जीत ‘सुनिश्चित’ संकट और संशय ‘स्वीकार्यता’ का..

राज्यसभा की 3 सीटों के लिए मतदान उस वक्त हो रहा है, जब मध्य प्रदेश में सरकार बदल चुकी। राज्यसभा की सीट को लेकर जिन मतभेदों के चलते राजा-महाराजा महाराजा आमने सामने आकर खड़े हो गए उन दोनों का ही राज्यसभा सांसद बनना तय है.. वह बात और है कि जब यह स्क्रिप्ट आगे बढ़ रही है

तब कमलनाथ मुख्यमंत्री नहीं रहे।कांग्रेस और उनके नेताओं ने क्या खोया क्या पाया यह किसी से छुपा नहीं ..दिग्विजय सिंह जरूर लगातार दूसरी पारी राज्यसभा में खेलने जा रहे हैं.. यानी कि राजा न सिर्फ कांग्रेस और उसके राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए बल्कि कमलनाथ के लिए भी व्यक्तिगत तौर पर मजबूरी से ज्यादा जरूरी साबित होंगे ..जब भी कमलनाथ का मध्य प्रदेश से मोहभंग होगा तब क्या कांग्रेस पर दिग्विजय सिंह का कब्जा नजर आएगा.. बिना उनको भरोसे में लिए न तो नेता प्रतिपक्ष और ना ही कमलनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर प्रदेश का अध्यक्ष कोई बन पाएगा।

यह संभावना इसलिए क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में राज्यसभा सांसद रहते प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व में हुए चुनाव के दौरान राजा ने समन्वयक की भूमिका निभाई.. जिसका प्रतिफल उन्हें मिला जो एक बार फिर राज्यसभा में भेजा जा रहा है.. भले ही इसके लिए कांग्रेस को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी ..यदि सरकार नहीं रही तो कमलनाथ जी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए.. यही नहीं कभी कांग्रेस में रहते जिन्हें पार्टी नई पीढ़ी का नेता मान कर चल रही थी.. उन ज्योतिरादित्य को भी पार्टी ने खो दिया.. गुटबाजी के चलते कांग्रेस और उसके नेता इस पर खुशी जाहिर कर सकते हैं.. लेकिन जब मुकाबला भाजपा और मैदानी लड़ाई का होगा तो आम कार्यकर्ता को सिंधिया जरूर याद आएंगे.. कुल मिलाकर सरकार को दांव पर लगाकर यदि कमलनाथ अपने दोस्त दिग्विजय सिंह को राज्यसभा में देखना चाहते हैं.. तो निश्चित तौर पर उनकी राजा से भविष्य को लेकर कुछ अपेक्षाएं जरूर होंगी ..ऐसे में अब जब सिंधिया गुट का कांग्रेस में सफाया हो चुका दिग्विजय सिंह की रणनीति गौर करने लायक होगी।

खासतौर से जब उनके समर्थकों की उम्मीद जागेगी.. तो कमलनाथ के समर्थक माने जाने वाले विधायक जिसमें पूर्व मंत्री और दूसरे नेताओं से अनबन क्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी.. सवाल उपचुनाव में कांग्रेस से कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में से आखिर कौन चेहरा बनकर सामने आएगा.. आखिर मध्यप्रदेश में भविष्य की कांग्रेस का निर्माण किसकी देखरेख और अगुवाई में होगा.. आने वाले समय में दिग्विजय सिंह एक बार फिर सांसद बनने के बाद राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनेंगे या फिर उनका फोकस और कार्यक्षेत्र मध्यप्रदेश ही बनेगा ..फिलहाल दिग्विजय और कमलनाथ के लिए यदि बड़ी चुनौती उपचुनाव में भाजपा को शिकस्त देना है.. तो अपनी ही पार्टी के पराजित उम्मीदवार फूल सिंह बरैया को भरोसे में लेकर आगे बढ़ना भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा.. राज्यसभा में हार के बाद फूल सिंह जिन्हें कांग्रेस द्वारा विधानसभा का उपचुनाव लड़ाए जाने की चर्चा है.. उन्हें दिग्विजय कितनी गंभीरता से लेंगे.. उधर भाजपा की ओर से ज्योतिरादित्य के साथ डॉ सुमेर सिंह का भी राज्यसभा चुनाव जीतना पक्का है ..ज्योतिरादित्य अपने राजनीतिक जीवन की नई पारी भाजपा से राज्यसभा सांसद के तौर पर शुरू करने जा रहे हैं ।

