vijaya dashami ravan dahan अच्छाई की विजय की विजयादशमी
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अच्छाई की विजय की विजयादशमी

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी की तिथि तक शारदीय नवरात्र में नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति भाव से आराधना- उपासना किये जाने की पौराणिक परिपाटी है। नवरात्रि में नौ दिनों तक शक्ति की उपासना काल में आत्मनिरीक्षण व आत्मशुद्धि प्राप्त करने के बाद दसवें दिन आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी का पर्व धूमधाम व समारोहपूर्वक मनाया जाता है। विजयादशमी का अर्थ है -दस पर विजय प्राप्त करना। अर्थात पांच ज्ञानेंद्रियों व पांच कर्मेंद्रियों पर विजय प्राप्त करना। मनुष्य इन्हीं दस इन्द्रियों से बुराई करता है, इसलिए इंद्रियों को विषयों से बचाना, उन पर विजय प्राप्त करने का नाम विजया दशमी है। अपनी इंद्रियों को जीतने वाला मनुष्य संसार को जीत लेता है। इसी प्रकार दशहरा का अर्थ है- दस को हराने वाला अर्थात दसों इंद्रियों को काबू में रखने वाला। दश हरा एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है- अपने अंदर के दस दुष्कर्मो- अहंकार, अमानुषता, अन्याय, किसी को दुःख देना, क्रोध , लोभ, मद, मत्सर अर्थात ईर्ष्या, मोह अर्थात किसी से लगाव, स्वार्थ को परास्त कर देना। vijaya dashami ravan dahan

इसीलिए यह दसों पर विजय अर्थात विजयादशमी कहा जाता है। यही कारण है कि आश्विन शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक शक्ति की उपासना से आत्मनिरीक्षण व आत्मशुद्धि के पश्चात दशमी की तिथि को अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की जीत, बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप दशहरा का पर्व समारोहपूर्वक भक्ति- भाव के साथ मनाया जाता है। वर्तमान में इसमें अपराजिता देवी की पूजा होती है। विजयादशमी पर्व क्षात्र शक्ति की उपासना का पर्व है। क्षत्रिय की परिभाषा करते हुए कहा गया है-

प्रजानां रक्षणं दानं इज्याध्ययन मेव च।

विषयेषु अप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।।

अर्थात – प्रजा की रक्षा करना, दान करना, यज्ञ करना, स्वाध्याय करना, विषय वासनाओं से सदैव बचके रहना, यह क्षत्रिय के लक्षण बताए हैं।

भारत के प्राचीन इतिहास में बहुत से राजा- महाराजा विषयी होने से अनेक प्रकार की विदेशी आक्रांताओं से परास्त हुए हैं। इसलिए क्षत्रियों को विशेष कर विषय-वासना भोग, शराब इत्यादि से दूर रहने का विधान किया गया है। जिस देश का राजा और सेना जितने सुरापान करने वाले होंगे देश उतना ही असुरक्षित होगा।

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति के विषय में अनेक कथाएं प्राप्य व कई किम्बदंतियाँ श्रुत्य हैं। इसलिए दशहरोत्सव के सम्बन्ध में अनेक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। इस अवसर पर भारत में नये अन्नों की हवि देने, द्वार पर धान की हरी एवं अनपकी बालियों को टाँगने तथा गेहूँ आदि को कानों, मस्तक या पगड़ी पर रखने के कृत्य प्राचीन काल से होते देख कुछ लोग कहते हैं कि यह कृषि का उत्सव है। कुछ लोगों का मत है कि यह रणयात्रा का द्योतक है, क्योंकि दशहरा के समय वर्षा समाप्त हो जाती है, नदियों की बाढ़ थम जाती है, धान आदि अन्न कोष्ठागार में रखे जाने के कार्य सम्पन्न हो जाते हैं।

इसलिए यह उत्सव इसी रणयात्रा से सम्बंधित है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी राजाओं के युद्ध प्रयाण के लिए यही ऋतु निश्चित होते देख इस मत को बल मिलता है। इस अवसर पर भारत में शमी पूजन की परम्परा भी अत्यंत प्राचीन है। अथर्ववेद, 7/11/1 के अनुसार वैदिक यज्ञों के लिए शमी वृक्ष में उगे अश्वत्थ अर्थात पीपल की दो टहनियों (अरणियों) से अग्नि उत्पन्न की जाती थी। अग्नि शक्ति एवं साहस की द्योतक है, शमी की लकड़ी के कुंदे अग्नि उत्पत्ति में सहायक होते हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण, 1/2/1/16 एवं 1/2/1/7 आदि में भी अग्नि एवं शमी की पवित्रता एवं उपयोगिता का वर्णन अंकित हैं।

इस उत्सव का सम्बंध नवरात्र से भी है क्योंकि इसमें महिषासुर के विरोध में देवी के साहसपूर्ण कृत्यों का भी उल्लेख होता है और नवरात्र के उपरांत ही यह उत्सव होता है। दशहरा अर्थात दसेरा शब्द दश अर्थात दस एवं अहन्‌‌ से ही बना है।

विजयादशमी अर्थात दशहरा पर्व शुद्ध रूप से सामाजिक पर्व है। विजयादशमी दस इन्द्रियों और असत्य पर सत्य, बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता, अन्याय पर न्याय, दुराचार पर सदाचार, तमोगुण पर दैवीगुण, दुष्कर्मों पर सत्कर्मों, भोग पर योग, असुरत्व पर देवत्व और जीवत्व पर शिवत्व की विजय का पर्व है। इसका इतिहास से कोई लेना देना नहीं है, परन्तु  पौराणिक मान्यतानुसार अनुसार आश्विन शुक्ल दशमी के दिन ही श्रीराम ने रावण का वध किया था, इसलिए इस दिन विजयादशमी का पर्व के साथ रावण दहन की परम्परा चल पड़ी। कथा के अनुसार दशानन रावण श्रीराम की पत्नी सीता का अपहरण कर लंका ले गया था। श्रीराम युद्ध की देवी माता दुर्गा के अनन्य भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान आश्विन शुक्ल पक्ष के पहले नौ दिनों तक माता भगवती की पूजा की और दसवें दिन लंकाधिपति रावण का वध किया।

