nayaindia tribal navratri tradition जनजातीय नवरात्र परंपरा
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जनजातीय नवरात्र परंपरा

भारतीय संस्कृति में देवी पूजा को मुख्य माना गया है लेकिन जनजातीय संस्कृति में प्रकृति पूजन को मुख्य माना गया है। इसमें कोई शक नहीं कि विश्व में भारत से ही जनजातीय समाज और संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। जनजातीय संस्कृति में आदि देव फड़ा पेन और भगवान शिव एक ही हैं, अर्थात अद्वैत है। हमारा मूल एक ही है, इसलिए विघटनकारी व अपकारी शक्तियों द्वारा हमें बांटने का कुत्सित प्रयास कभी सफलीभूत नहीं होगा।

भारत में प्रकृति पूजन, शक्ति पूजन, नारी पूजन की अत्यंत प्राचीन, वृहत, समृद्ध और सम्मानजनक परम्परा रही है। इसमें ग्राम्य व शहरी, वनवासी व नगरवासी, जनजातीय व गैरजनजातीय सभी शामिल हैं। गौर से देखने पर इन सभी के रहन- सहन, रीति- रिवाज, सभ्यता- संस्कृति, विचार व मान्यताएं सभी एक जैसी ही लगती है, एक- दूसरे से मेल खाती प्रतीत होती हैं। शक्ति अर्थात देवी पूजन भी एक ऐसी ही परम्परा है, जिसकी अवस्थिति भारत में सर्वत्र दिखाई देती है। इससे सम्बन्धित उत्सव शारदीय नवरात्रि का त्यौहार भी एक ऐसा पर्व है, जो ग्रामीण, शहरी, वनवासी सभी क्षेत्रों में  समारोहपूर्वक धूमधाम से मनाया जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि हम बहुसंख्यक भारतीय, जिन्हें हिन्दू कहा जाता है, एक हैं। वनवासी जनजातीय समाज सनातन हिन्दू धर्म का सदा से ही एक अभिन्न अंग रहा है।

भले ही सभ्यताओं के विकास एवं लगातार विदेशीय व सांस्कृतिय आक्रमणों के कारण जनजातीय समाज के स्थान परिवर्तन एवं परम्पराओं, संस्कृति, विवाह, रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, बोली एवं कार्यशैली में आंशिक अन्तर दिखता हो, किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सनातन हिन्दू समाज की जनजातीय एवं गैर जनजातीय दोनों ही इकाईयों का मूल तत्व एवं केन्द्र हिन्दुत्व की धुरी ही है। हमारे निवास स्‍थान, रहन-सहन लम्बे समय से अलग- अलग रहने के कारण थोड़े पृथक हो गए हैं, फिर भी आंतरिक रूप से सभी समन्वित हैं। जिन्हें देखकर भारत के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म से जनजातीय वनवासी समाज को अलग परिभाषित करने के सभी विभाजनकारी षड्यंत्र ध्वस्त होते प्रतीत होते हैं। आज भी गाँव- गाँव में ग्राम्य अर्थात गाँव देवी, वनदेवी, देवी मंडप, बाघ देवी, ज्वाला माई, सती देवी, धूमावती, मालादेवी, खेरमाई माता, टोंगरी देवी, डूंगरी माता, सरना देवी के मन्दिर,मंडप, पट, मढ़िया व अन्यान्य देवी से सम्बन्धित प्रतीक स्थल विद्यमान हैं।

शहरों में तो देवी मन्दिरों व देवी स्थलों की भरमार ही है, जिनमें सभी वर्ग के प्रकृति, शक्ति पूजक नित्यप्रति अपनी श्रद्धासुमन अर्पित करने वालों की भारी भीड़ एकत्रित होती है। और तीर्थ स्थलों पर तो इनकी महिमा का बखान करना सह्स्त्रों मुख वाले शेषनाग से भी सम्भव नहीं है। नवरात्रि के अवसरों पर तो इनकी शोभा देखते ही बनती है। नवरात्र में सम्पूर्ण सनातन समाज की विभिन्न शाखाएं अलग -अलग ढंग से आदिशक्ति की पूजा कर उनसे सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। शारदीय नवरात्रि का पर्व वन्य, ग्रामीण व शहरी सभी क्षेत्रों में दुर्गोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

नौ दिनों तक मनाई जाने वाली इस पूजा में माता दुर्गा के सभी नौ स्वरूपों की पूजा होती है। फिर भी वनवासी क्षेत्रों की नवरात्रि पूजा ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से तनिक भिन्‍न है। इनके नामों व पूजा पद्धति में विविधता है। वनवासी देवी माता से सुख- समृद्धि, अच्‍छी फसल, वर्षा व प्रकृति संरक्षण की याचना करते हैं। यही कारण है कि जनजातीय समाज को सनातन संस्कृति का वाहक माना जाता है। जनजातीय समाज में देवी- देवताओं की पूजा, आराधना, उपासना और पर्वों को उल्लास से मनाने का प्रचलन अतिप्राचीन काल से निरंतर चला रहा है। आज भी नवरात्र के पर्व पर जनजाति समाज के द्वारा विभिन्न देवी स्थलों पर अनुष्ठान किये जाते हैं और विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है।

