nayaindia The Hindu Temple of Dubai दुबई का ‘हिंदू टेंपल’,एक कमरे से शुरू हुआ!
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दुबई का ‘हिंदू टेंपल’,एक कमरे से शुरू हुआ!

मंदिर के कंसल्टेंट आर्किटेक्ट सुभाष बोइते ने अपने 45 साल के अनुभवों को इस मंदिर के निर्माण में जुटाया है। 1958 में जब पहला हिंदू मंदिर स्थापित हुआ था तब दुबई में भारतीय समुदाय के सिर्फ 6,000 लोग रहते थे। जबकि आज के समय यह आंकड़ा 33 लाख से भी ज़्यादा है। दुबई में हिंदुओं की तादाद बढ़ने के साथ-साथ एक बड़े मंदिर की ज़रूरत को महसूस किया जाने लगा।

कहते हैं बड़ी उपलब्धि कि शुरुआत छोटी सी पहल से होती है। दुबई का जेबेल अली इलाक़ा हाल हीमें सुर्ख़ियों में था। दुनिया भर के हिंदुओं के लिए यह एक गर्व की बात है कि मुस्लिम बाहुल्य संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी दुबई में राम नवमी के दिन एक विशाल हिंदू मंदिर का लोकार्पण हुआ। इस विशाल हिंदू टेंपल की शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी। आज वह 70 हज़ार वर्ग फ़ीट का एक विशाल मंदिर बन गया है। इस मंदिर को शांति, सद्भाव और सहिष्णुता के एक मजबूत संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

1958 में बने इस एक कमरे के मंदिर को गुरु दरबार सिंधी मंदिर के नाम से जाना जाता था। इस मंदिर की स्थापना रामचन्द्रन सवलानी और विक्योमल श्रॉफ़ ने की थी। ज्यों-ज्यों दुबई में बसे हिंदुओं को इस मंदिर के बारे में पता चला तब से वे बड़ी श्रद्धा से यहाँ आने लगे। जैसे-जैसे लोगों का विश्वास इस मंदिर पर बढ़ता चला गया तबसे यह मंदिर दुबई में बसे हिंदुओं की आस्था का केंद्र बन गया। आज इस विशाल मंदिर के प्रांगण में 16 अलग-अलग देवी देवताओं के मंदिर हैं। इन प्रतिमाओं को भारत के कोने-कोने से दुबई लाया गया है। इनमें प्रमुख हैं श्री राम, श्री राधा कृष्ण, शिव-पार्वती व गणपति। मकराना से लाए सफ़ेद संगमरमर से बने इस विशाल मंदिर के दर्शन के लिए दुबई के हर कोने से हिन्दू धर्म के लोग पहुंच रहे हैं।

मंदिर के कंसल्टेंट आर्किटेक्ट सुभाष बोइते ने अपने 45 साल के अनुभवों को इस मंदिर के निर्माण में जुटाया है। 1958 में जब पहला हिंदू मंदिर स्थापित हुआ था तब दुबई में भारतीय समुदाय के सिर्फ 6,000 लोग रहते थे। जबकि आज के समय यह आंकड़ा 33 लाख से भी ज़्यादा है। दुबई में हिंदुओं की तादाद बढ़ने के साथ-साथ एक बड़े मंदिर की ज़रूरत को महसूस किया जाने लगा। 2019 में दुबई के सामुदायिक विकास प्राधिकरण ने इस मंदिर के लिए जगह का आवंटन किया और 2020 में इस मंदिर का कार्य शुरू हुआ। मंदिर के ट्रस्टी राजू श्रॉफ़ के अनुसार कोविड महामारी के चलते भी इस मंदिर के निर्माण पर कोई असर नहीं पड़ा। दुबई सरकार के सहयोग से यह मंदिर समय पर बन कर तैयार हुआ।

मंदिर के कई हिस्सों को खूबसूरत नक्काशी से अलंकृत किया गया है। मंदिर की छत पर बंधी घंटियां भी बेहद खास हैं। मंदिर के मुख्य हॉल की छत के बीचोंबीच एक विशाल 3डी गुलाबी कमल का फूल बनाया गया है जो अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं है। इस मंदिर का निर्माण दुबई के जबेल अली इलाक़े में ‘पूजा गांव’ में हुआ है। ग़ौरतलब है कि इस स्थान में चर्च और गुरुद्वारा भी है। इस कॉम्प्लेक्स में हिंदू देवी-देवताओं के साथ-साथ गुरु ग्रंथ साहिब को भी स्थापित किया है। इस मंदिर के प्रांगण में एक समय में 1000-1200 लोग आराम से बैठ सकते हैं। सूचना और प्रौद्योगिकी के दौर में यह मंदिर किसी से पीछे नहीं है। इस मंदिर की वेबसाइट पर जा कर आप यहाँ जाने का समय निर्धारित कर सकते हैं। क्यूआर कोड की मदद से आपको बिना किसी बाधा के इस मंदिर में घूमने दिया जा सकता है। खबरों के अनुसार अक्टूबर के अंत तक वीकेंड के लिए अधिकांश बुकिंग पहले ही हो चुकी है। मंदिर सुबह 6.30 बजे से रात 8 बजे के बीच खुला रहता है।

आज एक ओर जहां किसी भी धर्म विशेष के कट्टरपंथी निहित स्वार्थों के लिए आपस में फूट डालने का काम करते हैं वहीं क़ौमी एकता का प्रतीक बन कर दुबई के इस मंदिर ने एक सकारात्मक पहल की है। आशा है कि और धर्मों के कट्टरपंथी भी इस पहल से सबक़ लेंगे और दूसरे धर्मों के प्रति उदार होंगे। शायद इसीलिए कबीर दास जी ने कहा है कि, ‘नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।’ हमें दूसरे धर्मों के प्रति उसी उदारता से रहना चाहिए जैसा हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं। केवल ऊपरी मीठी बातें और दिखावा करने से कुछ नहीं होता। इसे आचरण में भी लाना चाहिए। किसी भी प्रगतिशील समाज की सफलता के पीछे क़ौमी एकता मूलभूत आधार होती है। परंतु इसमें कड़वाहट तब पैदा होती है जब कुछ असामाजिक तत्व इसमें ज़हर घोलने का प्रयास करते हैं। ऐसी घड़ी में संयम रख सजग रहना ही बेहतर होता है। नकारात्मक ताक़तों के हावी हुए बिना सकारात्मकता का साथ दें तभी समाज में एकता बढ़ेगी। हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख या ईसाई हम सब एक ही हैं और भगवान ने हमारी एक ही प्रकार से रचना की है। हम सभी की एकता के कारण ही भारत अंग्रेज हुकूमत से आजाद हुआ था। भारत की आज़ादी में सभी धर्मों के लोगों का योगदान है।

दुबई के रामचन्द्रन सवलानी और विक्योमल श्रॉफ़ द्वारा 1958 में शुरू की गई इस पहल का उदाहरण हम सभी को लेना चाहिए। एक छोटे से कमरे से बढ़ कर एक विशाल मंदिर की कल्पना को सच करना वास्तव में सराहनीय है। आप जब भी अगली बार दुबई जाएं तो इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें और स्वयं ही इस शानदार परिसर की सुंदरता की अनुभूति करें।

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