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अमरसिंह के फेर में मुलायम ने बहुत कुछ गंवाया!

मुलायम दृढ़ इच्छा शक्ति वाले थे। लेकिन एक बिल्कुल नए संसार, कल्चर ने उनकी इस इच्छा शक्ति को कमजोर कर दिया। उन्हे जनमानस और पार्टी में बेगाना बनाया। वह थे अमर सिंह। जिन्होने उन्हें चकाचौंध की दुनिया दिखाई और उसमें वे सम्मोहित हो गए। बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान जैसे मुलायम सिंह के दाएं बाएं बाजू भी उनसे अलग हो गए। सामान्य लोग भी उनसे कट गए।

एक दिन में मुलायम सिंह यादव पर बहुत तरह से, बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी कई पहलुओं से लिखा जाएगा। मगर हमें जो बात सबसे खास लगती है वह यह है कि मुलायम सिंह ने अपना सर्वश्रेष्ठ समय अमर सिंह के साथ की वजह से बहुत गंवाय। बाद में अखिलेश और रामगोपाल यादव ने अमर सिंह के साथ सही सलूक किया था। मगर तब तक देर हो चुकी थी। और उसके बाद फिर संघर्षशील मुलायम वापसी नहीं कर पाए। 2007 में पहली बार मायावती पूर्ण बहुमत से सत्ता में आईं। और शायद सत्ता का वह आखिरी मौका भी था। अब वे भी इतिहास की चीज बन गई हैं।

खैर वह अलग विषय है। मगर मुलायम के साथ इसलिए याद आता है कि दोनों ने सिर्फ एक गलत फैसला लिया। और उसके बाद जिसे जापानी में हाराकिरी कहते हैं। खुद अपनी राजनीति खत्म कर ली। मुलायम ने अमर सिंह पर निर्भर होकर और मायावती ने भाजपा पर।

बहरहाल विषय मुलायम सिंह यादव हैं जो पिछले करीब पेंतीस – चालीस साल में उत्तर भारत की राजनीति में कई बार धूमकेतू की तरह चमके। बहुत संभावनाएं दिखाईं मगर उस शिखर तक नहीं पहुंच पाए जहां के लिए उस तीन- चार दशक की उथल पुथल की राजनीति में अवसर थे।

मुलायम सिंह की ताकत क्या थी? किसान जातियां। जिनकी ताकत को सबसे पहले चौधरी चरणसिंह ने पहचाना था। अजगर राजनीति के जरिए। अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत। पारंपरिक रुप से चारों कांग्रेस और भाजपा विरोधी। मगर गांवों में, छोटे शहरों में अपना असर रखने वाली। खेती और पशुपालन से जुड़ी इन जातियों के बल पर ही चरणसिंह ने लोकदल बनाया था। मुलायम तभी उनसे जुड़े थे। मगर यह बात कम लिखी गई है कि और शायद जानकारी में भी कम ही आई है कि अहीर की बात करने के बावजूद चरणसिंह मुलायम सिंह यादव को पसंद नहीं करते थे। और अपने नजदीकी लोगों के बीच उसके जो आधार बताते थे वे सामंती सोच के थे। व्यंग्य में कहते थे। इसको बोलना तो आता नहीं। मुख्यमंत्री क्या बनेगा? यह मुलायम के तुतलाने, अस्पष्ट उच्चारण पर तंज होता था। कभी कभी इससे भी आगे जाकर वे उनके छोटे कद पर व्यंग्य करते थे। कि इतने छोटे आदमी को कोई मुख्यमंत्री कैसे मानेगा।

एक बार इसका जवाब देते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने चरणसिंह से कहा भी कि लालबहादुर शास्त्री और नेपेलियन भी छोटे कद के थे। मगर बहुत बड़ा काम कर गए। लेकिन जैसा कि चरणसिंह का स्वभाव था कि असहमत विचार नहीं सुनते थे। इसे भी नहीं सुना। बेनी प्रसाद वर्मा ने भी अमर सिंह के वर्चस्व से परेशान होकर मुलायम का साथ छोड़ा था। मगर मुलायम के लिए उनके दिल में एक साफ्ट कार्नर हमेशा रहा। तब भी जब वे कांग्रेस में शामिल हो गए। केन्द्र में मंत्री बन गए। और राहुल उन्हें बहुत पसंद करने लगे यहां तक कि यूपी के चुनावों में उन्हें लौह पुरुष तक बोलने लगे तब भी वे आपसी बातचीत में बोलते थे कि मुलायम बड़ा नेता है। और साथ ही चरण सिंह वाली बात बताते हुए बोला था कि चरण सिंह उन्हें पहचान नहीं पाए।

सभ्यता, शिष्टाचार का एक सामान्य नियम है कि किसी के शारिरिक दोष या कमी का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता। लेकिन हमारे यहां यह सभ्य आचरण बहुत समझा नहीं जा सका। राजनीति में भी उन चीजों को लेकर उपहास भाव रहता है जो मनुष्य के वश में नहीं है। उसे प्रकृति द्वारा मिली हैं। चरण सिंह अकेले नहीं थे आज भी ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो शारिरिक व्याधियों का मजाक उड़ाते हैं।

