up lakhimpur kheri violence प्रियंका लाइमलाइट में, सपा असहज
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प्रियंका लाइमलाइट में, सपा असहज

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी की वारदात से राज्य में सियासी माहौल गर्म है। पूरा विपक्ष लखीमपुर में केन्द्रीय मंत्री के बेटे द्वारा किसानों को रौंदे जाने की घटना को लेकर सड़क पर है। राज्य मंत्री और उनके बेटे की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है। विपक्षी आंदोलन की धुरी प्रियंका गांधी बनी हैं। अपने जुझारू तेवर और योगी सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार किये जाने से प्रियंका गांधी कई दिनों से न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया का मुख्य आकर्षण बनी हुई हैं। इससे मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी असहज नजर आ रही है। विपक्षी दलों के आंदोलन के बीच अब कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी में तल्खियां बढ़ने लगी हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आज एलान किया कि वे कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेंगे। up lakhimpur kheri violence

कुछ सियासी पंडितों का मानना है कि यूपी की सत्तारूढ़ भाजपा एक योजना के तहत प्रियंका और कांग्रेस पर फोकस कर रही है जिससे कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में नजर आये। प्रियंका को गिरफ्तार कर भाजपा कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में लाना चाहती है। ऐसा कर भाजपा सरकार से नाराज वोटरों को एकतरफा सपा के पक्ष में जाने से रोक कर विरोधी मतों को विभाजित करना चाहती है।

यूपी में कमजोर पार्टी की नेता होने के बावजूद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने जिस अंदाज में जुझारू तेवर का प्रदर्शन किया है उससे वे विपक्षी आंदोलन के केन्द्र में आ गयी हैं। शांतिभंग की आशंका में सीतापुर में गिरफ्तार होने के बावजूद प्रियंका गांधी ने अपनी सक्रियता से यूपी सरकार की मशीनरी की नाक में दम कर दिया है। दूसरी तरफ यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा महज छिटपुट धरना प्रदर्शन कर विपक्षी धर्म का निर्वहन करती नजर आ रही है।

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अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व लखीमपुर की घटना के बाद प्रियंका ने जिस अंदाज में अपनी गिरफ्तारी देकर मौके को भुनाया उससे उनकी सियासी समझ का भी परिचय मिला है। दूसरी तरफ अखिलेश एक अच्छे अवसर को भुनाने में चूक गये। लखीमपुर मामले से प्रियंका यूपी की सियासत में अचानक मुख्य चर्चा में आ गई हैं तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कहे जाने वाली सपा और उसके नेता अखिलेश यादव माहौल बनाने में नाकामयाब नजर आ रहे हैं। इससे यह संदेश भी जा रहा है कि अखिलेश यादव में पिता मुलायम सिंह जैसी सियासी समझ और जुझारूपन की कमी है और वे आम लोगों के हितों के लिए सड़क पर उतरने की क्षमता नहीं रखते हैं।

एक ओर सपा और कांग्रेस जमीनी स्तर पर किसानों के लिए लड़ रही है, तो दूसरी ओर राज्य का एक अन्य प्रमुख विपक्षी दल बसपा महज ट्वीटर और बयानों से ही अपनी प्रासंगिकता साबित करने में लगी है। बसपा ट्विटर, ब्राह्मण और जातीय सम्मेलन के माध्यम से जुबानी जंग लड़ रही है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव की कांग्रेस के प्रति नाराजगी आज साफ नजर आयी। अखिलेश यादव एक प्रमुख न्यूज चैनल से बात करते हुए प्रियंका गांधी से खफा नजर आये। उनकी नाराजगी प्रियंका गांधी के एक बयान को लेकर थी। प्रियंका के हाल के कमेंट पर भड़के अखिलेश ने चैनल से कहा कि प्रियंका तो कमरे में बंद थीं, वो हमारा संघर्ष नहीं देख पाईं। दरअसल प्रियंका गांधी ने पिछले दिनों एक बयान में कहा था कि, ”समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मैदान में संघर्ष करती नहीं दिखतीं।

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आप क्या कर रहे हैं, ये आपको बताना चाहिए। दूसरी पार्टियों के नेताओं पर उंगली उठाने का आपको कोई हक नहीं है।” प्रियंका के इस बयान पर अखिलेश यादव ने कहा कि सबसे ज्यादा संघर्ष समाजवादियों ने किया है। सबसे ज्यादा लाठियां समाजवादियों ने खायी हैं। इसलिए किसी को ये टिप्पणी करने की जरुरत नहीं है कि कौन क्या कर रहा है। इस दौरान अखिलेश यादव ने साफ किया कि वो अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि पुराना अनुभव ठीक नहीं था।

मालूम हो कि 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने गठबंधन किया था। लेकिन विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। 2017 के चुनाव में सपा 232 सीट से घटकर 47 पर और कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई थी।

यूपी की सियासत के जानकार एक नेता ने कहा कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने रणनीति के तहत लखीमपुर खीरी के मुद्दे को हैंडल किया है। एक रणनीति के तहत विरोधी वोट समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस को भी मिले इसलिए भाजपा द्वारा इस पूरे विवाद को तूल दिया जा रहा है। यूपी में कांग्रेस का ग्राफ़ बढ़ेगा तो इसका सीधा नुकसान अखिलेश यादव को होगा। अब आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सपा को अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए।

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