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प्रजा के अभिषेक की प्रतीक्षा में

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‘‘सच्ची बोलूं?

‘अच्छे दिन’ से धाप गया हूं,

बुरी तरह से हांफ गया हूं,

पहले थोड़ा सुस्ता तो लूं,

फिर सोचूंगा,

क्या मैं बोलूं-

‘साल मुबारक’?

वरना सब को उन का

पहले जैसा हाल मुबारक!’’

आप इसे मेरा कविता-उपक्रम कह लीजिए या मुझे घनघोर विषाद में डूबा बता दीजिए। आप मुझे ख़ुद की तरह हर हाल में आशावादी न होने के लिए कोस लीजिए या मेरे गुलमोहर की डालियों पर सूख कर झर गए फूलों के लिए मेरे ख़िलाफ़ निंदा-प्रस्ताव पारित कर  दीजिए। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि आधी रात को जब घड़ी की दोनों सुइयों ने आलिंगन किया और 2022 का जन्म हो गया, इस नवजात के लिए मुझ से भर्राई आवाज़ में सोहर गाने का कर्मकांड नहीं हो पाएगा।

जिन की कमर कल रात से नए साल की अगवानी में मटक-मटक कर चरमरा गई है और जो सुबह से अपने घरों के छज्जों पर खड़े हो कर ताली-थाली बजा रहे हैं, मुझे उन बेचारों पर तरस आ रहा है। साढ़े सात बरस की वैचारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पराधीनता ने उन्हें इस लायक भी नहीं छोड़ा है कि कभी तो असहमति में भी अपनी मुंडी हिला सकें। पांच साल से विपन्नता की सीढ़ियों पर धड़ाम-धड़ाम नीचे गिरने और दो साल से अपने प्राणों पर लटकी असली-नकली विषाणु-तलवार ने उन्हें ऐसा सुन्न कर दिया है कि वे सिर्फ़ पुंगी बन कर रह गए हैं।

लेकिन अगर सभी, जिस तरह चाहो बजाओ, वाले झुनझुने हो जाएंगे तो 2022 का स्वागत कर के भी हम कर क्या लेंगे? 2022 तो अपने आप आया है। उसे लाने में आप का क्या योगदान है? आप की हवन सामग्री के घटकों की समीक्षा तो 365 दिन बाद तब होगी, जब 2023 का ख़ैरमकदम करने के लिए आप फिर आज की ही तरह अपना औपचारिक तंबू लगा कर नाचेंगे-गाएंगे। लेकिन जो 2017 में हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहे, जो 2018 में घुग्घू बने रहे, जो 2019 में हालात बदलने को घरों से नहीं निकले, जो 2020 की सांय-सांय में लाखों परेशान हाल प्रवासियों के प्रति निठल्ली हुकूमत के रवैए के बावजूद दुबके पड़े रहे और जो 2021 में पापनाशिनी को शववाहिनी बना देख कर भी खड़े नहीं हुए; उन की ताल-से-ताल मिला कर बेली-डांस करने लगूं, इतना गलीज़ भी मैं नहीं हूं।

कल, पिछले बरस के आख़िरी दिन की पौ फटते ही मैं ने भारत सरकार की तरफ़ से जारी हुई एक ट्वीट-टिप्पणी देखी। इस में प्रधानमंत्री जी की 37 ऐसी तस्वीरों को दिखाया गया था, जो सरकार की निग़ाह में 2021 के ‘वे ख़ास यादगार पल’ थे, जिन्होंने ‘करोड़ों देशवासियों के चेहरों पर मुस्कान ला दी’। मैं ने इस के बाद अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की बहुत कोशिश की, मगर हर बार होंठ तिरछे हो गए। मैं ने सैतीसों तस्वीरों को सैंतीस बार बहुत ग़ौर से देखा, नरेंद्र भाई मोदी के चेहरे की छटाओं को अपना मन मोह लेने की खुली इजाज़त दी और निष्पक्ष हो कर उन के वस्त्र-विन्यास पर रीझने का भरपूर प्रयास किया। लेकिन सरकारी हंसी के इस शोर के पीछे से मुझे तो अनाम सिसकियों की सदा ही सुनाई देती रही।

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जो अपने कान रायसीना की खूंटी पर टांग आए हैं, उन का मैं नहीं कहता। जो अपनी आंखें रायसीना की दहलीज़ पर बिछा आए हैं, उन का मैं नहीं कहता। जो अपनी ज़ुबान रायसीना की तिजोरी में रख आए हैं, उन का मैं नहीं कहता। मैं उन का कहता हूं, जिन का ज़मीर अभी तक बाकी है। उन को तो धरती की परतों के नीचे से आती रोने की आवाज़ रात-रात भर सोने नहीं दे रही है। ऐसे सब लोग किस मुंह से 2022 का स्वागत-गान गाएं? उन्हें तो नए साल के स्वागत का नहीं, नए साल के संचालन का गीत गाना है। उन्हें तो नए बरस के सूर्य की पहली किरण के साथ यह संकल्प लेना है कि 2022 को जब वे विदा करेंगे तो सिर उठा कर विदा करेंगे, 2021 की तरह सिर झुका कर नहीं।

