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महाराष्ट्र में असली मिशन हिंदू विकल्प मिटाना!

Maharashtra Eliminate Hindu Choice

महाराष्ट्र में धमसान चल रहा है वही पश्चिम बंगाल और झारखंड भी निशाने पर है।  पश्चिम बंगाल, झारखंड की लड़ाई सत्ता के लिए है लेकिन महाराष्ट्र की लड़ाई सत्ता के लिए नहीं, हिंदुत्व के लिए भी नहीं बल्कि प्रतिशोध के लिए लड़ी जा रही है। बावजूद इसके छत्रपति शिवाजी, बाजीराव पेशवा की विरासत वाले राज में कोई माई का लाल दिल्ली के सत्ताधीशों से मुकाबले का दमखम लिए हुए दिखलाई नहीं दे रहा है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे अभिमंन्यु की तरह अकेले ही लड़ रहे हैं। सरकारी दमन यंत्रणा अपने चरम सीमा पर है। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसलों से हौसले बुलंद हो गए है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग (इनकम टैक्स ), केंद्रीय गुप्तचर विभाग ( सीबीआई) आदि तमाम एजेंसियां विरोधी नेताओं के पीछे पड़ी हुई है। इसका अर्थ एक ही निकलता है और वह यह है की भाजपा अपने विरोधियाँ को आम चुनाव से पहले पूरी तरह ध्वस्त कर देना चाहती है क्योंकि सत्ता पक्ष को सबकुछ होते हुए अपनी जीत का पूरा विश्वास नहीं है।

पहले कर्नाटक, मध्य प्रदेश में उद्देश्य स्पष्ट था । कांग्रेस को तोड़ो,उनके विधयाकों से इस्तीफा लेकर उन्हें भाजपा टिकट पर चुनाव लडवा और जितवा कर सत्ता प्राप्त करो।  उसमें भाजपा कामयाब रही लेकिन महाराष्ट्र में उसे वैसा मामला समझ नहीं आ रहा है।  मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और शिवसेना के बागी विधायकों का बोझ भाजपा ज्यादा समय उठाना नहीं चाहती क्योंकि उसमें से कुछ लोगों के खिलाफ आर्थिक घोटालों की जाँच चल रही है। एकनाथ शिंदे और उनके बागी विधायक असेट है या लायबिलिटी, इसका पूरा अंदाज़ भाजपा कमान को  नहीं है और दूसरी और भाजपा केडर उनको कितना स्वीकारेंगे, यह भी बड़ा सवाल है ।

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राजनीती में शिवसेना अछूत है और  हमारे सिवा उनका कोई साथी नहीं बन सकता, वो जाएगी तो कहा जाएगी, ऐसी भाजपा के आला नेताओं में अवधारणा थीं। वह सन् 2019 के महाराष्ट्र विधासभा चुनाव के बाद खत्म हुई। शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रवादी  कांग्रेस भाजपा के खिलाफ एक हुए। उनकी महाविकास आघाडी सरकार बनी। अघाड़ी सरकार ढाई साल चली। यह केवल इतिहास नहीं बल्कि भाजपा, नरेंद्र मोदी, अमित शाह को सबसे बड़ा धक्का था। तभी तय हुआ शिवसेना को ख़त्म करो। सत्ता, आती-जाती रहेगी लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदार हम और केवल हम ही रहेंगे, यही सोच शिवसेना को खत्म करने के पीछे का कोर बिंदु है।

उद्धव ठाकरे के तीखे हमलों, संजय राउत के खुले हमले, शरद पवार की रणनीति और सोनिया गांधी से मिल रहा समर्थन से महाविकास आघाड़ी मजबूत हो रही थी । उसे तोड़ने की क्षमता देवेंद्र फडणवीस में नहीं है और उद्धव ठाकरे की सरकार और कुछ  समय चली तो सन् 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव का गणित बिगड़ेगा। फिर उसका असर गोवा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ में हो सकता है यह जानने के बाद भाजपा आलाकमान  सक्रिय हुआ। और “ऑपरेशन  कमल “अपनी अंजाम तक पहुंचा ।

अब उद्धव ठाकरे अदालती लड़ाई, चुनाव आयोग के लड़ाई में फंसे है। आदित्य ठाकरे के अलावा पूरे महाराष्ट्र में घूमने वाला नेता उनके पास नहीं है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को अमित शाह पर निर्भर है। एकनाथ शिंदे दिल्ली में हर हफ्ते कम से कम 2-3 बार आते है। नरेंद्र मोदी – अमित शाह  अब उनके भी हाईकमांड है। एक महीने से महाराष्ट्र में दो मंत्री, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की  कैबिनेट ही सरकार चला रही है ।

महाराष्ट्र में अब क्या होगा ? भाजपा के एक सांसद के अनुसार चुनाव हो जायेगा। इसका मतलब एकनाथ शिंदे के साथ सन् 2024 तक सरकार चलाने का इरादा नहीं है। बृहन्मुम्बई म्युनिसिपल कारपोरेशन के साथ, या गुजरात विधान सभा के चुनावों के साथ या अगले साल महाराष्ट्र में चुनाव हो सकते है । अगर ज्यादा समय मिला तो उद्धव ठाकरे संभल जायेंगे और वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस के साथ मिलकर एक विकल्प के रूप में उभरेंगे। क्योंकि आने वाला चुनाव उनके लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा होगा। भाजपा में सोच है कि अभी हालात हमरे पक्ष में है, विरोधी दलों का वोट बैंक टूट रहा है। हमें एकनाथ शिंदे, राज ठकरे को किसी भी हालत में मजबूत नहीं करना है …ऐसे तर्क दिए जा रहे है।

मोटा मोटी लगता है कि भारत के पश्चिमी क्षेत्र गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, हिंदी भाषी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार और झारखण्ड तथा दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना यदि साथ रहे तो सन् 2024 में नरेंद्र मोदी आसानी से तीसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे। इसी सोच और योजना के तहत राजनीति हो रही है। उद्धव ठाकरे और शिव सेना को बेदम बनाना इसका अंहम पहलू है।

इसी योजना के तहत कांग्रेस मुक्त भारत के बाद अब भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के परिवारवाद के खिलाफ जंग छेड़ी है। हिंदुस्तान में चुनाव जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण पर होते है। आर्थिक मुद्दे, महंगाई, बेरोजगारी पर चुनाव लड़े जा सकते है लेकिन जीते नहीं जाते यह भाजपा जानती है। उसे तोड़ने वाला नायक कौन व कंहा से निकलेगा इसका जवाब शायद महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल,दिल्ली, झारखण्ड, बिहार में हो रही उथलपुथल के बाद ही मिलेगा। पर क्या मिलेगा भी?

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