काशी बनाम देवरिया के ब्राह्मणों से बदलेगी राजनीति?
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काशी बनाम देवरिया के ब्राह्मणों से बदलेगी राजनीति?

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काशी में ब्राह्मणों की सियासत वर्षों से काशी और देवरिया के ब्राह्मणों के बीच बंटी रही है। काशी के ब्राह्मणों का जुड़ाव पंडित कमलापति त्रिपाठी के औरंगाबाद हाउस से रहा तो देवरिया के ब्राह्मणों से संबंधित दूसरा वर्ग संकटमोचन के महंत रहे स्वर्गीय वीरभद्र मिश्र परिवार से जुड़ा बताया जाता है। इसके असर से विधानसभा चुनाव में सत्तारुढ़ भाजपा प्रभावित होगी तो ब्राह्मण सपा की ओर जा सकते हैं। Brahmins- kashi vs deoria

लखनऊ। पीएम नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में काशी बनाम देवरिया के ब्राह्मणों का मुद्दा आगामी चुनावों में नई सियासी इबारत लिखेगा। इसका आगाज काशी में कांग्रेस पार्टी की पहचान रहे पंडित कमलापति त्रिपाठी के औरंगाबाद हाउस के चश्मोचिराग ललितेशपति के देश की सबसे पुरानी पार्टी से इस्तीफा देने से है। इसके असर से विधानसभा चुनाव में सत्तारुढ़ भाजपा भी प्रभावित होगी।

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, यूपी के सीएम और केन्द्रीय मंत्री रहे पंडित कमलापति त्रिपाठी की चौथी पीढ़ी के कांग्रेसी ललितेश पति त्रिपाठी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। ललितेश मिर्जापुर के मड़िहान विधानसभा से 2012 में विधायक थे और प्रियंका गांधी की नई टीम  के अध्यक्ष अजय कुमार “लल्लू” के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे हैं। ललितेश त्रिपाठी का कांग्रेस छोड़ने का मूल कारण काशी के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा को यूपी कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने को माना जा रहा है।औरंगाबाद हाउस की दूसरी समस्या कभी दरबारी रहे मकसूद खान को उपाध्यक्ष बनाया जाना भी है। मकसूद ललितेश के पिता राजेशपति त्रिपाठी के सिपहसालार रहे हैं। ललितेश और मकसूद का एक साथ कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाया जाना काशी की सियासत का गढ़ रहे औरंगाबाद हाउस को रास नहीं आया। विरोध में ललितेशपति ने शनिवार को पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

कांग्रेस के ब्राह्मण नेता जितिन प्रसाद के बाद कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष ललितेशपति त्रिपाठी का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा झटका है। ललितेश त्रिपाठी और उनके पिता राजेश पति की मान मनौव्वल के लिए पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद पिछले दिनों वाराणसी पहुंचे थे। लेकिन राजेशपति के सिपहसालार रहे मकसूद खान को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाये जाने के मुद्दे को लेकर बात नहीं बनी। हालांकि कुछ लोग मान रहे हैं कि कांग्रेस में कोई स्कोप न देख सुरक्षित भविष्य के लिए ललितेशपति ने यह कदम उठाया है।

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ललितेशपति त्रिपाठी की चार पीढ़ियों का कांग्रेस से पुराना नाता रहा है। माना जा रहा है कि ललितेशपति त्रिपाठी जल्द ही समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं और 2022 विधानसभा चुनाव मिर्जापुर के अपनी पुरानी मड़िहान सीट छोड़कर मझवां सीट से लड़ सकते हैं। उन्नाव की पूर्व सांसद अनु टंडन औरंगाबाद हाउस पर समाजवादी झंडा लगवाने के अभियान में लगी हुई हैं। अगर ऐसा हुआ तो ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग सपा से जुड़ सकता है। ऐसे में वाराणसी में यादव, ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरण का पहला प्रयोग देखने को मिलेगा। इसका असर वाराणसी के आसपास के जिलों में भी हो सकता है। औरंगाबाद हाउस का काशी के अलावा चंदौली, सोनभद्र और मीरजापुर के ब्राह्मणों में अच्छा प्रभाव माना जाता है।

काशी में ब्राह्मणों की सियासत वर्षों से काशी और देवरिया के ब्राह्मणों के बीच बंटी नजर रही है। काशी के ब्राह्मणों का जुड़ाव विशुद्ध सियासी पंडित कमलापति त्रिपाठी के औरंगाबाद हाउस से माना जाता है जबकि देवरिया के ब्राह्मणों से संबंधित दूसरा वर्ग आस्था का एक महत्वपूर्ण केन्द्र माने जाने वाले संकटमोचन के महंत रहे स्वर्गीय वीरभद्र मिश्र परिवार से जुड़ा बताया जाता है। संकट मोचन मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसके जंगल में गोस्वामी तुलसीदास को तपस्या के दौरान हनुमान जी ने दर्शन दिए थे।

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कांग्रेस पार्टी के सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए इन दोनों समुदायों में कभी कोई सियासी संघर्ष नजर नहीं आया। लेकिन अब कांग्रेस के कमजोर पड़ने के बाद अंदरखाने दोनों वर्गों में वर्चस्व की जंग मुखर हो गयी है।

काशी के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा भी मूल रूप से देवरिया से हैं। उनका संकट मोचन मंदिर की पीठ से भी नजदीकी जुड़ाव है। इसका लाभ ले राजेश मिश्रा 2004 में वाराणसी लोकसभा सीट से सांसद बन गये। लेकिन कमलापति के पुत्र, लोकपति त्रिपाठी उनके पुत्र राजेशपति और फिर खुद ललितेशपति चंदौली और मीरजापुर से कई बार चुनाव लड़ने के बावजूद संसद नहीं पहुंच सके। कांग्रेस में रहने के बावजूद दोनों वर्गों के बीच अदावत का ये एक बड़ा कारण बन गया है। अब राजेश मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने की सुगबुगाहट ने इस अदावत में आग में घी डालने का काम कर दिया है।

2017 में हुए विधानसभा चुनाव राजेश मिश्रा ने वाराणसी दक्षिणी से चुनाव लड़ा था। तब भाजपा के टिकट पर देवरिया के ही एक ब्राह्मण नेता नीलकंठ तिवारी चुनाव जीतने में सफल रहे थे। नौ बार के विधायक श्यामदेव राय चौधरी का टिकट काटकर भाजपा ने नीलकंठ तिवारी को मैदान में उतारा था। तब नीलकंठ ने कांटे के मुकाबले में राजेश मिश्रा को हराया था। कुछ लोग मानते हैं कि काशी बनाम देवरिया की टसल के कारण औरंगाबाद हाउस ने राजेश मिश्रा का साथ नहीं दिया था। माना जाता है कि काशी के ब्राह्मणों का भी देवरिया के राजेश मिश्रा को सहयोग मिल जाता तो परिणाम कुछ और होता।

काशी और देवरिया के ब्राह्मणों का अंदरखाने होने वाला सत्ता संघर्ष आगे खुलकर देखने को मिल सकता है। कांग्रेस का झंडा छोड़कर औरंगाबाद हाउस पहली बार किसी दूसरी पार्टी के चुनाव निशान पर मैदान में होगा। ऐसे में काशी और देवरिया के ब्राह्मणों की जंग भी नये रूप में नजर आयेगी। इस जंग की चपेट में वाराणसी दक्षिण से फिर मैदान में उतरने की सूरत में यूपी के मंत्री देवरिया के नीलकंठ भी आ सकते हैं।

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