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पुष्टि मार्ग के प्रणेता वल्लभाचार्य

Vallabhacharya Jayanti 2022

वल्लभाचार्य के मत में भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह को पुष्टि और इस विशेष अनुग्रह से उत्पन्न होने वाली भक्ति को पुष्टिभक्ति कहा जाता है। जीवों के तीन प्रकार हैं- पुष्टि जीव, मर्यादा जीव और प्रवाह जीव। भगवान के अनुग्रह पर निर्भर रहते हुए नित्यलीला में प्रवेश के अधिकारी बनने वाले पुष्टि जीव, वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करने वाले मर्यादा जीव और जगत प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखों की प्राप्ति हेतु सतत चेष्टारत रहने वाले  प्रवाह जीव हैं। Vallabhacharya Jayanti 2022

26 अप्रैलश्री वल्लभाचार्य जयंती:  भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता वेद शास्त्र पारंगत श्रीवल्लभाचार्यजी (विक्रम संवत 1535-1588 ) का प्रादुर्भाव विक्रम संवत 1535 तदनुसार सन 1479 ईस्वी के वैशाख कृष्ण एकादशी, जिसे वरूथिनी एकादशी कहा जाता है, के दिन सोमयाजी कुल के तैलंग ब्राह्मण लक्ष्मण भट्ट दीक्षित और इलम्मागारू दम्पति के यहाँ हुआ था। वल्लभाचार्य के पूर्वज भारत देश के आंध्र प्रदेश राज्य में स्थित गोदावरी के पास कांकरवाड नाम के स्थान के निवासी और जाति के ब्राह्मण थे तथा उनका गोत्र भरद्वाज था। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रमण के भय से जब इनके माता-पिता व परिजन दक्षिण भारत की ओर जा रहे थे, तब मार्ग में ही छत्तीसगढ़ के रायपुर नगर के निकट  चम्पारण्य में वल्लभाचार्य का जन्म हुआ। इनके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट दीक्षित अत्यंत प्रकांड विद्वान और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। और माता इल्लम्मगारू विजय नगर के राजपुरोहित शर्मा की बेटी थी। विवाह के बाद लक्ष्मण भट्ट के यहाँ सरस्वती और सुभद्रा नाम की दो कन्या और एक पुत्र की उत्पति हुई। वल्लभाचार्य का अधिकांश समय काशी, प्रयाग और वृंदावन में ही व्यतीत हुआ। काशी में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, और वहीं उन्होंने अपने मत का उपदेश भी दिया। वल्लभाचार्य के पिता लक्ष्मण भट्ट ने वल्लभाचार्य को गोपाल मंत्र की दीक्षा बाल्यकाल में ही दे  दी थी। वल्लभाचार्य अल्पवय से ही कुशाग्र व तीव्र बुद्धि के स्वामी थे, और बचपन में ही इन्हें पुराण, दर्शन, वेदांग, काव्यादि में प्रवीणता प्राप्त हो चुकी थी। हिन्दू धर्मं के साथ ही वैष्णव, जैन, बौद्ध आदि अन्य धार्मिक संप्रदाय की भी इन्हें प्रयाप्त जानकारी थी। इन्होंने अपने ज्ञान के बल पर बनारस के प्रसिद्ध लोगों में अपना स्थान बना लिया था।

बाद में विधिवत रूप से रुद्र संप्रदाय के विल्वमंगलाचार्यजी द्वारा इन्हें अष्टादशाक्षरगोपालमंत्र की दीक्षा और त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्रतीर्थ के द्वारा प्रदान की गई। इनका विवाह पंडित श्रीदेवभट्टजी की कन्या- महालक्ष्मी से हुआ और यथासमय इन्हें दो पुत्र- श्री गोपीनाथ व श्रीविट्ठलनाथ हुए। कालक्रम में भगवत्प्रेरणावश वल्लभाचार्य ब्रज में गोकुल पहुंचे और ब्रजक्षेत्र अवस्थित गोव‌र्धन पर्वत पर अपनी गद्दी स्थापित कर शिष्य पूरनमल खत्री के सहयोग से संवत 1576 में श्रीनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जहाँ विशिष्ट सेवा पद्धति के साथ लीला गान के अंतर्गत श्रीराधाकृष्ण की मधुरातिमधुर लीलाओं से संबंधित वल्लभाचार्य सृजित रसमय पदों की स्वरलहरी का अवगाहन कर भक्तजन निहाल हो जाया करते थे। वल्लभाचार्य को वैश्वानरावतार अर्थात अग्नि का अवतार कहा गया है। वर्तमान में इनके द्वारा प्रणीत सम्प्रदाय  वल्लभ सम्प्रदाय अथवा पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। और वल्लभसम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय अन्तर्गत आते हैं। ऐसा माना जाता है कि वल्लभाचार्य के चौरासी शिष्य थे, जिनमें सूरदास, कृष्णदास, कुम्भनदास और परमानन्द दास प्रमुख थे।

