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नमक-बयानी के दौर में प्रश्न-शून्य उपासना

भारत के कर्णधारों को नमक-नमक करने का पूरा हक़ है। आख़िर भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक-उत्पादक है। अगर पहले क्रम पर होने के बावजूद अमेरिका और दूसरे क्रम पर होने के बावजूद चीन के हुक़्मरान अपने देशवासियों पर नमक का कर्ज़ नहीं लादते हैं तो कोई ज़रूरी है कि हम भी वही मूढ़ता करें? …हमें तो भारत से नमक मंगाने वाले 55 देशों को बार-बार यह याद दिलाना चाहिए कि वे हमारा नमक खाते हैं। फुदकिए कि भारतवासी ही क्या, तक़रीबन आधी दुनिया गुजरात का नमक खाती है।…

गांधी जयंती के अगले दिन महामहिम राष्ट्रपति अपनी पहली गुजरात यात्रा पर गईं तो उन्होंने हमें बताया कि सभी देशवासी गुजरात का नमक खाते हैं। महामहिम हैं, सो, जो कहा है, अपने हिसाब से तो ठीक ही कहा होगा। फिर उन गांधी के गुजरात में कहा, जिन्होंने पूरे 92 साल पहले नमक-क़ानून के ख़िलाफ़ साबरमती आश्रम से नवासारी तक 24 दिन की पदयात्रा की थी, तो सही ही कह रही होंगी। इसलिए मुझे महामहिम की सोच पर, उनकी समझ पर और उनके विवेक पर पूरा विश्वास है।

लेकिन उदित राज को महामहिम की बात पसंद नहीं आई। उन्होंने कह दिया कि यह चमचागिरी की हद है। उदित दलित हैं, सो, उनकी दलील है कि वे, आदिवासियों की प्रतिनिधि बन कर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं, महामहिम की कही बात पर अपनी निजी राय ज़ाहिर कर सकते हैं। मैं नहीं जानता कि दलित होने से उन्हें यह अधिकार स्वयमेव मिल जाता है या नहीं, लेकिन मैं मानता हूं कि ‘चमचागिरी’ शब्द का इस्तेमाल कर के उदित ने ख़ुद की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा लिया। महामहिम की नमक-बयानी से महामहिम के माहात्म्य पर अनुकूल असर पड़ा या प्रतिकूल, मुझे नहीं मालूम।

नमक-प्रसंग ने मुझे गुज़री फरवरी के तीसरे रविवार की भी याद दिला दी। उस दिन प्रधानमंत्री जी उत्तर प्रदेश के हरदोई में थे। राज्य के 16 विधानसभा क्षेत्रों में तीसरे चरण का मतदान हो रहा था, लेकिन हरदोई में तीन दिन बाद चौथे चरण का मतदान था। जनसभा में प्रधानमंत्री जी ने विस्तार से बताया कि किस तरह उनके पास एक वीडियो पहुंचा है, जिसमें एक वृद्ध महिला से पत्रकार बात कर रहा है और महिला कह रही है कि हमने मोदी का नमक खाया है, उन्हें धोखा थोड़े ही देंगे। महिला कह रही है कि मोदी ने हमें राशन दिया, हम उनका दिया खा रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी पुलकित थे कि जो बूढ़ी मां कभी उनसे मिली नहीं, वह भी उन्हें आशीर्वाद दे रही है। प्रधानमंत्री जी अपने को सौभाग्यशाली बता रहे थे। मैं भी मानता हूं कि प्रधानमंत्री जी सचमुच भाग्यवान हैं कि ऐसे देशवासियों की कमी नहीं है, जो कोरोना-महामारी के दौरान मिले राशन के एहसान तले अपने को दबा मानते हैं। मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं हूं कि प्रधानमंत्री जी ने चुनावी सभा में इस प्रसंग का पूरी तफ़सील से ज़िक्र इसलिए किया कि लोगों को इस नमक का कर्ज़ अदा करने के कर्तव्यपथ पर चलने की याद दिलाएं। वे तो दरअसल इस कृतज्ञता भाव से भरे हुए थे कि नमक तो ख़ुद उन्होंने देश का खाया है और इस नमक का कर्ज़ चुकाने के लिए वे देश सेवा में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे।

मैं इस मामले में अज्ञानी हूं कि कौन हैं, जो सचमुच सियासी-नमक की दरोगाई कर रहे हैं, और कौन हैं, जो उसकी ख़रीद-फ़रोख़्त में लगे हैं। लेकिन इतना मैं ज़रूर जानता हूं कि नमक की रखवाली और नमक की तिज़ारत में बड़ा फ़र्क़ है।  गांधी जी के दांडी मार्च से भी पांच-छह साल पहले प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘नमक का दरोगा’ लिखी थी। बचपन में प्रेमचंद को पढ़ कर बड़े हुए लोगों को यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि नमक की दरोगाई कर रहे वंशीधर को अपनी कर्तव्यनिष्ठा की क्या कीमत चुकानी पड़ी थी और नमक के व्यापारी पंडित अलोपीदीन के किए-कराए में न्यायमूर्तियों को क्यों कोई दोष नज़र नहीं आया था? राजनीति में नमक की बाज़ार-व्यवस्था के दस्तूर चूंकि जस-के-तस हैं, इसलिए सियासी नायक-नायिकाओं पर आज यह तोहमत नहीं लगाई जा सकती है कि वे इस बात का ज़िक्र करने के लिए होड़मंद क्यों हैं कि किसने किसका नमक खाया है?

