बंगाल चुनाव कही बहुत विभाजक न हो जाए!

वे बहुत से लोगों की देश भक्ति पर सवाल उठाते हैं मगर हमें उनकी देश भक्ति पर रत्ती भर संदेह नहीं  है! हां पहली बार यह शंका जरूर हो रही है कि क्या वे राष्ट्र की एकता और अखंडता का मतलब समझते हैं? यह या ऐसा ही एक ट्विट मैंने कुछ दिनों पहले किया था। इस पर कई कमेंट आए। मगर कुछ दिन पहले एक सुबह एक पुराने दोस्त का फोन आया। वे हमेशा से भाजपा और संघ के समर्थक रहे हैं। आज के नए भक्तों की तरह असहिष्णु नहीं हैं। पुराने लिहाजी आदमी हैं। बहस करते हैं मगर कभी संबंध खराब नहीं हुए।

कहने लगे कि आपने यह किस परिप्रेक्ष्य में लिखा था?  हमने कहा आज के वर्तमान हालत पर। फिर उनसे थोड़ी छेड़छाड़ भी होती है। हमने कहा गुरु किसी का नाम तो नहीं लिखा। कहने लगे कि अच्छा हमें भी नव भक्तों में समझ लिया जिनकी आंखों पर पट्टी बंधी है! बहुत पुराने दोस्त हैं। पारिवारिक संबंधों वाले।हमने कहा छमा गुरु। छमा। बोले भोपाल का मालूम है?  हमने कहा क्या?  बताया कि भाजपा के नेता जया बच्चन की मां और अमिताभ बच्चन की सास से मिले और उनसे ममता बनर्जी के खिलाफ समर्थन मांगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि जया के पिता तरुण भादुड़ी पत्रकार थे। टेलिग्राफ के भोपाल स्थित संवाददाता थे। उनकी मां इन्दिरा भादुड़ी भोपाल में ही रहती हैं।

दोस्त कहने लगे कि अब अगर ममता भी कोलकाता में रहने वाले गैर-बंगालियों के घर जाकर उनसे ऐसे ही किसी के खिलाफ समर्थन मांगने लगें तो माहौल क्या होगा?  वे कितने दबाव में आ जाएंगे ? बात दोस्त की सही थी। इस समय राजनीति इतनी घातक  हो रही है कि पता नहीं किस पर कौन सी बात असर कर जाए। खास तौर से पिछले एक साल से तो इतनी तेज राजनीतिक फैसले हो रहे हैं कि एक सांस में अगर याद करना चाहें तो याद भी नहीं आएं। किसानों की समस्याओं का कोई हल निकला नहीं और बंगाल के चुनाव का माहौल इतना तेज सरगर्म हो गया।बंगाल, जो आज भी पुराने दिनों की खुशनुमा याद दिलाता है आराम से चलता हुआ रहा है। कोई हड़बड़ी नहीं। एक वक्त के भारत के सबसे बड़े महानगर कहलाने वाले कोलकत्ता में भी नहीं। फुटबाल की पुरानी कैरी, अब ड्रिबलिंग भी कहने लगे हैं (बाल को लय के साथ लेकर आगे बढ़ना) जैसी खूबसूरती, पढ़ने लिखने, गीत, संगीत की आज भी संस्कृति, गप्पों की बेहिसाब फुरसत और इन सबसे बढ़कर गरीबनवाज शहर! आज भी देश के किसी महानगर के मुकाबले कोलकाता में सबसे सस्ता खाना है और खाकर दोपहर को थोड़ी देर सोने की पुरानी बेफिक्र रिवायत भी है।

कभी देश भर का युवा इसी कोलकाता में काम की तलाश में पहुंचता था। राजस्थान से मारवाड़ी लोटा और डोर लिए उसी की दिशा को प्रस्थान करता था। यहां हिन्दी के विकास के लिए भी मारवाड़ियों ने बहुत काम किया। कभी बंगाल में हिन्दी या हिन्दी भाषियों के खिलाफ आंदोलन नहीं हुआ। किसी समय हिन्दी की सबसे अच्छी साहित्यिक पत्रिकाओं में मानी जाने वाले ‘कल्पना’ यहीं से निकलती थी। निराला से लेकर दूसरे कई बड़े साहित्यकार यहां आकर लंबा लंबा प्रवास करते थे। कोलकाता उनका ख्याल रखता था। हिन्दी के मान को निभाता था।