उल्लेखनीय है कि सगुण और निर्गुण भक्ति धारा के दौर में वल्लभाचार्य ने रुद्र सम्प्रदाय के प्रवर्तक विष्णु स्वामी के दर्शन का अनुसरण तथा उन्नयन करके अपना शुद्धताद्वैत मत का निर्माण व अपना दर्शन स्वयं निर्मित कर पुष्टिमार्ग को प्रतिष्ठित, परिपोषित किया था। वल्लभाचार्य ने दार्शनिक समस्याओं के समाधान में अनुमान को अनुपयुक्त मानकर शब्द प्रमाण को वरीयता दी है। वस्तुतः वल्लभाचार्य वैदिक मतावलम्बी ही थे, और उनके मत वैदिक मत ही हैं, उनके मत का मूल वेद ही है, बस उन्होंने ब्रह्म को श्रीकृष्ण कहा है। उनके अनुसार भी तीन ही तत्व मुख्य व स्वीकार्य हैं -ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा अर्थात परमात्मा, प्रकृति और आत्मा। ब्रह्म के तीन स्वरूप वर्णित हैं- आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी रूप। वेद की भांति ही ईश्वर, जगत और जीव- इन तीन तत्वों को केंद्र में रखकर ही उन्होंने जगत और जीव के प्रकार और इनके परस्पर संबंधों का रहस्योद्घाटन किया। उनके अनुसार भी ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है जो सर्वव्यापक और अंतर्यामी है। श्रीकृष्ण भक्त होने के कारण ही उन्होंने श्रीकृष्ण को ब्रह्म मानकर उनकी महिमा का वर्णन किया है। अनंत दिव्य गुणों से युक्त षोडश कलायुक्त पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को ही परब्रह्म स्वीकारते हुए उनके मधुर रूप एवं लीलाओं को ही जीव में आनंद के आविर्भाव का स्रोत माना गया है। जगत ब्रह्म की लीला का विलास है। संपूर्ण सृष्टि लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्म-कृति है। वल्लभाचार्य के अद्वैतवाद में माया का संबंध अस्वीकार करते हुए ब्रह्म को कारण और जीव जगत को उसके कार्य रूप में वर्णित कर तीनों शुद्ध तत्वों की साम्यता प्रतिपादित की गई है। इसी कारण ही उनके मत को शुद्धताद्वैतवाद कहते हैं।

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वल्लभाचार्य के मत में भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह को पुष्टि और इस विशेष अनुग्रह से उत्पन्न होने वाली भक्ति को पुष्टिभक्ति कहा जाता है। जीवों के तीन प्रकार हैं- पुष्टि जीव, मर्यादा जीव और प्रवाह जीव। भगवान के अनुग्रह पर निर्भर रहते हुए नित्यलीला में प्रवेश के अधिकारी बनने वाले पुष्टि जीव, वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करने वाले मर्यादा जीव और जगत प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखों की प्राप्ति हेतु सतत चेष्टारत रहने वाले  प्रवाह जीव हैं। भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के निमित्त विष्णु के वैकुण्ठ लोक से ऊपर स्थित व्यापी वैकुण्ठ में नित्य क्रीड़ाएं करते हैं। इसी व्यापी वैकुण्ठ का एक खण्ड गोलोक माना गया है। इस गोलोक में यमुना, वृन्दावन, निकुंज व गोपियां सभी नित्य विद्यमान हैं। भगवद्सेवा के माध्यम से वहाँ भगवान की नित्य लीलासृष्टि में प्रवेश ही जीव की सर्वोत्तम गति है। वल्लभाचार्य का दार्शनिक सिद्धांत शंकर के माया वाद का खंडन करने वाला शुद्धताद्वैत सिद्धांत है। उन्होंने माया को ब्रह्मा की शक्ति के रूप में निरुपित करते हुए यह भी प्रमाणित किया कि ब्रह्मा उसके आश्रित नहीं हैं। उनके लिए श्रीकृष्ण ही परमब्रह्म हैं, जो परमानंद रूप हैं- परम आनन्द के दाता हैं। उनके अनुसार ब्रह्मा श्रीकृष्ण का वह अविकृत रूप हैं, जो हर स्थिति में बने रहते हैं। वह शुद्ध अद्वैत हैं। रमण की इच्छा से वे नर का रूप ग्रहण करते है, जहाँ मुख्य आशय जीवन के सुख और कल्याण हैं। इस प्रकार वल्लभाचार्य का भक्ति चिन्तन जीव के मध्य एक घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करता हैं । जहाँ ब्रह्मा लीला भूमि में संचरित होकर भी शुद्ध हैं,और जीव उससे तदाकार होकर आनन्द की उपलब्धि करता है।

