समय ही गुरु, नेता और सरकार

वर्तमान दौर ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि समय ही सबसे बड़ा गुरु है समय ही सबसे बड़ा नेता है और समय ही सबसे बड़ी सरकार है सबके भ्रम तोड़ दिए हैं समय ने सब को आगाह कर दिया है समय ने और जो समय की आहट को समझेगा उसका ही तनाव रहित जीवन व्यतीत होगा।

दरअसल, पद, पैसा और प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में अधिकांश लोग ऐसे शामिल हो लिए जैसे यही सब कुछ हो लेकिन समय ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि यह सब बौने हो जाएंगे। जब समय अपने अस्तित्व का एहसास कराएगा। समय सदा उनका ही रहता है जो प्रकृति और ईश्वरीय सत्ता को सर्वोपरि मानते रहे हैं। जिन लोगों ने सत्य की उपेक्षा की सहजता सरलता को छोड़ा उनको समय ने भी नहीं बख्शा। कोरोना महामारी में एक बार फिर आगाह किया है कि समय के साथ चलो अन्यथा ऐसा भी समय आएगा जब सब घर बैठने को मजबूर हो जाएंगे जैसा कि पिछले कुछ दिनों से पूरी दुनिया में घर बैठना ही सुरक्षित माना जा रहा है।

बहरहाल प्रदेश में हर क्षेत्र में समय की सर्वोपरि सत्ता दिखाई दे रही है। रविवार को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं के दरबार सूने रहे क्योंकि हमारी के चलते स्वयं गुरुओं में अपील की थी कि वे आश्रमों में ना आकर घर बैठकर ही गुरु वंदना करें। जब गुरु ही समय के आगे मजबूर हैं तब शिष्यों की क्या बिसात ऐसा ही परिवर्तन समय ने राजनीति के दौर में भी दिखाया है। जब कांग्रेस सरकार गिराकर भाजपा में शामिल होने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के आगे भाजपा के नेता बौने साबित हो रहे हैं। भाजपा के दिग्गज नेता अपने एक एक समर्थक को मंत्री नहीं बना पाए जबकि सिंधिया ने जिसे चाहा उसे मंत्री बना दिया। पहली बार के जीते विधायक को मंत्री बना दिया है क्योंकि सरकार सिंधिया ने बनाई है। इस कारण कोई सिंधिया के निर्णय पर प्रश्न भी नहीं लगा रहा। यदि प्रश्न लगा रहे हैं तो भाजपा कोटे से नहीं बनने वाले विधायक जोकि चार पांच या फिर 6 बार के चुनाव जीतने वाले हैं।

प्रदेश में 24 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव ने भी समय की सत्ता महत्त्व कुछ ज्यादा ही स्थापित कर दिया है। सत्ताधारी दल भाजपा समय की नाज़ुक ता को समझते हुए प्रत्येक कदम फूंक फूंक कर उठा रही है मंत्रिमंडल विस्तार में ना केवल 2 महीने का समय लिया बरन भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों के कई दौर चले इसके बावजूद भी प्रदेश में जगह जगह से विरोध के स्वर मुखर होने लगे। यह अभी समय का ही खेल है जिस भाजपा में अनुशासन का डंडा चलता था। उसी भाजपा में अब कोई भी कुछ भी कह रहा है कर रहा है लेकिन पार्टी किसी के खिलाफ कुछ भी करने से बच रही है क्योंकि लगभग दो दर्जन से ज्यादा ऐसे विधायक हैं जिन्हें यदि ज्यादा झुकाया गया तो फिर भी टूट सकते। सो, पार्टी अभी ऐसे लोगों के सामने जरूर झुक रही है और वह उस समय का इंतजार कर रही है। जब ऐसे लोगों को सबक सिखाने का अनुकूल समय आएगा। अभी तो पार्टी जैसे तैसे आगे बढ़ने और 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव जीतने के लिए सधे कदमों से आगे बढ़ रही है। यहां तक कि मंत्रियों के विभागों के वितरण के लिए भी मुख्यमंत्री को दिल्ली जाना पड़ा है। विस्तार के 3 दिन बाद भी विभागों का वितरण ना हो पाना बता रहा है कि इसमें भी कम विवाद नहीं है। खासकर महत्वपूर्ण विभागों को लेकर सिंधिया समर्थकों और पार्टी के वरिष्ठ मंत्रियों के बीच वितरण करना आसान नहीं रह गया।

दूसरी तरफ विपक्षी दल कांग्रेस में भी समय का नियंत्रण गजब का दिख रहा है। जो कांग्रेस पार्टी पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को 22 विधायकों को संभाल नहीं पाई वही कांग्रेस अब वार्ड और पंचायत स्तर के नेता को महत्व दे रही है। 22 विधायकों पर दलबदल का आरोप लगाने वाले कांग्रेस भाजपा से कांग्रेस में आने वाले नेताओं को पलक पावडे बिछा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ राजधानी भोपाल में डेरा डाले हुए हैं और 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव जीतने के लिए हर जतन कर रहे हैं। इन सीटों पर तीन बार सर्वे करा चुके कमलनाथ सत्ता वापसी की उम्मीदों में जमीनी जमावट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में चले जाने के बाद अब प्रदेश कांग्रेस में मजबूत पकड़ बना चुके कमलनाथ के लिए यह समय कठिन परीक्षा का दौर लेकर आया है। खासकर 24 सीटों के परिणाम बताएंगे कि कमलनाथ की चक्की कितनी धीरे चली और कितना बारिक पीसा। लगभग 18 महीने की कांग्रेस सरकार के जाने के बाद कांग्रेसियों को जो दिन देखना पड़ रहे हैं उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। खासकर कांग्रेसी मंत्रियों ने बंगलों में जितना काम कराया उसके बाद अब खाली करने में भारी कष्ट का अनुभव हो रहा है। उन मंत्रियों को और भी दिक्कतें हो रही हैं जिनके राजधानी भोपाल में अपने मकान नहीं है जबकि कमलेश्वर पटेल जैसे मंत्री जिनका शाहपुरा सी सेक्टर में आलीशान बंगला है वह भी सरकारी बंगले में रहने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हंै।

पूर्व वित्त मंत्री तरुण भनोट को भाजपा सरकार ने बंगला खाली करने के लिए कुछ ज्यादा ही परेशान किया क्योंकि उनका बंगला सबसे अच्छा बनाया गया था लेकिन यह समय की बलिहारी है कि जिन्होंने बनाया वे बाहर हो रहे हैं और अब नए लोग इन बंगलों में आने के लिए आतुर है। कुल मिलाकर समय की सत्ता समय का नेतृत्व और समय का गुरुत्व इस समय अपना जलवा दिखा रहा है। समय ने सबके भरम तोड़ दिए हैं इसलिए ही शायद कहा गया है कि मानुष नहीं होत है, समय होत बलवान। भीलन लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।

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