इसके बाद श्रीराम ने भाई लक्ष्मण, भक्त हनुमान, और बंदरों की सेना के साथ एक भयंकर युद्ध में विजयी होने के बाद माता सीता को छुड़ाया। इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण आश्विन शुक्ल दशमी के दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले खुले स्थान में दहन किये जाते हैं। कलाकार श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण कर अग्नि वाण अर्थात  आग के तीर से पटाखों से भरे इन पुतलों को मारते हैं। पुतले में आग लगते ही वह धू- धू कर जलने लगता है और इनमें लगे पटाखे फट- फट फटाक फटने लगते हैं, जिससे इनका अंत हो जाता है।

कथा के अनुसार इस दिन श्रीराम के द्वारा अहंकारी रावण को मारे जाने के कारण उस दिन से ही अधर्म पर धर्म के विजय के प्रतीक स्वरूप रावण दहन की परम्परा शुरू हो गई, परन्तु वाल्मीकि व तुलसीदास कृत रामायणों के समीचीन अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आश्विन माह में तो माता सीता की खोज शुरू हुई थी, क्योंकि वर्षा ऋतु आने से राम और लक्ष्मण गुफा में निवास कर रहे थे और वर्षा ऋतु समाप्त होते ही सुग्रीव ने माता सीता की खोज करने का वचन दिया था। एक अन्य मान्यतानुसार सर्वप्रथम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और नवरात्र संम्पन्न होने के बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और बाद में विजय प्राप्त की। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह दिन रावण बध और श्रीराम के वनगमन से अयोध्या वापस आने का नहीं है, लेकिन यह निश्चित है कि विजयादशमी का पर्व अत्यंत प्राचीन काल से ही भारत में मनाया जाता रहा है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाये जाने का विशद वर्णन हेमाद्रि ग्रन्थ. सिंधुनिर्णय,  पुरुषार्थचिंतामणि, व्रतराज,  कालतत्त्वविवेचन, धर्मसिंधु आदि पुरातन ग्रन्थों में किया गया है। विजयादशमी वर्ष की तीन अत्यंत शुभ तिथियों में से एक है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की दशमी और कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की भांति ही विजयादशमी भी अत्यंत शुभ व पवित्र मानी गई है।

इसीलिए इस दिन भारत में बच्चों के अक्षरारम्भ और नवीन कार्यों का श्रीगणेश करने की परिपाटी भी प्रचलित है। चंद्र आदि ज्योतिष के अनुसार ठीक से व्यवस्थित न होने पर भी इसी दिन श्रवण नक्षत्र में राजा शत्रु पर आक्रमण करते हैं, और विजय और शांति के लिए इसे शुभ मानते हैं। इस शुभ दिन अपराजिता पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन अर्थात अपने राज्य या ग्राम की सीमा को लाँघना, घर को पुन: लौट आना एवं घर की नारियों द्वारा अपने समक्ष दीप घुमवाना, नये वस्त्रों एवं आभूषणों को धारण करना, राजाओं के द्वारा घोड़ों, हाथियों एवं सैनिकों का नीराजन तथा परिक्रमण करना आदि शुभ कार्य सम्पादित किये जाते हैं। विजयादशमी सभी जातियों के लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण दिन है, किंतु राजाओं, सामंतों एवं क्षत्रियों के लिए यह विशेष रूप से शुभ दिन है। इसे भारत का राष्ट्रीय त्योहार माना गया है। इस दिन विजयादशमी से सम्बंधित वृत्तियों के औज़ारों व यंत्रों की पूजा भी होती है। क्षत्रिय गण शस्त्रों की पूजा करते हैं। ब्रज के मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। क्षत्रिय प्रवृति के लोगों  के पर्व के रूप में प्रसिद्ध विजयादशमी के पर्व में अपराजिता देवी की पूजा होती है। नवरात्रि के ठीक बाद अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी के दिन की जाने वाली यह पूजन भी सर्वसुख देने वाला माना गया है। विजयदशमी पर दो विशेष प्रकार की वनस्पतियों के पूजन का महत्त्व है-शमी और अपराजिता अर्थात विष्णु क्रान्ता। रावण दहन के बाद शमी वृक्ष का पूजन करके इसकी पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर विजय उल्लास पर्व के साथ समृद्धि की कामना किये जाने का परम्परा है।

अपराजिता अर्थात विष्णु-क्रांता नामक पौधा अपने नाम के अनुरूप ही विष्णु को अत्यंत प्रिय है और प्रत्येक परिस्थिति में सहायक बनकर विजय प्रदान करने वाला है। भारत में सरलता से सर्वत्र उपलब्ध नीले रंग के पुष्प वाले पौधे अपराजिता की घरों में समृद्धि के लिए तुलसी की भाँति इसकी नियमित सेवा की जाती है। आइये हम भी विजयादशमी के इस शुभ पावन अवसर पर कंठहार धारण करने वाली, चमकदार सोने की मेखला अर्थात कमरधनी पहनने वाली और सदैव अच्छा करने की इच्छा रखने वाली देवी अपराजिता से स्व, पर और राष्ट्र की सर्वत्र विजय प्रदान करने की कामना करें।

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