मंत्रिमंडल विस्तार में लगे ग्रहण के योग का समय

21 जून को सुबह-सुबह पूरे देश में योग किया और फिर सूर्य ग्रहण के प्रभाव में दिन निकला ऐसे ही 19 जून को राज्यसभा चुनाव का योग पूरा होने के बाद मंत्रिमंडल के विस्तार में लगे ग्रहण के पूरे होने की बेसब्री बढ़ गई है और विस्तार के योग की प्रतीक्षा बढ़ गई है। यहां तक कि मंत्रिमंडल में शामिल होने की तीव्र इच्छा रखने वाले अधिकांश दावेदार विधायक राजधानी में ही डेरा डाले हुए हैं और कमरा बंद बैठकों का दौर जारी है।

दरअसल, सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण का जितना महत्व प्रकृति में पढ़ने वाले प्रभाव के रूप में देखा जाता है वैसा ही कुछ राजनीति में महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों पर विचार किया जाता है,

लेकिन किसी सरकार को मंत्रिमंडल गठित करने में इतना लंबा समय लगे तो फिर आसानी से समझा जा सकता है कि यदि इसमें लापरवाही हुई तो फिर इससे दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। यही कारण है कि सत्ता और संगठन प्रदेश में पिछले दो 3 महीने से मंत्रिमंडल विस्तार की कसरत कर रहा है। कभी कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन तो कभी राज्यसभा चुनाव के कारण मंत्रिमंडल का विस्तार अब तक टलता रहा है लेकिन अब इसको और अधिक नहीं डाला जा सकता क्योंकि 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव की घोषणा भी कभी भी हो सकती है। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भी अब और इंतजार करने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि राज्यसभा चुनाव से फुर्सत होने के बाद एक बार फिर मंत्रिमंडल विस्तार की हलचल तेज हो गई है।

जिस तरह से राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रास वोटिंग हुई है उससे पार्टी की वह आशंका सही साबित हुई कि यदि राज्यसभा चुनाव के पहले मंत्रिमंडल विस्तार कर लिया जाता तो हो सकता है कि राज्यसभा के चुनाव में और भी ज्यादा क्रास वोटिंग हो जाती लेकिन पार्टी की तमाम सतर्कता, सावधानियां और निगरानी के बावजूद क्रास वोटिंग हो जाने से पार्टी नेतृत्व मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर नए सिरे से विचार विमर्श कर रहा है। प्रदेश में जिस तरह से सत्ता परिवर्तन हुआ है और विधायकों ने अब उपेक्षा बर्दाश्त करने की बजाय दलबदल को बेहतर समझा है और अभी तक उन्हें यह निर्णय सही भी लग रहा है क्योंकि दल बदल करके आए दो विधायक जहां कैबिनेट मंत्री बन चुके, वहीं 10 विधायकों का मंत्री बनना निश्चित है जबकि भाजपा के कुछ पूर्व मंत्रियों का मंत्री बनना अभी तक तय नहीं हो पाया है।

ऐसे में यदि किसी भी विधायक को यह आभास हो गया कि उसके साथ अन्याय हो रहा है उसकी उपेक्षा हो रही है तो फिर वह किसी भी बड़े निर्णय को लेने में संकोच नहीं करेगा। यहां तक कि जिन 24 सीटों में विधानसभा के उपचुनाव होना है उन सीटों पर 2018 में जो भाजपा प्रत्याशी रहे हैं वे भले ही चुनाव हार चुके हैं लेकिन पार्टी से अपने सम्मान की बात दो टूक शब्दों में रख रहे हैं और सम्मान बरकरार ना रखने पर पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे रहे हैं। एक प्रत्याशी तो पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो ही चुके हैं। वही पूर्व मंत्री दीपक जोशी के बारे में भी ऐसी ही आशंका है कि यदि उन्हें पार्टी की तरफ से पर्याप्त नहीं मिला फिर वे कांग्रेस पार्टी में शामिल होने से कोई संकोच नहीं करेंगे।

बहरहाल यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो फिर 24 जून को मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा राजनीतिक गलियारों में तैर रही है। राज्यसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर, जावड़ेकर और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे के साथ प्रदेश नेतृत्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा और संगठन महामंत्री सुहास भगत की लंबी चर्चा हुई है जिसमें मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भी सभी पहलुओं पर विचार किया गया और यह तय किया गया और सूची भी लगभग फाइनल हो गई थी लेकिन राज्यसभा के चुनाव के दौरान जिस तरह से गोपीलाल जाटव और जुगल किशोर बागरी का वोट बेकार हुआ एवं नागेंद्र सिंह का वोट किसी तरह बचा लिया गया। इसके बाद पार्टी नेतृत्व सकते में हैं क्योंकि इनके बारे में तो पार्टी विचार ही नहीं कर रही थी। यह विधायक इतनी बड़ी गलती कर देंगे। पार्टी तो लगभग एक दर्जन उन विधायकों पर निगाहें रखे रही जो सत्ता परिवर्तन के दौरान संदिग्ध थे।

जिनमें नारायण त्रिपाठी, शरद कौल जैसे विधायक प्रमुख थे। तब भी यह कहा जा रहा था यदि एकमुश्त सिंधिया के साथ 22 विधायक पाला बदल नहीं करते तब जितने भाजपा में कांग्रेसी विधायक आते कुछ उतने ही भाजपा से कांग्रेस में भी जा सकते थे। यही कारण था कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ बार-बार कह रहे थे कि सरकार को कोई खतरा नहीं है और अभी भी यदि सत्ता वापसी की बात कर रहे हैं तो उसके पीछे कुछ सीटें उपचुनाव के माध्यम से और कुछ पाला बदल करके और निर्दलीय सपा, बसपा के भी सत्ता प्रेमी विधायक कांग्रेस में आ सकते हैं। इन्हीं सभी परिस्थितियों को देखते हुए मंत्रिमंडल का विस्तार लगातार टलता आ रहा है लेकिन अब और अधिक नहीं टाला जा सकता लेकिन जब तक पूरी तरह सामंजस्य नहीं बन जाता तब तक के लिए दो बहाने भी तैयार है जिसमें एक राज्यपाल का बीमार होना तो दूसरा 20 जुलाई से विधानसभा का सत्र का होना यदि सब कुछ ठीक-ठाक हो गया तो कोई भी पड़ोसी राज्य का राज्यपाल आकर मंत्रियों को शपथ दिला सकता है लेकिन सब कुछ निर्भर करेगा तालमेल बनने के ऊपर।

क्योंकि इस समय पार्टी में नेताओं के बीच कदमताल का अभाव देखा जा रहा है और यदि राज्यसभा की तरह मंत्रिमंडल विस्तार के बाद कोई उठापटक हुई तो फिर 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव पर इसका असर पड़ सकता है और इसका सीधा मतलब होगा सरकार की स्थिरता पर ग्रहण लगना जिसे सत्ता और संगठन कभी नहीं चाहेगा। यही कारण है कि राजधानी में कमरा बंद बैठकों का दौर तेज हो गया है जिसमें ऐसी योग क्रियाओं को तलाशा जा रहा है जिसके माध्यम से मंत्रिमंडल में लगे ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचा जा सके।

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