नवरात्रि पर्व के समय पूरे देश में जहां आदि शक्ति की उपासना हर्षोल्लास के साथ होती है, वहीं दूसरी ओर जनजातीय क्षेत्रों में भी जनजाति समाज पूरी श्रद्धा और निष्ठा से मां की उपासना करता है। गाँवों में, जंगलों में जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है। जहां आज भी जनजातीय समाज हिन्दू संस्कृति के ऐक्य भाव को समाहित कर माता भगवती की उपासना करते हैं। पूजन पद्धति भले ही अलग हो, लेकिन ऐसे कई मन्दिर गाँव, शहर और आसपास मौजूद हैं, जहां सैकड़ों वर्षों से जनजाति अनवरत पूजन करने पहुंचते हैं। उरांव, मुण्डा, खड़िया, संथाली, पहाड़िया आदि तो ग्रामीण, कस्बाई, शहरी क्षेत्रों में निवास करने के कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं की भांति ही देवी मंडपों, देवी मन्दिरों व पूजा पंडालों में जाकर नवदुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा- अर्चना करते हैं। वासन्तीय व शारदीय नवरात्रि के अवसरों पर इन देवी स्थलों पर पूजन हेतु उमड़ने वाली जनजातीय समुदाय की महिलाओं की भीड़ से ही इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

भील समाज में नवणी पूजा, गोंड समाज में खेरो माता, देवी माई की पूजा, झारखण्ड में दसांय नृत्य से उपासना, मध्यप्रदेश के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में डूंगरी माता, गुजरात के जौनसार-बावर में अष्टमी पूजन, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में जइया (जवा) पूजा, गुमला जिले में श्रीबड़ा दुर्गा मन्दिर कोरकू समाज में देव-दशहरा के रुप में देवी माँ की पूजा होती है। भील समाज में नवणी पर्व नवणी में भील अपनी कुलदेवी व दुर्गा-भवानी का पूजन करते हैं। यह त्यौहार अश्विन अर्थात क्वार के महीने में शुक्ल पक्ष की पड़वा से प्रारम्भ होता है। इस अवसर पर पूरे वर्षभर में हुई गलतियों के लिये सभी देवी-देवताओं से क्षमा याचना करते हैं। झारखण्ड के जनजाति समाज के लोग माता आदिशक्ति की आराधना कुछ अनूठे ढंग से करते हैं। जनजाति समाज में देवी उपासना दसईं (दसांय) नृत्य के माध्यम से की जाती है। यहाँ स्थानीय जनजातीय समाज की परम्परा में नवरात्र के महाषष्ठी के दिन से देवी की पूजा शुरू होती है।

जनजातीय परम्परा के अनुसार जल भरण के दिन जनजाति समाज के लोग स्नान करके गाँव के जाहेरथान में पहुंचते हैं। इस दौरान पूरे विधि -विधान के साथ आदिशक्ति की उपासना की जाती है। जनजातीय वाद्य यंत्र की पूजा के बाद जाहेरस्थान पर दसांय नृत्य शुरू होता है। इस स्थान से निकलने के बाद महा दशमी के पूर्व तक जनजाति समाज के लोग घर-घर जाकर धूप जलाते हैं। यह पर्व जनजातीय नृत्य एवं संगीत के बिना अधूरा है। गुजरात के जौनसार-बावर में नवरात्र में देवी दुर्गा के नौ रूपों में से सिर्फ अष्टमी अर्थात महागौरी की ही पूजा होती है। प्रत्येक परिवार में घर का मुखिया नवरात्र की अष्टमी को व्रत रखता है, दिन में हलवा-पूरी से मां का पूजन किया जाता है, शाम को मांसाहार से भी कोई परहेज नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों में नवरात्र पर्व मनाने का अपना पृथक अंदाज है।

गुजरात में नवरात्र में डांडिया व गरबा की धूम रहती है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा मुख्य है। इसी तरह से हर राज्य में नवरात्र के नौ रूपों की विधिवत पूजा होती है। सम्पूर्ण देश में पहाड़ों की पुत्री मां शैलपुत्री, विशेष कृपा करने वाली मां ब्रह्मचारिणी, चांद की तरह दमकने वाली चंद्रघंटा, पूरा जगत अपने पैर में समाने वाली कूष्मांडा, कार्तिक स्वामी की मां स्कंदमाता, कात्यायन आश्रम में जन्मी कात्यायनी, काल का नाश करने वाली कालरात्रि, सफेद दिव्य कांतिवाली महागौरी, सर्वसिद्धि प्रदान करने वाली मां सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना की जाती है।

उल्लेखनीय है कि भारत के जनजातीय समाज में बड़ा देव को मूल माना गया है, वही भारतीय संस्कृति में शिव के रूप में शिरोधार्य हैं। लेकिन दोनों सनातन धर्म का ही पालन कर रहे हैं। जनजातीय और गैर जनजातीय संस्कृति में समानता दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति में देवी पूजा को मुख्य माना गया है लेकिन जनजातीय संस्कृति में प्रकृति पूजन को मुख्य माना गया है। इसमें कोई शक नहीं कि विश्व में भारत से ही जनजातीय समाज और संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। जनजातीय संस्कृति में आदि देव फड़ा पेन और भगवान शिव एक ही हैं, अर्थात अद्वैत है। हमारा मूल एक ही है, इसलिए विघटनकारी व अपकारी शक्तियों द्वारा हमें बांटने का कुत्सित प्रयास कभी सफलीभूत नहीं होगा। पाश्चात्य विद्वानों और तथाकथित सेक्यूलरों द्वारा जनजातीय समाज में मूर्ति पूजा का निषेध बताकर विभेद पैदा करने की इनकी कोशिश मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है।

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