राजनीति के वायरस की गति कोरोना से भी तेज…।

वैसे यह राजनीतिक घटनाक्रम किसी से भी छुपा नहीं है, किन्तु इस घटनाक्रम पर राजनेताओं को छोड़ शेष सभी के लिए गंभीर चिंतन और मौजूदा राजनीति को लेकर अर्न्तमन से चिंतन जरूरी है।

वैसे तो चीन से उत्पन्न कोरोना महामारी से पूरा विश्व परेशान व चिंतित है, किन्तु इस महामारी ने पूरे देश में व्याप्त उन करोड़ों गरीब मजदूरों को एक ऐसा बेरोजगारी और पलायन का दर्द दे दिया जो काफी कठिन व दुख भरा है। आज एक और जहॉ कोरोना पीडि़तों की संख्या में लगातार वृद्वि होती ही जा रही है, वहीं देश की सड़कें व राजमार्ग उन असहाय गरीब और मजबूर मजदूरों से पटी पड़ी है,

जो लॉकडाउन के बाद शहरों से बेरोजगार कर दिए जाने के बाद पैदल ही सपरिवार अपने हजारों मील दूर स्थित गॉवों के लिए निकल पड़े। यह सिलसिला पिछले ढाई महीने से जारी है, और इस बीच भूख, प्यास और दुर्घटनाओं में कई की जानें भी चली गई है, और पिछले ढाई महीने से भारतीय राजनीति इन भूखे-नंगो असहायों को सिर्फ और सिर्फ आश्वासन ही बांट रही है। यही स्थिति केन्द्र सरकार की है जो विशेष रेलों का झुनझुना पकड़ाकर रोते-बिलखते मजदूरों को बहलाने का प्रयास कर रही है।

इस बीच कांग्रेस की महासचिव श्रीमति प्रियंका वाड्रा ने उत्तरप्रदेश में पैदल विचरण कर रहे असहाय हजारों मजदूरो को अपने गतव्य तक पहुंचाने के लिए एक हजार बसें उत्तरप्रदेश सरकार को उपलब्ध कराने की पेशकश की, राजनीतिक स्पर्धा में प्रियंका का यह कदम कहीं उत्तरप्रदेश में सत्तारूढ भाजपा पर भारी न पड़ जाए, इसलिए उत्तरप्रदेश सरकार चिट्टी अभियान शुरू किया और बाद में कांग्रेस ने प्रवास मजदूरों के जमावाडे वाले स्थलों गाजियाबाद तथा नोएडा के लिए पॉच-पॉच सौ बसें रवाना कर दी, किन्तु पहले तो तकनीकी खामियां बताई गई और फिर बस की जगह अन्य वाहन भेजने की शिकायत की गई।

उत्तरपद्रेश परिवहन विभाग व पुलिस ने बसों को आगरा की सीमा पर रोक लिया और निर्धारित स्थलों तक पहुंचने नहीं दिया, बसे दो दिन तक आगरा की सीमा पर खड़ी रही इस बीच प्रियंका ने यह भी पेशकश की कि यदि उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी इसे कांग्रेस का प्रचार-प्रसार अभियान मानती है, तो बसों पर भाजपा के बैनर, झंडे लगा दिये जाए, किन्तु बेचारे असहाय मजदूरों को तो उनके घरों तक पहुंचाया जाए, किन्तु निर्ममता की सीमा पार कर रही सरकार ने प्रियंका की बात पर कोई ध्यान नही दिया और बसों को निहारते हुए मजदूर बसो के सामने से पैदल ही अपने गंतव्य की और चल दिए और फिर मजबूरी में कांग्रेस को अपनी बसे वापस बुलवाना पडी।

आखिर यह निर्मम घटनाक्रम देश की जनता को क्या संदेश देता है ? इससे यह स्पष्ट नही होता कि देश के हर दुखी-दर्दी वर्ग के लिए सरकारों व उन्हें संचालित करने वाले राजनीतिक दल अपरोक्ष रूप से जनता की बेबसी का मजाक उड़ा रहे हैं ? आज जबकि देश दोहरे संकट के दौर से गुजर रहा है, तब क्या ऐसे समय भी सत्तारूढ़ दलों को ऐसी राजनीति करनी चाहिए? इस घटनाक्रम ने तो फिर एक बार सिद्व कर दिया कि राजनीति के वायरस की गति के सामने कोरोना वायरस की गति तो शून्य है ?

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