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Thursday, May 13, 2021
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राहुल, कांग्रेस की जीती है विचारधारा!

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राहुल को, कांग्रेस को खारिज करना आसान है, उनकी सोच और विचारधारा को नहीं। बंगाल में भाजपा की हार पर देश और विदेश के मीडिया ने क्या कहा? यह कि ये नतीजे सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं। यही मुख्य संदेश है। भारत में इस समय सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई किस के विरुद्ध है? सांप्रदायिकता के! भारतीय मीडिया ने जो अपना थोड़ा बहुत विवेक बचा रखा है उसने कहा कि बंगाल में सांप्रदायिक राजनीति हारी। बंगाल में दस साल में ममता ने कोई ऐसा काम नहीं किया था जो जनता उन्हें तीसरी बार इस बड़े बहुमत से वापस लाती। वहां सीधा मैसेज यह था कि भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति के दम पर बंगाल जीतने जा रही है।

यह मैसेज कैसे बना? राहुल के लगातार सांप्रदायिकता विरोधी तेवर से। मीडिया को लगातार जल्दी होती है नायकत्व के गुण रोपित करने की। उसे विपक्ष का एक नेता चाहिए। वह अभी उन्हें ममता में दिख गया। इससे पहले केजरीवाल में दिखा था। और पहले वे नीतीश कुमार में ढुंढ चुके थे। रामचन्द्र गुहा जो इतिहासकार हैं मगर अक्सर गुजरे इतिहास से ज्यादा समकालीन इतिहास में ज्यादा दखल देते हैं लिख गए थे कि नीतीश प्रधानमंत्री मटेरियल हैं। तो इस तरह इन सात सालों में मीडिया ने कई नेताओं को विपक्ष का सबसे बड़ा नेता साबित करने की कोशिशें कीं। लेकिन व्यक्ति की राजनीति की क्या सीमाएं होती हैं यह वे अभी मोदी और अमित शाह के अचानक गिरते ग्राफ के बावजूद नहीं समझ पा रहे।

राजनीति में स्थाई विचार और नीतियां होती हैं। और वे भी प्रो-पिपुल (जनकल्याणकारी) विचार और नीतियां तो भाजपा के पास भी हैं। मगर अमल के स्तर पर वे जनसमर्थक नहीं निकलीं। यह एक अलग विषय है कि भाजपा के अन्तरविरोध क्या हैं? और कैसे वे सरकार में आने के बाद तेजी से उजागर होने लगते हैं और भाजपा सरकारें जनता से कितनी कटती चली जाती हैं। अभी बस एक उदाहरण की कोरोना की इतनी भयानक स्थिति में भी केन्द्र सरकार कुछ करती नहीं दिख रही।

जनता की मदद करने के बदले उसकी सारी ताकत दोष किसी और डालने और खुद को निर्दोष साबित करने में लगी है। सरकार चाहे तो एक दिन में आक्सीजन, रमडेसिवियर और अन्य इंजेक्शनों की कालाबाजारी बंद हो जाए। मगर सरकार इस दिशा में काम करने के बदले आक्सीजन की कमी नहीं और इंजेक्शन जरूरी नहीं बताने में लगी है। आक्सीजन और इंजेक्शन इस्तेमाल करने का किसी को शौक है? पूरे देश में इन दोनों चीजों की भारी कमी है। मगर अपने प्रयासों से यूथ कांग्रेस के नेता बीवी श्रीनिवास इनकी व्यवस्था करने में लगे हुए हैं। विदेशी दूतावास तक कांग्रेस से आक्सीजन की गुहार कर रहे हैं। दिल्ली में बीजेपी के सांसद हंसराज हंस के मांगने पर श्रीनिवास आक्सीजन सिलेंडर भिजवा रहे हैं।

न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री यूथ कांग्रेस के कामों की प्रशंसा कर रही हैं। तो यह काम कैसे हो रहा है? लोगों की मदद के जज्बे के कारण। विपक्ष के लिए ये काम करना बहुत मुश्किल है। सरकार के लिए आसान। मगर वह मदद की भावना होना चाहिए।

जिस एनएसए में सीएए (नागरिकता कानून) के खिलाफ जुलूस निकालने वालों तक को बंद किया गया, उसमें दवा और आक्सीजन की कालाबाजारी करने वाले कितने गिरफ्तार हुए? उल्टे उन मरीज के परिवार वालों के जरूर गिरफ्तार होने और आक्सीजन सिलेंडर जप्त होने की खबरें हैं जो अस्पताल के बाहर अपने मरीज को आक्सीजन लगाए बैठे अस्पताल में भर्ती करने की प्रार्थना कर रहे थे। तो यह भाजपा और उसकी सरकारों पर एक ऐसा सवाल है जो आज नहीं तो कल उनके अंदर से उठेगा। संघ में से भी उठेगा। सिर्फ नफरत के सहारे किसी संगठन को हमेशा नहीं चलाया जा सकता। कुछ हद तक अभी भी उठने लगा है कि भाजपा और आरएसएस

मोदी और अमित शाह से सवाल क्यों नहीं पूछ रही। क्या आज की स्थिति को इससे बेहतर तरीके से नहीं निपटा जा सकता था? क्या जरूरत थी इन दावों की हमने कोरोना को हरा दिया है। विश्व गुरु हैं! वैक्सीन गुरु हैं!

