आज चारों ओर से घिरा चीन या हम….?

हमारे भारत में एक कहावत प्रचलित है, ‘‘पड़ौसी से अच्छा कोई मित्र नहीं और पड़ौसी से बुरा कोई दुश्मन नहीं’’। आज हम इसी कहावत की सच्चाई के दौर से गुजर रहे है। आज हम अपनी व्यथाएँ भुलाने के लिए यह कहकर बड़े प्रसन्न है कि ‘‘चीन चारों ओर से घिर चुका है और वह अलग-थलग पड़ गया है’’ किंतु क्या इस कथन के आईने में हमने अपने आप को भी देखने का प्रयास किया?

आज हमारा ऐसा कौन पड़ौसी है, जो हमारे प्रति हमदर्दी रखता हो? अरे….. अब तो चीन ने नेपाल-भूटान जैसी हम पर अवलम्बित चींटियों को भी पंख प्रदान कर दिए और वे अब हमारी धरती पर उड़ान भरने के सपने संजों रही हे,

क्या कोई सोच सकता है कि पूरी दुनिया में हिन्दू राष्ट्र के नाम से ख्याति प्राप्त नेपाल हिन्दूओं की मातृभाषा हिन्दी से परहेज करने लगेगा और संसद में हिन्दी के प्रचलन के खिलाफ प्रस्ताव पेश करेगा? लेकिन चीन की दुम बना नेपाल अब पूरी तरह शी जिनपिंग चीनी राष्ट्रपति की गोद में बैठ चुका है और चीन की ही शह पर उत्तराखण्ड की हमारी चार सौ वर्ग कि.मी. जमीन पर कब्जा बताकर अपने देश का नक्शा बदलकर उसे वहां की संसद से पारित करवा लिया …..और हम मूक दर्शक की तरह हाथ पर हाथ रखे यह सब देखतें रहे, जबकि नेपाल को पता नहीं है कि यही स्थिति चलती रही तो नेपाल भी तिब्बत की तरह किसी दिन चीन का हिस्सा बन जाएगा, जहां तक भूटान का सवाल है वह अभी नेपाल की तरह खुलकर तो भारत के सामने खड़ा नहीं हुआ है, किंतु हमारी नदियों के पानी को रोकने को लेकर चर्चा में अवश्य आ गया है, जिसका भूटान ने खण्डन भी किया है।

यह तो हुई नेपाल-भूटान की बात अब यदि हम हमारे पड़ौसी पाकिस्तान की बात करें तो वह तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घोषित रूप से हमारा दुश्मन रहा है, वैसे ही वह आतंक पोषक देश के रूप में पूरे विश्व में विख्यात है, अब विश्व में आतंक के जनक रहे ओसामा बिन लादेन को पाक प्रधानमंत्री द्वारा ‘शहीद’ का दर्जा दे देने के बाद तो पाक को किसी विस्तृत परिचय की जरूरत ही खत्म हो गई। पाक का भी मुख्य संरक्षक चीन बना हुआ है, जो पाक की हर तरह से मद्द करता आ रहा है, भारत के खिलाफ उसे उकसाने की भूमिका भी इन दिनों वही निभा रहा है।
अब यदि हम वर्तमान हालातों का जिक्र करें तो एक ओर जहां चीन पुराने सभी सम्बंधों और समझौतों को भूलकर लद्दाख पर कब्जा करने का सपना देख रहा है और गलवान घाटी पर अपना कब्जा बता रहा है, वहीं उसने सीमा पर अपना पूरा सैनिक अमला, गोला-बारूद, टेंक आदि तैनात कर दिये है,

जवाब में भारत को भी ऐसा ही करने को मजबूर होना पड़ा है, पर आज सबसे बड़े खेद की वास्तविकता यह भी है कि चीन की इस करतूत की चिंता सिर्फ हमारी सेना को है, जबकि ऐसी विकट स्थिति में भारत सरकार व उसके आकाओं को कोई चिंता नहीं है, इसीलिए इस संकट के दौर में सत्तारूढ़ दल व उसके मंत्रियों ने चीन के बजाए प्रमुख प्रतिपक्षी दल से लड़ना-झगड़ना शुरूकर दिया है, तथा पन्द्रह-बीस साल पुराने गढ़े मुर्दे उखाड़कर उन पर रोना शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि 2005 में राजीव गांधी फॉउण्डेशन के लिए चीनी दूतावास से नब्बे लाख का चंदा लिया गया तथा प्रधानमंत्री सहायता कोस के पैसे का दुरूपयोग भी इस फॉउण्डेशन में किया गया और आश्चर्य यह कि कांग्रेस के नेताओं पर आरोप लगाने का यह सिलसिला राज्य स्तर तक भी पहुंचा दिया गया, जिसका ताजा उदाहरण पर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर केन्द्रीय मंत्री रहते चीन की सहायता करने के आरोप है।

आखिर आज के ये राजनेता यह क्यों भूल जाते है कि आज देश का हर नेता अपने हमाम (स्नानघर) में निर्वस्त्र है और यह सिलसिला यदि चल निकला तो फिर इसका अंत खोजना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए आज की सबसे बड़ी जरूरत तो हमारी सीमा पर अपने सैन्यबल के साथ खड़े हमारे दुश्मन से निपटने की है, न कि हमारे देश के विरोधी दल या उसके नेताओं से। किंतु किया क्या जाए, अब तो पिछले चार-पांच सालों से तो हमारे देश में यह आम चलन ही हो गया है कि देश में कोई बड़ी समस्या हो तो उससे देश का ध्यान हटाने के लिए कोई नया विवाद शुरू कर दे, फिर वो चाहे सीएए विवाद वाला समय हो या कि कोरोना महामारी वाला मौजूदा समय। अब तो यहां यही सरकारी चलन बन गया है, अब यदि हमारे ही सिक्के में कोई खोट है तो हम किससे जाकर शिकायत करें? इसलिए पूरा देश आज मौनदर्शक बने रहने को मजबूर है।

One thought on “आज चारों ओर से घिरा चीन या हम….?

  1. इस मजबूरी का कारण हम अंधे वोटर हैं जो बुद्धि हीन लंगूरों की अर्थहीन करतबों से खुश होकर उनके हाथ में अपना भविष्य सोंप देते हैं। हर बार फिर उसे दुहराते हैं।

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