वल्लभाचार्य ने अनेक भाष्यों, ग्रन्थों, नामावलियों, एवं स्तोत्रों की रचना की है। शुद्धताद्वैत के संदर्भ में वल्लभाचार्य द्वारा भागवत पर रचित सुबोधिनी टीका का महत्त्व बहुत अधिक है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य व वृहद ब्रह्मसूत्र भाष्य, श्रीमद् भागवत पर सुबोधिनी टीका और तत्वार्थदीप निबंध नामक ग्रन्थ के साथ ही पूर्व मीमांसा भाष्य, गायत्री भाष्य, पत्रावलंवन, पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम, दशमस्कंध अनुक्रमणिका, त्रिविध नामावली, शिक्षा श्लोक, सेवाफल और भगवत्पीठिका, न्यायादेश, सेवा फल विवरण, प्रेमामृत आदि शामिल हैं। इन्होने षोडश ग्रन्थों व अष्टक ग्रन्थों की भी रचना की है। वल्लभाचार्य रचित षोडश ग्रन्थों में यमुनाष्टक, बाल बोध, सिद्धांत मुक्तावली, पुष्टि प्रवाह मर्यादा भेद,  सिद्धान्त, नवरत्न, अंत:करण प्रबोध, विवेकधैयश्रिय, कृष्णाश्रय, चतुश्लोकी, भक्तिवर्धिनी, जलभेद, पंचपद्य, संन्सास निर्णय, निरोध लक्षण मुख्य हैं। विविध अष्टक ग्रन्थों में मधुराष्टक, परिवृढ़ाष्टक, नंदकुमार अष्टक, श्री कृष्णाष्टक,  गोपीजनबल्लभाष्टक आदि हैं। वल्लभाचार्य के इन अष्टकों का स्पष्ट प्रभाव कृष्ण भक्ति में अष्ट छाप काव्य के रूप में आज भी दृष्टिगोचर होता है ।

उल्लेखनीय है कि विशिष्टाद्वैत वादी पुष्टिमार्ग के संस्थापक वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ ने ही आगे चलकर अष्टछाप कवियों की परि कल्पना की, जिन्हें कृष्ण सखा कहा गया। इनमें चार वल्लभाचार्य के शिष्य और शेष चार विट्ठलनाथ के शिष्य हैं। इसमें वल्लभाचार्य के शिष्यों में सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास और कृष्णदास हैं, तो विट्ठलनाथ के शिष्य – नंददास, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी और चतुर्भजदास भी शामिल हैं। वल्लभ संप्रदाय में अष्टछाप कवियों का विशेष स्थान है। मान्यता है कि गोवर्धन में श्रीनाथ की प्रतिष्ठा होने पर मंगलाचरण श्रृंगार से लेकर संध्या आरती और शयन तक समस्त विधि में यही भक्ति कवि अष्टछाप सेवा में संलग्न रहते थे।  अष्टछाप के कवियों में सूरदास सर्वोपरि हैं। वल्लभाचार्य ने ही सूरदास को श्रीनाथजी के मंदिर में होने वाली आरती में नए पद की रचना करके गाने का सुझाव दिया था। सूरदास के हजारों पद सूरसागर में शामिल किए गए हैं। वल्लभाचार्य ने 52 वर्ष की आयु में विक्रम संवत 1588 सन 1530 में काशी में हनुमानघाट पर गंगा में प्रविष्ट होकर जल समाधि ले ली, परन्तु वे आज भी पूजनीय हैं, और उनके मतावलम्बी आज भी बैशाख कृष्ण एकादशी के दिन उनकी जयंती भक्ति भाव से मनाते हैं। उनके सम्मान में भारत सरकार ने सन 1977 में एक रुपये मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया था।

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