विश्व हंस रहा है। वैक्सीन है नहीं। वैक्सीन बनाने वाला पूनावाला लंदन भाग गया है। मगर सरकार कोरोना से लड़ने के अपने तरीकों पर पुनर्विचार करने के बदले सिस्टम पर दोष डालने की कोशिश कर रही है। ये सिस्टम क्या है? सिस्टम ही सरकार है। सरकार ही सिस्टम है। व्हट्सएप के मैसेज बनाकर, परिस्थितियों पर, सिस्टम पर दोष डालने से केवल अंध भक्त ही बहक सकते हैं, आम जनता नहीं।

राहुल गांधी यही सवाल उठा रहे हैं लगातार। और इसी ने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की बैटिंग लाइन को बिगाड़ दिया। विकेट किसे मिलता है यह अलग बात है, महत्वपूर्ण यह है कि किसकी लगातार बालिंग ने बैटसमेन को हिला दिया। प्रधानमंत्री मोदी निर्विध्न सरकार चला रहे थे। जो चाहे वह कर रहे थे। चाहे नोटबंदी हो, ज्यादा दामों में रॉफेल जहाज खरीदना हो ( जिसमें दी गई दलाली पर अब फ्रांस की मीडिया ने लिखना शुरू कर दिया है), सरकारी संपत्ति बेचना हो, किसान विरोधी कानून हों, पेट्रोल, डीजल के रोज दाम बढ़ाना हों, बेरोजगारी जैसे संवेदनशील मसले पर पकौड़े बेचो जैसी क्रूर सलाह हो वे हर काम बिना सोचे समझे कर रहे थे।

उन्हें विश्वास था कि जनता हिन्दु मुसलमान में इतना डूब चुकी है कि वह उनके इन जनविरोधी फैसलों को समझेगी ही नहीं। बात सही थी। सांप्रदायिकता का नशा बहुत गहरा होता है। यह कोई छुपी बात नहीं है कि 2014 में मोदी को मिले समर्थन का बड़ा कारण 2002 के गुजरात दंगे थे। सरकार बनते ही घर वापसी, लव जेहाद, तीन तलाक, लींचिंग, कश्मीर जैसे मुद्दे देश में छा गए। टीवी चैनल रोज इन पर जहरीली बहसें करने लगे। रोजी रोटी, मंहगाई, बेरोजगारी, चिकित्सा, शिक्षा जैसे जरूरी मुद्दों को साइड लाइन कर दिया गया। मगर यहीं राहुल गांधी ने जबर्दस्त हस्तक्षेप किया। और पीछे धकेले जा रहे जन मुद्दों को सामने लाए।

याद रहे राहुल ने ही पिछले साल के शुरू में दो मुद्दे बहुत जोर शोर से उठाए थे। एक गिरती अर्थव्यवस्था का और दूसरा कोरोना के खतरे का। सरकार और भाजपा तो उनका मजाक उड़ाते ही रहे विपक्ष के नेताओं ने भी दोनों मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया। इसी तरह इससे पहले राहुल ने मोदी के क्रोनी कैपटलिज्म ( सिर्फ अंबानी, अडानी को बढ़ाने) पर हमले किए तो उन्हें विपक्ष का कोई साथ नहीं मिला। सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में तो विपक्ष का समर्थन मिलना दूर केजरीवाल जैसे नेता कोरोना के अपने बुलेटिन में तबलीगी जमात का एक नया कालम बनाकर मुसलमानों को और निशाने पर रखने में सहायता करते दिखने लगे।

ऐसे में नफरत और विभाजन के इस खतरे को राहुल ने बहुत समझदारी से समझा। कांग्रेस ने कई बार गलतियां की होंगी। उस पर हिन्दु तुष्टिकरण, मुस्लिम तुष्टिकरण के कई आरोप लगते रहे, मगर उसकी मूल विचारधारा हमेशा सामाजिक सदभाव की रही। यह सांप्रदायिक सदभाव से बड़ा विचार है जिसमें हिन्दू, मुसलमान, धर्म के अलावा दलित, पिछड़े, गरीब ,कमजोर, सवर्ण सब आते हैं। राहुल ने इसी विचार को कस कर पकड़ा हुआ है। पुलिस से धक्के खाकर भी वे हाथरस जाकर सामुहिक बलात्कार की शिकार दलित लड़की के परिवार से मिलकर

उनके साथ खड़े होते हैं। देश सबका है कहकर वे मुसलमानों को सुरक्षा का विश्वास भी देते हैं और चुनावों के दौरान मंदिरों में भी जाते हैं।

इन सबमें कोई विरोधाभास नहीं है। यही आइडिया आफ इंडिया है। सबको साथ लेकर चलना। इस विचार में इतनी शक्ति है कि मोदी जी राजनीति चाहे श्मशान और कब्रिस्तान की करें मगर कहना यही पड़ता है कि सबका साथ सबका विकास। राहुल ने इसी इनक्लूसिव ( सम्मिलित) इंडिया को विभाजनकारी अजेंडे के सामने

अड़ाया है। परिणाम अभी बंगाल में साफ दिखा। चुनाव नतीजे राहुल के कमजोर होने की निशानी नहीं राहुल के उसूलों पर मजबूती से टिके रहने की कहानी है!

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