बंगाली प्रकाशन आनंदबाजार पत्रिका ने रविवार जैसी हिन्दी के नए मिज़ाज की पत्रिका यहीं से शुरू करवाई तो वहां की स्थानीय पार्टी के खिलाफ देश भर में रह रहे बंगालियों से समर्थन मांगने की मुहिम का क्या मतलब?  भाजपा ने भोपाल में कहा कि वे देश भर में यह अभियान चलाएंगे। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि इंदिरा भादुड़ी की उम्र इस समय 92 साल से उपर है। इस उम्र में उनसे किसी के विरोध के लिये समर्थन मांगना क्या उचित है? इन्दिरा भादुड़ी का मूल बंगाल हो सकता है। मगर वे तो हमेशा से मध्यप्रदेश में रह रही हैं। जया जबलपुर में पैदा हुईं और आज खुद जया 72 साल की हैं। तो एक भारत की हम जब बात करते हैं तो इन्दिरा भादुड़ी को बंगाल की राजनीति जिससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है से कैसे जोड़ा जा सकता है?

देश भर में ऐसे जाने कितने बंगाली, महाराष्ट्रीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी रहते हैं? क्या वहां की रिजनल पार्टियों के खिलाफ ऐसे ही वहां के लोगों से समर्थन मांगा जाएगा?  और प्रतिक्रिया में वहां की क्षेत्रीय पार्टियांवहां रह रहे उत्तर भारतीयों से सहयोग चाहेगी। यह भारत की एकता और अखंडता के लिए कैसी खतरनाक शुरूआत हो सकती है।मैंने जब वह ट्वीट किया था तो जहन में किसान आंदोलन था जिसे खालिस्तानी कह कर सरदारों के खिलाफ एक नरेटिव गढ़ा जा रहा है लेकिन कई प्रान्तों में रहे मित्र के पाइंट आउट करने पर लगा कि बंगाल के बाहर रह रहे बंगालियों से ममता बनर्जी के खिलाफ समर्थन मांगना एक खतरनाक ट्रेंड है। भारत की शक्ति ही उसकी विविधता में एकता है। हर राजनीतिक दल के लिए अपना स्पेस है। यही ममता बनर्जी है जिन्होंने भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को समर्थन दिया था।

ऐसे ही फारूक अबदुल्ला से लेकर महबूबा मुफ्ती तक भाजपा के साथ रह चुके हैं। अभी शिवसेना और अकाली जैसे सबसे पुराने सहयोगी भाजपा से अलग हो गए। तो क्या महाराष्ट्र में चुनाव होने पर भोपाल, लखनऊ, पटना, दिल्ली में रह रहे महाराष्ट्रियों से शिवसेना के खिलाफ और पंजाब में चुनाव होने पर देश के कोने कोने में रह रहे सरदारों से अकालियों के खिलाफ खड़े होने को कहा जाएगा?बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ हैं। वे भी इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं कि टीएमसी कैसे दिल्ली से जा रहे भाजपा नेताओं को बाहरी बोल रही है? उनकी बात सही  है। मगर समस्या यही है कि किसी भी गलत काम की प्रतिक्रिया बहुत तेज होती है। क्रिया-प्रतिक्रिया का ऐसा सिलसिला बन जाता है कि पता ही नहीं चलता कि गलत क्या है और सही क्या?  राज्यपाल धनखड़ मेरे बहुत  पुराने जानकार हैं। मैंने उन्हें  1989 में लोकसभा जीतते व मंत्री बनते नजदीक से देखा है। वे बहुत महत्वाकांक्षी और तीक्ष्ण राजनीतिक बुद्धि के हैं। बहरहाल मूल सवाल है कि क्या स्थानीय और बाहरी की राजनीति देश के लिए अच्छी है?

दिलचस्प यह भी है कि राज्यसभा के लिए राज्य का मूल निवासी होने का प्रावधान भाजपा शासन में ही हटाया गया। वाजपेयी सरकार के समय ही यह संशोधन हुआ कि अब राज्यसभा में किसी भी राज्य का रहने वाला किसी भी राज्य से चुनाव लड़ कर आ सकता है। लड़ते पहले भी थे मगर वहां का वोटर आईडी कार्ड बनवाना पड़ता था। पता देकर निवासी घोषित करना पड़ता था। मगर भारत एक है कि तर्ज पर ही राज्यसभा का उस राज्य के नागिरक द्वारा ही उस राज्य को रिप्रजेन्ट करने का नियम बदला गया। लेकिन व्यवाहरिक राजनीति में जब तक इसे नहीं अपनाया जाएगा देश की एकता और अखंडता मजबूत कैसे रहेगी? और आपकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं है। वह असंदिग्ध है मगर दूसरे कि पोलिटिकल लाइकिंग, डिस्लाइंकिग या उससे कोईसंबंध ही नहीं होने को भी स्वीकार करना होगा। इससे देश की मजबूती और बढ़ेगी।

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