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बादशाह ख़ान से डोगोन तक

Badshah Khan Modiant Dogon

2021 में पढ़ी एक दर्जन से ज़्यादा क़िताबों में से दो का ज़िक्र मैं ख़ासतौर पर करना चाहता हूं। एक, बादशाह खान की आत्मकथा और दूसरी, मोडियांट डोगोन की आपबीती। पहली मैं ने इस साल की शुरुआत में फरवरी में पढ़ी थी और दूसरी वर्षांत होते-होते अक्टूबर में। Badshah Khan Modiant Dogon

ख़ान अब्दुल गफ़्फार ख़ान की आत्मकथा ‘मेरा जीवन और संघर्ष’ लिखी तो चार दशक पहले गई थी, लेकिन अब तक पश्तो से उसका अनुवाद नहीं हुआ था। इम्तियाज़ अहमद साहिबज़ादा ने फ्रंटियर गांधी की स्व-कथा को जितनी सलाहियत से अंग्रेज़ी में हमारे सामने रखा है, वह सचमुच क़ाबिले-तारीफ़ है। बावजूद इसके कि भारत में हम बादशाह ख़ान के बारे में बहुत-कुछ पढ़ते-जानते रहे हैं, उनकी आत्मकथा के पन्नों की यात्रा हमें एक अलग दरवेशी अहसास से सराबोर करती है।

बादशाह ख़ान जब ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ अभियान का ज़िक्र करते हैं तो मन में लाल कुर्तियों की अनुशासित क़दमताल दाएं-बाएं-दाएं-बाएं करने लगती है। जब वे डेरा जेल की भीतरी हालात बताते हैं तो अंग्रेज़ हुकूमत का प्रेत-लोक हमारी नज़रों के सामने आ कर खड़ा हो जाता है। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल कर आज़ादी की लड़ाई लडने के गर्व का आध्यात्मिक उद्घोष अगर बादशाह खान ने अपनी आत्मकथा में किया है तो देश के विभाजन के लिए कांग्रेस के तैयार हो जाने का गहरा दर्द ज़ाहिर करने से भी फंटियर गांधी हिचके नहीं हैं। बेबाकी के ये झरने ही इस आत्मकथा की आत्मा हैं।

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 अफ़गानिस्तान के दीर्घकालीन के अंतर्विरोधों को भी बादशाह खान ने अपने संस्मरणों में उजागर किया है और पख़्तून समाज की अंदरूनी उठापटक को भी। सामूहिक विस्थापन के कारणों का भी उनकी आत्मकथा में गहरा विश्लेषण है। सर्वसमावेशी समाज की स्थापना के लिए न्यायपूर्ण और साहसिक संघर्ष की इस दास्तान ने भारतीय संरचना के स्वतंत्रता-पूर्व पहलुओं को मुझे नए सिरे से तो समझाया ही, अपने पास-पड़ोस को नए नज़रिए से देखने की मेरी समझ भी बढ़ाई।

मोडियांट डोगोन की लिखी आत्मकथा ‘दोज़ वी थ्रो अवे आर डायमंड्स’ अक्टूबर के आख़िरी दिनों में पढ़ी। क़रीब सवा तीन सौ पन्नों की यह पुस्तक मैं दो दिन में पूरी पढ़ गया। शरणार्थियों की त्रासदी पर ऐसी क़िताबें बहुत कम लिखी गई हैं। डोगोन ने चूंकि आपबीती लिखी है, इसलिए पूरी कहानी और भी मार्मिक, गहरी और वास्तविक है।

डोगोन की यादों में कांगो संसार के सबसे जीवंत स्थान की तरह बसा हुआ था। वह जगह, जहां आदम का बगीचा है। डोगोन की कहानी 1995 में शुरू होती है। बगल के देश रवांडा में जातीय दंगे शुरू हो जाते हैं। डोगोन का परिवार कांगो के पूरब में रहने वाले बागोग्वे समुदाय का था। रवांडा के सामुदायिक नरसंहार की लपटें कांगो तक फैलने लगती हैं। जो साथ उठते-बैठते खाते-पीते थे, अचानक एक-दूसरे के रक्त के प्यासे बन जाते हैं। डोगोन के पिता अपने गांव के मुखिया थे और एक दिन घर लौटे तो लहूलुहान थे। उसके बाद हर दिन खूनखराबे का ही दिन था। डोगोन ने तीन साल की नन्ही उम्र में देखा कि किस तरह एक अतिवादी ने उनके चाचा की गर्दन काट दी और कैसे जब उनका परिवार जान बचाने के लिए सरहद की तरफ़ भागने लगा तो मां की गोद में उनकी बहन भूख के कारण चल बसी।

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रवांडा के एक शरणार्थी शिविर में डोगोन ने शरण ली। उस पर हुतू आतंकवादियों ने हमला कर दिया। डोगोन की एक पारिवारिक मित्र से सामूहिक बलात्कार हुआ। एक और नरसंहार की याद कर डोगोन अब भी सिहर उठते हैं, जब अपने प्राण बचाने के लिए उन्हें पूरी रात एक सीवर की गंदगी में आसपास पड़े शरणार्थियों के सड़ांध मारते शवों के बीच डूबते-उतरते बितानी पड़ी थी। यहां-वहां शरण की तलाश में भटकते डोगोन की कहानी में ऐसे कई वाकये हैं, जिनका ज़िक्र कर वे लिखते हैं कि शरणार्थी-जीवन किसी के भी मन को बाग़ी बना कर उसे उग्रवाद की तरफ़ ले जाने के लिए काफी होता है? क्योंकि एक शरणार्थी के पास खोने को बहुत कम होता है। ऐसे में भी अपने भीतर की मानवीयता और करुणा को डोगोन जिस तरह सहेज कर रख पाए, उसकी मर्मस्पर्शी झलकियां पुस्तक के पन्नों पर बिखरी हुई हैं।

डोगोन रवांडा के शरणार्थी शिविरों में, एक-दो नहीं, बीस साल रहे। उनके किस्से में मीलों फैले इलाके में लगे सफेद तंबुओं में बरसो-बरस रहती कुंठित प्रतिभाओं का बहुत सजीच चित्रण है। वे बताते हैं कि कैसे मेजबान देश अपने यहां हज़ारों शरणार्थियों को रहने की जगह तो दे देते हैं, मगर उन्हें नागरिकता कभी नहीं देते; कैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन उन्हें खाने को अनाज तो देते हैं, लेकिन उन्हें ज़िंदगी जीने के अवसर देने के लिए कुछ नही करते; और, कैसे राष्ट्रविहीन होने की मनःस्थिति किसी शरणार्थी को हमेशा सालती रहती है।

डोगोन की आत्मकथा पढ़ते-पढ़ते मेरी आंखों के सामने मेरे उस फ़िलस्तीनी दोस्त के रह-रह कर उठने वाले दर्द के बादल तैरते रहे, जो 38 साल पहले कई महीने बुदापेश्त में मेरे साथ रहा था और जिसने विदा लेते वक़्त नम आंखों के साथ मेरी चमड़े की जैकेट से भीतरी फ़र लगी अपनी जैकेट की अदला-बदली की थी। वह जैकेट अब भी मेरे पास है। सीरिया, म्यांमार, हैती, अफ़गानिस्तान, वग़ैरह की राह से गुज़र रहे हमारे संसार में  शरणार्थी होना क्या होता है, डोगोन की क़िताब ने मुझ में तो इसका एक नया नज़रिया विकसित किया है।

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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