वह भी तब जब वह उन अपनों के निशाने पर है ..जिनके साथ उन्होंने कभी कांग्रेस में काम किया और पिछला विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था.. बाद में कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया.. लेकिन उनके द्वारा बनवाई गई कमलनाथ सरकार भी चली गई.. जो काम शिवराज की भाजपा चुनाव में नहीं कर पाई उसे अंजाम तक भी पहुंचा दिया ..इस नई पारी में सिंधिया स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि वह पार्टी कार्यकर्ताओं का भरोसा जीत कर दिखाएंगे .. कोरोना के चलते बनती बिगड़ती परिस्थितियों में उनका प्रत्यक्ष तौर पर कार्यकर्ताओं से आमना-सामना नहीं हो पा रहा है.. वह बात और है कि वीडियो कांफ्रेंस और दूसरे माध्यम के जरिए पार्टी के जिम्मेदार नेताओं के संपर्क में वह लगातार बने हुए.. इस दौरान कांग्रेस द्वारा आरोप लगाकर उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई.. बावजूद इसके उन्होंने सियासी तौर पर कोई जवाब न देकर धैर्य और संयम का परिचय ही दिया है।

वह बात और है कि कांग्रेस में रहते यही धैर्य और संयम जवाब दे गया था.. जिनके समर्थन में विधायकों ने इस्तीफा और मंत्रियों ने कुर्सी छोड़ दी उन्हें उनका सम्मान और पावर फिर देना सिंधिया के लिए चुनौती बना हुआ है ..शिवराज कैबिनेट में अभी सिर्फ 2 समर्थक मंत्री बन पाए है.. बड़ी चुनौती उपचुनाव में इनकी जीत सुनिश्चित कर विधानसभा पहुंचाना है.. तो खुद ज्योतिरादित्य केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की चर्चाओं पर विराम लगना भी बाकी है.. यानी ज्योतिरादित्य को मोदी और शिवराज दोनों मंत्रिमंडल के विस्तार का इंतजार रहेगा.. कोरोना के सोशल डिस्टेंस के चलते जनता और अपने समर्थकों के दिल पर राज करने वाले ज्योतिरादित्य को कोई नया रास्ता अख्तियार करना होगा.. जिससे उनकी पुरानी छवि को मजबूती मिल सके।

सिंधिया भले ही मोदी शाह और नड्डा की पसंद बन कर भाजपा में आए.. लेकिन गृह प्रवेश में उन्हें तालमेल आने वाले समय में शिवराज सिंह चौहान नरेंद्र सिंह तोमर और अध्यक्ष रहते विष्णु दत्त शर्मा से तो बनाकर ही आगे बढ़ना होगा.. सवाल क्या भाजपा में कांग्रेस की तरह सिंधिया गुट अस्तित्व में आएगा.. तो खुद ज्योतिरादित्य संघ के कितने निकट पहुंच पाएंगे.. कांग्रेस में रहते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की जिस कुर्सी पर उनकी नजर थी.. क्या उसी तरह ज्योतिरादित्य भविष्य में भाजपा का चेहरा बनना चाहेंगे.. वह भी तब जब पीढ़ी परिवर्तन के दौर से गुजर रही ..भाजपा में ग्वालियर चंबल से ही जुड़े विष्णु दत्त शर्मा भाजपा का नया चेहरा बनकर सामने है.. और नरेंद्र सिंह तोमर केंद्रीय मंत्री के तौर पर शिवराज के विकल्प माने जाते हैं.. सवाल भाजपा की ओर से डॉ सुमेर सिंह एक आदिवासी चेहरे के तौर पर राज्यसभा में पहुंच रहे हैं ..बावजूद इसके उच्च सदन में जब भी मध्यप्रदेश की चर्चा होगी तो वहां एक बार फिर राजा और महाराजा आमने सामने खड़े नजर आएंगे.. दोनों मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेंगे जो लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं.. देखना दिलचस्प होगा कभी अपनी शर्तों पर ही सही विशेष मौके पर एक साथ कदमताल करने वाले यह दोनों दिग्गज बदलती भूमिका में आखिर मध्य प्रदेश के हित की लड़ाई लड़ेंगे तब कौन बाजी मारेगा।

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