लेकिन मुलायम दृढ़ इच्छा शक्ति वाले थे। उन पर इन वाहियात प्रतिक्रियाओं का कभी असर नहीं पड़ा। लेकिन एक बिल्कुल नए संसार, कल्चर ने उनकी इस इच्छा शक्ति को कमजोर कर दिया था। अमर सिंह ने जो उन्हें चकाचौंध की दुनिया दिखाई उसमें वे सम्मोहित हो गए।

यहां एक घटना बताते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान जैसे मुलायम सिंह के दाएं बाएं बाजू तो उनसे अलग हुए ही सामान्य लोग भी उनसे कट गए। जिन्हें कोई काम नहीं था। सामान्य शिष्टाचार के नाते मुलायम से मिलते थे वे भी अमर सिंह के एरोगेन्ट और सबको इस तरह देखना कि कोई काम से आया है रवैये के कारण दूर हो गए। 2007 में मुलायम हार गए। मायावती ने अपना सबसे विस्फोटक बयान दे दिया कि मरे को क्या मारना! उसके बाद एक दिन संसद के गलियारे में अमर सिंह टकरा गए। 2003 में जब मुलायम मुख्यमंत्री बने तब से अमर सिंह ने मिलना जुलना तो बंद किया ही। नजरें मिलाना भी बंद कर दिया था।

ऐसे बहुत सारे नेता हैं जो सत्ता में आते ही आसमान की तरफ देखते चलते हैं कि किसी जान पहचान वाले से नजर न मिल जाए। नहीं तो मुस्कराना पड़ेगा या उसके नमस्कार का जवाब देना पड़ेगा। ये नेता हर पार्टी में हैं। अगर पार्टी वाइज देखा जाए तो सबसे ज्यादा कांग्रेस में। कांग्रेस के बड़े नेताओं का अहंकार तो आसमान छूता ही है, मझौले और चिरकुट नेताओं का उनसे भी ज्यादा। भाजपा में मिलने जुलने से कतराने वाले नेता सबसे कम हैं। वे पुराने संबंधों को याद रखते हुए दुआ सलाम बनाए रखते हैं।

तो खैर अमर सिंह जी टकरा गए। सारी हेकड़ी निकल चुकी थी। तो मुस्कराए। रुके। और ऐसे में जब लंबे समय बाद कोई नेता या खुद को बड़ा आदमी समझने वाला बात करता है तो वह शिकायत से ही करता है। तो जनाब बोले मुसलमानों ने हरवा दिया। अब इसका क्या जवाब होता? हमने कहा बहुत अच्छा किया। आप यह समझने लगे थे अमिताभ, सहारा श्री, अंबानी ,जयाप्रदा, दूसरे सेलिब्रीटी आपको चुनाव जीते देंगे? और मुसलमानों ने क्या ब्राहम्णों, यादवों के अलावा दूसरे ओबीसी और सभी समुदायों ने आपको वोट नहीं दिया। क्यों देता?

आपके किसी से न मिलने जुलने और चकाचौंध भरी दूसरी ही दुनिया में रहने के कारण समाज का हर वर्ग आपसे दूर हो गया था। जाहिर है कि अमर सिंह जी ने इसका विरोध किया। और हमने फिर और उदाहरण देना शुरु किए। मतलब बात बढ़ गई। और लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। उनमें बहुत सारे सांसद भी थे। हर पार्टी के।

खैऱ बात खत्म होने के बाद जो जाहिर है तल्खी पर ही खत्म हुई। बहुत सारे सांसदों ने हमें बधाई दी। कहा आपने सही बात कही। इनमें बीजेपी, कांग्रेस लेफ्ट सभी पार्टी के लोग थे।

और हम भी यह बात यहां खत्म करते हैं इस आखिर बात को बताते हुए कि सीपीआईएम के सीताराम येचुरी ने क्या कहा। जो हमें याद है उन्होंने कहा कि बिल्कुल सही। अमर सिंह की वजह से ही मुलायम सिंह हारे। यहां यह बता दें कि उस समय लेफ्ट यूपी में औपचारिक रुप से सपा की सरकार का समर्थन कर रही थी। येचुरी ने एक बहुत खास बताई। कहा कि इन चार सालों में कामरेड सुरजीत या हम कभी मुलायम सिंह से अकेले नहीं मिल पाए। हमेशा अमर सिंह साथ होते थे। इसी से आप समझ सकते हैं कि अमर सिंह का कितना असर था। और उसका कितना नुकसान हुआ।

अखिलेश और रामगोपाल यादव द्वारा सख्ती से अमर सिंह को विदा करने के बाद मुलायम सिंह के समझ में आया कि उन्हें कितना नुकसान हो चुका है। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। और मुलायम फिर जिनके लिए कहा जाता था कि जलवा कायम है। जलवा विहिन हो चुके थे। फिऱ वापसी संभव नहीं हो पाई।

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