राजनेताओं की मनमर्जी और बेचारा संविधान…?

भारत की आजादी से अब तक के तिहत्तर सालों में से यदि प्रारंभिक उन्तीस महिने और ग्यारह दिन संविधान रहित देश का समय निकाल दिया जाए तो करीब-करीब सत्तर सालों से हमारे देश में संविधान लागू है,

किंतु क्या संविधान की शपथ लेकर सत्ता की कुर्सी प्राप्त करने वाले किसी भी राजनेता ने आज तक उस संविधान का सम्मान किया, जिसकी शपथ लेकर उन्होंने सत्ता की कुर्सी पाई? इतिहास गवाह है कि प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी तक की सरकारों ने हरदम इस संविधान को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास किया, फिर वह चाहे राजनीतिक हित साधने के लिए हो या व्यक्तिगत। सत्ता में जो भी रहा, जो भी राजनीतिक दल रहा सभी ने सरकारें एक ही लीक पर चलाई, अब चूंकि पिछले सत्तर सालों में से करीब साठ साल कांग्रेस ही सत्ता में रही तो सर्वाधिक तोहमतें उसी पर लगना स्वाभाविक है और वह भी इंदिरा जी के सत्ता के अठारह सालों में?

…..किंतु अब जबकि देश में पहली बार पूर्ण बहुमत वाली गैर कांग्रेसी सरकार बनी है तो वह भी उसी राह को पकड़ने का प्रयास कर रही है, जिस राह पर उसके पूर्वज चले है, आज यह सवाल इसलिए सामने आया क्योंकि देश के एक जाने-माने प्रतिपक्षी मुस्लिम नेता असदुट्ट्ीन ओबेसी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अयोध्या राममंदिर शिलान्यास समारोह में शामिल होने पर संवैधानिक सवाल खड़े कर उनके इस प्रयास को गैर-संवैधानिक बताया है, उनकी दलील है कि प्रधानमंत्री ने संविधान की शपथ लेकर कुर्सी प्राप्त की है, संविधान में धर्मनिरपेक्षता का उल्लेख है, चूंकि नरेन्द्र भाई मोदी देश के सभी धर्मावलम्बियों के प्रधानमंत्री है, इसलिए उन्हें किसी धर्म विशेष से जुड़े समारोह में प्रधानमंत्री के रूप में शिरकत नहीं करनी चाहिए, वे व्यक्तिगत रूप से बिना किसी प्रचार या सरकारी पैसा खर्च किए समारोह में शामिल हो सकते है किंतु प्रधानमंत्री पद के तामझाम के साथ नही, यह संविधान की अवहेलना होगी। अब औबेसी के तर्क में कितनी सच्चाई व यथार्थ है?

ये तो संविधान विशेषज्ञ जाने, किंतु यह सही है कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू के समय जो पंचशील सिद्धांत बने थे, उनमें धर्मनिरपेक्षता भी एक प्रमुख बिन्दु था और ये पंचशील सिद्धांत चूंकि 2014 के बाद खारिज कर दिए गए, इसलिए ऐसा मान लिया गया है कि धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत भी खत्म हो गया, जबकि संविधान वक्ताओं का यह तर्क है कि धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान का एक अंश है और उसके तहत देश के सभी धर्मों के निवासियों को अपने धर्म के अनुसार चलने और दिनचर्या तय करने की छूट दी गई है और एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म पर प्रहार या अतिक्रमण वर्जित किया गया है और प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति संविधान के संरक्षक माने गए, इसलिए उन्हें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का हनन हो।

अब धर्मनिरपेक्षता के इस सवाल पर देश में सत्तारूढ़ भाजपा व प्रतिपक्ष दलों के पृथक-पृथक विचार हो सकते है, सब अपने-अपने हक में दलीलें दे सकते हैं, किंतु वास्तविकता तो यही है कि एक प्रजातांत्रिक देश की सत्ता के प्रधान को धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत का ईमानदारी से पालन करना चाहिए और जहां तक राममंदिर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दलील का सवाल है, इससे अयोध्या राममंदिर धार्मिक सीमा से बाहर नहीं हो जाता।

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