार्वजनिक जीवन का आगाज किया और अपने भड़काऊ भाषणों से कश्मीर के बड़े नेता बन गए।

 शेख के राजनीतिक उभार में पं.नेहरू का बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने ही घोर सांप्रदायिक शेख को सेकुलरवाद-लोकतंत्र का प्रतीक और सामंतवाद के विरूद्ध संघर्षरत योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया था। यह बहुत विचित्र था, क्योंकि शेख ने अपनी आत्मकथा “आतिश-ए-चिनार” में स्वयं महाराजा हरिसिंह को मजहबी विद्वेष से मुक्त और सेकुलर बताया था। सच तो यह है कि शेख ने घाटी में इस्लामी राज को स्थापित करने हेतु कश्मीरी खिलाफत का बिगूल फूंका था, जिसके मार्ग में बड़े अवरोधक हिंदू राष्ट्रवादी महाराजा हरिसिंह थे। तब पं.नेहरू के सहयोग से शेख ने महाराजा को 20 जून 1949 को घाटी से निकालकर बॉम्बे (मुंबई) भेज दिया। पं.नेहरू को अपनी गलती का बोध 8 अगस्त 1953 में हुआ और उन्होंने शेख सहित 22 को गिरफ्तार करवा दिया, परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

 अपने मजहब के कारण कश्मीर से देश के दूसरे हिस्से में पलायन करने वाले महाराजा हरिसिंह 20वीं शताब्दी में संभवत: पहले हिंदू थे। तब जम्मू को छोड़कर घाटी में किसी स्थानीय कश्मीरी पंडित ने इसका विरोध मुखर नहीं किया। यदि तत्कालीन हिंदू समाज इस अन्याय के खिलाफ उचित प्रतिकार करता, तो शायद 1989-91 का काल कश्मीरी पंडितों पर कहर बनकर नहीं टूटता और बिंदरू, पासवान, दीपक, सुपिंदर आदि भी दुर्भाग्यपूर्ण नियति से बच जाते।

 घाटी के जिहादी इको-सिस्टम के उन्मूलन हेतु फ्रांस, चीन और म्यांमार के रूप में तीन नीतिगत विकल्प है। फ्रांस ने इसी वर्ष मुस्लिम अलगाववाद को रोकने हेतु कानून पारित किया है, जिसमें कई सख्त प्रावधान है। म्यांमार ने रखाइन में मजहबी कट्टरता को कुचलने हेतु रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ भीषण सैन्य अभियान (2016-17) चलाया था। साम्यवादी चीन इस दिशा में कई इस्लामी परंपराओं (दाढ़ी बढ़ाना, कुरान पढ़ना, मदरसा जाना) पर प्रतिबंध लगाकर अमानवीय यातनाओं के साथ लाखों मुस्लिमों को चीनी समाजवाद-राष्ट्रवाद से जोड़ चुका है। दिलचस्प है कि फ्रांस, म्यांमार और कश्मीर में आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का उग्र-विरोध करने वाला वैश्विक इस्लामी गुट चीन की हरकतों पर चुप रहता है। क्या इसका कारण “सामरिक-सहयोगी” चीन का एशिया में “काफिर” भारत के प्रति दशकों पुराना शत्रुभाव है? क्या यह चुप्पी संपार्श्विक क्षति (collateral damage) का हिस्सा है?

भारत की आतंकवाद विरोधी लड़ाई में सबसे बड़े रुकावट वे लोग (वामपंथी, स्वयंभू उदारवादी, मुस्लिम जनप्रतिनिधि का बड़ा वर्ग और स्वघोषित सेकुलरिस्ट) है, जो आतंकवादी घटनाओं की निंदा तो करते है, परंतु प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जिहादियों के साथ खड़े भी नजर आते है। दहशतगर्दी किसी बंदूक से निकली गोली का परिणाम नहीं है, यह एक विशेष मानस की परिणति है। मजहबी शिक्षा के नाम “काफिर-कुफ्र” की अवधारणा को पुष्ट करने और जिहाद को मजहबी दायित्व की परिभाषा देने से वह जमीन तैयार होती है, जहां आतंकवाद की फसल उगती है। ऐसे में उस जहरीली उपज को आवश्यक खाद-पानी देना (सहानुभूति-वित्तपोषण सहित) और जिहाद की निंदा करना- एक साथ नहीं चल सकते। यदि भारतीय समाज को लोकतंत्र, बहुलतावाद और पंथनिरपेक्षता जैसे मूल्यों की रक्षा हेतु यह युद्ध जीतना है, तो उसे उन विषाक्त खेतों को बर्बाद करना ही होगा, जहां जिहादी पैदावार लहलाती है।

 

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