sangh parivar and hindu भाजपा का रेलवे प्लेटफार्म बनना
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भाजपा का रेलवे प्लेटफार्म बनना!

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sangh parivar and hindu भाजपा एक रेलवे प्लेटफॉर्म बन गई। जहाँ हर तरह के जीव-जंतु अपनी शर्तों पर जब चाहें आ-जा सकते थे। डी.पी. यादव से लेकर अब्दुल्ला बुखारी तक का स्वागत। अवसरवादी, अलगाववादी, भ्रष्ट और अपराधी कोई भी भाजपा में आ सकता था। लेकिन इसी बहुरंगे प्लेटफॉर्म पर गोविन्दाचार्य जैसे ‘अनुशासनहीन’ के लिए कोई काम न था। बेचारे हिन्दू नागरिक को किस चीज से उत्साह होता। वह भाजपा को हराना नहीं चाहता था। किन्तु जिताने के लिए परिश्रम की इच्छा उस में नहीं रह गई थी।

संघ परिवार और हिन्दू की हार (2004) – 3 : यह उस हिन्दू की हार है जिस की बकरी को कुत्ता कहकर बार-बार दुतकारा गया। अंततः बेचारे ने मान लिया कि हो न हो, उस के पास जो बकरी है, वह वास्तव में कुत्ता ही है। और उस ने उसे छोड़ दिया।

भाजपा के हिन्दुत्व के साथ यही हुआ। दशकों से भाजपा और इस के पूर्ववर्ती जनसंघ को हिन्दू पार्टी समझा जाता था। जहाँ विरोधी इसे मुस्लिम-विरोधी करार देते थे, वहीं भाजपा नेता हिन्दू का अर्थ सभी भारतवासी बताते थे। लगभग उसी अर्थ में जैसे शतियों से बाहरी लोग भारत को देखते रहे हैं। अगर 1950 में भारतीय संविधान में देश का नाम दुर्भाग्य से ‘इंडिया’ न रख दिया गया होता, तो यह समझना बड़ा सहज होता। जैसे अमेरिकी मुस्लिम, रूसी मुस्लिम कहा जाता है, वैसे ही हिन्दू मुस्लिम कहा जाता होता। वस्तुतः, अरब देशों में यहाँ के मुसलमानों को ‘हिन्दू मुस्लिम’ (हिंदुस्तान के मुस्लिम) कहा ही जाता है।

हिन्दू का यही अर्थ भाजपा या रा.स्व.संघ के सिद्धांतकार बहस-मुबाहसे में बताते थे। जरूर इस में यह भाव भी सन्निहित था कि जो मुसलमान या ईसाई इस्लाम या ईसाईयत की साम्राज्यवादी धारणा के समर्थक हैं, वह हमारे विरुद्ध है। क्योंकि उस में भारत के हिन्दुओं को नष्ट करने का विचार है, जो अशांतिकारक है। इस रूप में भाजपा के हिन्दुत्व को यदि कोई मुसलमान तुरत स्वीकार न भी करे, तो कम से कम सैद्धांतिक रूप से इस में दोष दिखाना कठिन था। इस प्रकार अपने हिन्दुत्व का बचाव करते हुए भाजपा के प्रचारक चालू सेक्यूलरिज्म को नकली सेक्यूलरिज्म कहकर तिरस्कृत भी करते थे। जिस में विभिन्न पंथावलंबियों के प्रति आधिकारिक और व्यवहारिक भेद-भाव किया जाता था।

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इसी वैचारिक-राजनीतिक स्थिति में भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ केंद्र की सत्ता संभाली। लेकिन कुछ ही दिनों में यह नोट किया जाने लगा कि सत्ताधारी भाजपाई देश के मुसलमानों के बीच अपनी राष्ट्रवादी धारणाएं ले जाने के बदले ‘‘हम भी सेक्यूलर’’ कहकर वही सब करने लगे, जो कांग्रेसी करते थे। हज की सबसिडी बढ़ाना, मदरसों के दुरुपयोग पर चुप्पी रखना, राष्ट्रवादी मुसलमानों की बजाए उस के मजहबी लीडरों को अधिक भाव देना, आदि। मजहबी मौकों पर भाजपा नेता वैसे ही अरबी टोपी पहनने की रस्म निभाने लगे, जैसे कांग्रेसी करते थे। कश्मीर को वे उसी तरह इस्लाम और मुसलमानों का मसला मानने लगे, जैसे पहले होता था। जम्मू और लद्दाख की उपेक्षा वैसी ही होती रही, जैसी पचास साल से चल रही थी। कश्मीरी पंडित यथावत किसी गिनती में न थे।

इफतार में जाने और टोपी पहनने वाले भाजपाइयों को यह ध्यान न रहा कि देशवासी कभी बड़े मुसलमानों को तिलक लगवाते, होली-दीवाली मनाते भी प्रमुखता से देखें। प्रधान मंत्री वाजपेई ने कुछ हिन्दू नेताओं के हिन्दुत्व की सार्वजनिक आलोचना तो कई बार की। परंतु पुरानी बीमारी, कट्टरपंथी इस्लामी मतवाद, पर बोलने से परहेज ही रखा जो देश का एक विभाजन करवा चुकी है। और आज भी जिस की गिरफ्त में देश में अनगिनत युवा अनुचित, हिंसक कार्रवाइयों में लगे हैं। जब पूरे विश्व में इस्लाम की कुछ मान्यताओं के विरुद्ध आवाजें उठ रही थीं, तब भी भाजपा नेताओं ने इस के प्रति कांग्रेस मार्का चुप्पी साधे रखी। क्या उन्होंने प्रकारान्तर यह मान नहीं लिया कि नेहरूवादी सेक्यूलरिज्म सही था?  कि रा.स्व.सं. वाली हिन्दू की धारणा केवल कहने की थी, जिसे मुसलमानों तक ले जाने का नैतिक बल भाजपा नेताओं में नहीं?