भारत के कर्णधारों को नमक-नमक करने का पूरा हक़ है। आख़िर भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक-उत्पादक है। अगर पहले क्रम पर होने के बावजूद अमेरिका और दूसरे क्रम पर होने के बावजूद चीन के हुक़्मरान अपने देशवासियों पर नमक का कर्ज़ नहीं लादते हैं तो कोई ज़रूरी है कि हम भी वही मूढ़ता करें? आख़िर हम तीन करोड़ टन नमक का सालाना उत्पादन करते हैं। इसमें से एक करोड़ टन हर साल निर्यात हो जाता है। सवा करोड़ टन अलग-अलग औद्योगिक इकाइयों में इस्तेमाल हो जाता है। लेकिन बाकी का 15 ग्राम तो हर रोज़ 140 करोड़ भारतवासियों की धमनियों में प्रवाहित हो ही रहा है। क़ायदे से तो एक व्यक्ति को रोज़ाना ढाई ग्राम से ज़्यादा नमक खाना ही नहीं चाहिए। आप पर तो साढ़े 12 ग्राम प्रतिदिन का अतिरिक्त कर्ज़ चढ़ रहा है। लेकिन इसकी चिंता में दुबले होते-होते भी हमें तो भारत से नमक मंगाने वाले 55 देशों को बार-बार यह याद दिलाना चाहिए कि वे हमारा नमक खाते हैं। फुदकिए कि भारतवासी ही क्या, तक़रीबन आधी दुनिया गुजरात का नमक खाती है।

बहरहाल। अगर मैं महामहिम से यह उम्मीद करूं कि वे नमक-किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की हिमायत करें तो क्या यह ज़रा ज़्यादा हो जाएगा? नमक-किसान भी बाकी किसानों की तरह कम परेशान नहीं हैं। नमक केंद्र का विषय है। लेकिन उसे बनाने के लिए जो ज़मीन चाहिए, वह राज्य का विषय हैं। सो, नमक के दो पिता हैं। दोनों सोचते हैं कि दूसरा संतान का ध्यान रख लेगा। ऐसे में संतान बेहाल घूम रही है। अरसे से मांग हो रही है कि एक नया नमक-क़ानून बने, जो पूरे देश पर समान रूप से लागू हो। प्रधानमंत्री जी नमक-क़िस्सागोई करते-करते अपनी किसी जनसभा में इस बारे में कोई ऐलान क्यों नहीं करते?

अगर आपको यह लगता है कि नमक-कथन के पीछे महामहिम का इरादा देशवासियों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का था तो आपको समझाना मेरे वश के बाहर की बात है। अगर आपको लगता है कि नमक-वृत्तांत सुनाने के पीछे प्रधानमंत्री जी की नीयत रामरस-ऋण न चुकाने वालों को धिक्कारने की थी तो मैं आपसे इस बहस में नहीं उलझना चाहता। जिन्हें नकारात्मक सोचने की आदत ही पड़ गई हो, उनसे कैसे कोई बात करे? महामहिम और प्रधानमंत्री क्या कोई ऐसे ही बन जाता है? कबूतर छोड़ने वाला देश क्या ऐसे ही चीते छोड़ने लगता है?

बड़े लोग जब कुछ कहते हैं तो उनकी बातों में कुछ अर्थ होता है। उनकी बातों का आशय समझने के लिए बुद्धि लगती है। सिर्फ़ फालतू सवाल उठाते रहने से बुद्धि विकसित नहीं हो जाती है। बुद्धिमान वह होता है, जो प्रश्न खड़े नहीं करता है। परमात्मा भक्ति से प्राप्त होते हैं और भक्ति-मार्ग प्रश्नरहित होता है। जब अविश्वास समाप्त हो जाता है, जब सारे प्रश्न और तर्क तिरोहित हो जाते हैं, तब साधना का मार्ग प्रशस्त होता है। साधना से श्रद्धा का द्वार खुलता है। संपूर्ण विश्वास, अनवरत साधना और अटूट श्रद्धा से ही मनुष्य श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त करता है। कुछ समझे? तो, श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त करनी है या ऐसे ही सवाल-जीवी बने रह कर सड़ते रहना है?

इसलिए मैं ने तो अपने सारे सवाल उठा कर खूंटी पर टांग दिए हैं। भीतर-ही-भीतर वे खदबदाते भी हैं तो अब मैं उनकी अनदेखी का अभ्यास कर रहा हूं। पूरी ज़िंदगी इनके चक्कर में निकाल दी। क्या मिल गया? गांधी जी का इशारा भी नहीं समझा। नमक-सत्याग्रह याद रहा, मगर उनके तीन बंदरों की कहानी मैं भूल गया। याद रखता तो किसी छोटी-मोटी टेकरी पर तो बैठा होता। ये, जो बैठे हैं, उन्हीं बंदरों की आचरण-संहिता के सहारे बैठे हैं। उनकी ताली-थाली, उन्हें मुबारक़! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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