यह अपने आप नहीं हो जाएगा। नरेंद्र भाई मोदी और उन के सहयोगी-सूरमाओं के भरोसे तो यह बिल्कुल नहीं हो पाएगा। क्या अब भी हम नहीं समझेंगे कि यह तो अब ख़ुद के बूते ही होगा। 2016 की आठ नवंबर को रात के आठ बजे के बाद से भारत, भारतवासियों के जज़्बे की वजह से, ज़िंदा है। जिन एक सौ तीस करोड़ देशवासियों के दिलों में नरेंद्र भाई अपने को बसा मानते हैं, उन में एक प्रतिशत को छोड़ कर बाकी सारे नरेंद्र भाई के बावजूद ज़िंदा हैं। नरेंद्र भाई की दया नहीं, देशवासियों की ख़ुद्दारी उन्हें जिलाए हुए है। नरेंद्र भाई का पराक्रम नहीं, देशवासियों का वसुधैवकुंटुंबकम-भाव उन में प्राण फूंके हुए है। मुसीबत के हर समय पूरे भारतीय समाज का एक-एक व्यक्ति खड़े हो कर अगर एक-दूसरे का सहारा न बनता तो नरेंद्र भाई की करतूतों ने तो भारतमाता की संतानों को कब का ज़मींदोज़ कर दिया होता।

हमारे राष्ट्रीय चरित्र की यह अंतर्निहित शक्ति ही 2022 का भी संबल है। यह सामूहिक चरित्र क्या हमारी धमनियों में 2014 की गर्मियों के बाद से बहना शुरू हुआ है? क्या भारत-भूमि संघ-कुनबे की वजह से ‘महामंगले पुण्यभूमे’ है? क्या ‘परं वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं’ का सपना पूरा करने की ज़िम्मेदारी हम रुस्तमी-हिंदुत्व का त्रिशूल ले कर विचर रहे संघ-अनुचरों पर छोड़ दें? इसलिए इस साल यह तय होना है कि भारत की बुनियादी आचरण संहिता को तहस-नहस करने का काम हम आगे होने देंगे या नहीं? अपनी संवैधानिक संस्थाओं की दम तोड़ती काया के कल्प में हमारी कर्तव्यनिष्ठा कोई भूमिका अदा करेगी या नहीं? मनमानी के घोड़े पर सवार हो कर चाबुक फटकार रहे एक सुल्तान के सामने अपनी मुट्ठियां हम तानेंगे या नहीं?

‘नया साल मुबारक’ तो कोई तब कहे, जब इन सब सवालों के जवाब धरती में उगने शुरू हों। वरना काहे का ‘नया साल मुबारक’? जिन्हें होता हो, हो। हम-आप तो इस मुबारक-दायरे से कभी के बाहर किए जा चुके हैं। इस मुबारक-अंगने में अब आप दूर-दूर तक कहीं नहीं हैं। इसलिए बेग़ानी शादी में दीवाने हो कर क्यों अब्दुल्ला बन रहे हैं? कनॉट प्लेस पर ठुमक-ठुमक कर सात साल में तो नरेंद्र भाई की टोपी से आप अच्छे दिनों का खरगोश बाहर निकाल नहीं पाए। फिर भी अगर आप की आस अभी शेष है तो यह मत समझिए कि कोई आप के इस भक्ति-भाव को नमन करेगा। समूचा देश इस के लिए आप को धिक्कार रहा है।

चूंकि आप के आराध्य ने न सुनने की ठान रखी है, इसलिए यह गूंज उन्हें सुनाई नहीं दे रही है। थोड़ी देर में जब ढोल-ताशे उन की ड्योढ़ी के बाहर पहुंच कर बजने लगेंगे, तब तक चौराहे की तरफ़ भागने में बहुत देर हो जाएगी। सो, बेहतर है कि वे झोला-डंडा अभी से झाड़-पोंछ कर संभालना शुरू कर दें। समय का रथ चल पड़ा है। उस का घर्घर नाद जितनी जल्दी सम्राट को सुनाई देने लगे, उन के लिए शुभ है। जो सोचते हैं कि हुंकारों से महलों की नींव उखड़ने के दिन लद गए, उन के लिए अपनी आंखें मसलने के दिन आने वाले हैं। राजाओं के अभिषेक बहुत हो चुके। अब देखिए कि प्रजा का अभिषेक कैसे होता है! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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