इस्लाम से टकराती भारतीय धारणाएं यहाँ के मुसलमानों तक ले जाने का काम कठिन हो सकता है। पर असंभव नहीं। मतवाद के अतिरिक्त भी मनुष्य की एक सामान्य बुद्धि होती है। भारतीय मुसलमानों ने इस बुद्धि से पारंपरिक इस्लामी मतवाद की कई धारणाओं, रीतियाँ से अनायास दूरी रखी है। यह आगे भी होगा। फिर, फारुख अब्दुल्ला गाहे-बगाहे बोलते भी हैं कि वे भी राम और कृष्ण के ही वंशज हैं। यदि सरकार में रहते हुए भाजपा नेता भारतीय मुसलमानों से हिन्दू हितों पर संवाद का साहस न दिखा सके तो कहना पड़ेगा कि उन्होंने भी अपनी बकरी को कुत्ता समझ लिया।

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आरिफ मुहम्मद खान का भाजपा में आना अच्छा था। किंतु किन शर्तों पर?  भाजपा अपनी स्थिति पर समझौता करती दिखी, जबकि आरिफ पुरानी टेक पर रहे। कि चूँकि दूसरे दलों ने भी मुसलमानों के साथ न्याय नहीं किया, इसलिए अब वे भाजपा से कोशिश करना चाहते हैं। आरिफ ने सेक्यूलरिज्म की कांग्रेसी, विभेदकारी धारणा की आलोचना नहीं की। जो मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग रखती है। आरिफ ने भाजपा में आकर भी अलगाव के विचार ही व्यक्त किए। तब राष्ट्रीय मामलों में अनुचित हिन्दू-मुस्लिम विभेद को पाटा ही कैसे जा सकता है? यही नहीं, आरिफ ने साफ-साफ कहा कि वे ‘भाजपा को सुधारने’ आए हैं। भाजपा नेताओं ने इन बातों को चुपचाप पी लिया। वे भूल गए कि ऐसे बयानों से भाजपा की छवि मुसलमानों में तो वही रह जाती है, जो पहले थी। जबकि पारंपरिक हिन्दू समर्थकों में इस से क्षोभ पैदा होता है।

चुनाव प्रचार में यह और भी शर्मनाक तरीके से दिखा। शीर्ष भाजपा नेताओं ने मुसलमानों को संबोधित करते हुए पाकिस्तान का बार-बार जिक्र किया। इस से यही लगता है कि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत सही था। यदि इस्लामी आतंकवाद, कश्मीर, ईराक, पाकिस्तान, उर्दू आदि मुसलमानों के मामले हैं तो तर्कपूर्ण होता कि मुसलमानों से सब बातें साफ-साफ की जातीं। यह भी कहा जाता कि हिन्दू हित भी होते हैं, जिन के बारे में मुस्लिमों को इंसानी इंसाफ की नजर से सोचना चाहिए। इस्लामी नजर से नहीं। दो-टूक और बेलाग बातों से मुसलमानों में ज्यादा भरोसा पैदा होता। यह नहीं हुआ। मुस्लिम हितों को सार्वजनिक स्वीकृति मिली और हिन्दू चिंता पर चुप्पी रही। इसे स्वर देने वाले तोगड़िया के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया गया, और केन्द्र के मुँह से आवाज नहीं निकली। इस से कहीं भरोसा पैदा होना संभव न था। न मुसलमान में, न हिन्दू में।

इस प्रकार, भाजपा की हालत ‘रामखुदइया’ वाली हो गई, जिस में न राम थे, न खुदा। वह कुछ तीसरी ही अनर्गल चीज बन गई। मुसलमानों का साथ न मिला, क्योंकि भाजपा ने उन से कांग्रेसी पोशाक में बात की। यानी सत्यनिष्ठा से नहीं की। दूसरी तरफ, जिन हिन्दुओं ने दशकों से इस्लामी, और सेक्यूलरवादी झक द्वारा अपने को अपमानित, प्रताड़ित समझा था। वे भाजपा के प्रति भी अनमने हो गए। उन्होंने सत्ताधारी भाजपा को कदम-कदम पर हिन्दू हितों से समझौता करते देखा, जबकि लाभ की आशा में इधर मुखातिब हुए पस्त मुस्लिम नेताओं को भी ऐसा करते नहीं देखा गया।

भाजपा एक रेलवे प्लेटफॉर्म बन गई। जहाँ हर तरह के जीव-जंतु अपनी शर्तों पर जब चाहें आ-जा सकते थे। डी.पी. यादव से लेकर अब्दुल्ला बुखारी तक का स्वागत। अवसरवादी, अलगाववादी, भ्रष्ट और अपराधी कोई भी भाजपा में आ सकता था। लेकिन इसी बहुरंगे प्लेटफॉर्म पर गोविन्दाचार्य जैसे ‘अनुशासनहीन’ के लिए कोई काम न था। बेचारे हिन्दू नागरिक को किस चीज से उत्साह होता। वह भाजपा को हराना नहीं चाहता था। किन्तु जिताने के लिए परिश्रम की इच्छा उस में नहीं रह गई थी।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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