nayaindia what causes dystonia अंगो के फड़कने (डिस्टोनिया) की वजह क्या?
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अंगो के फड़कने (डिस्टोनिया) की वजह क्या?

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यह वास्तव में नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारी है जिसकी वजह से मांसपेशियों में संकुचन, ऐंठन जैसे रिपीटीटिव मूवमेन्ट होने से मांसपेशियां अनियन्त्रित हो जाती हैंमामला गम्भीर होने पर असामान्य तथा अजीबोगरीब मुद्राएं बनने लगती हैं। मेडिकल साइंस में इसे डिस्टोनिया कहते हैं, इसका शरीर के अंगों पर अलग-अलग असर होता है व लक्षण भी इन्हीं के हिसाब से उभरते हैं। जब यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है तो कंपकंपी और नर्वस सिस्टम से जुड़ी गम्भीर समस्यायें हो जाती हैं। 

आंख, बाजू या शरीर के अन्य अंगों का फड़कना हमारे समाज में शुभ-अशुभ से जोड़कर देखा जाता है, इसमें कितनी शुभता है, इसका तो पता नहीं लेकिन इनका लगातार फड़कना स्वास्थ्य की दृष्टि से अशुभ है। यह वास्तव में नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारी है जिसकी वजह से मांसपेशियों में संकुचन, ऐंठन जैसे रिपीटीटिव मूवमेन्ट होने से मांसपेशियां अनियन्त्रित हो जाती हैं। मामला गम्भीर होने पर असामान्य तथा अजीबोगरीब मुद्राएं बनने लगती हैं। मेडिकल साइंस में इसे डिस्टोनिया कहते हैं, इसका शरीर के अंगों पर अलग-अलग असर होता है व लक्षण भी इन्हीं के हिसाब से उभरते हैं। जब यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है तो कंपकंपी और नर्वस सिस्टम से जुड़ी गम्भीर समस्यायें हो जाती हैं।

यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, समय से इलाज न कराने पर ऐंठन तथा संकुचन जैसे लक्षण अति-पीड़ादायी हो जाते हैं। लम्बे समय तक एक जैसी गतिविधि (उदाहरण लिखना, टाइपिंग) के दौरान या थकान या तनाव से लक्षण बिगड़ते हैं जो समय के साथ ज्यादा गम्भीर हो जाते हैं। कुछ मामलों में डिस्टोनिया, जेनेटिक होता है जो माता-पिता से बच्चों में आता है। कुछ में यह पर्यावरणीय कारकों से होता है, जैसे कि ऑक्सीजन की कमी से ब्रेन डैमेज, विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आना या किसी दवा का अत्यधिक उपयोग।

लक्षण क्या उभरते हैं?

इसके लक्षण शरीर के अंगों के मुताबिक होते हैं, आमतौर पर पैर में ऐेंठन, ड्रैगिंग लेग यानी पैर घसीटकर चलना, कुछ लाइनें लिखने पर हैंडराइटिंग बिगड़ना, बोलने में कठिनाई, गर्दन में अनैच्छिक खिंचाव, मांसपेशियों में बार-बार संकुचन जो कुछ सेकेंडों या मिनटों तक रहता है इत्यादि। गम्भीर मामलों में मांसपेशियों में संकुचन, फड़कन और ऐंठन हफ्तों या महीनों चलती है।

सरवाइकल डिस्टोनिया: यह गर्दन की मांसपेशियों को प्रभावित करता है, इसके लक्षणों में ठुड्डी का कंधे की ओर मोड़ना (टोर्टिकोलिस), सिर को आगे-पीछे या बग़ल में झुकाना, सिर को आगे या पीछे कंधों पर ले जाना, हाथों में कंपन प्रमुख हैं। किसी एक स्थिति या आसन में देर तक बैठने से ये लक्षण ट्रिगर हो जाते हैं जो तनाव या उत्तेजना से और बिगड़ते हैं जैसे सर्विकल स्पाइन ऑर्थराइटिस, नर्व रूट कम्प्रेसन और गर्दन में रीढ़ की हड्डी का संकुचन।

ब्लेफेरोस्पाज्म यानी नेत्रच्छदाकर्ष: यह डिस्टोनिया आंखों के आसपास की मांसपेशियों को प्रभावित करता है, इसकी वजह से पलक फड़कना, इन्वॉलेन्टरी ब्लिंकिंग, चेहरे की मांसपेशियों में हलचल और चेहरे में चिकोटी काटने जैसी अनुभूति होती है जो गम्भीर मामलों में दीर्घकालिक हो जाती है। यदि ब्लेफेरोस्पाज्म के लक्षण एक हफ्ते से ज्यादा रहते हैं तो चिकित्सकीय सलाह लें।

डोपा-रिस्पांसिव डिस्टोनिया: यह बचपन में शुरू होता है। इसका नाम इसके उपचार से पड़ा है क्योंकि इसके उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा का नाम लेवाडोपा है जो मस्तिष्क में डोपामाइन का उत्पादन बढ़ाकर इसे कंट्रोल करती है। बचपन में इसकी शुरूआत 6 वर्ष की आयु से  होती है और इसकी वजह से पैर अंदर या ऊपर की ओर मुड़ने लगते हैं, मांसपेशियों में संकुचन- कंपकंपी और पैरों में अनियंत्रित गति के साथ किशोरावस्था तक इसके लक्षण बाहों और फिर पूरे शरीर में चले जाते हैं जिससे असामान्य अंग स्थिति तथा चलते या दौड़ते समय समन्वय की कमी होती है।

जनरलाइज्ड डिस्टोनिया: यह बचपन या किशोरावस्था में शुरू होता है जो शरीर के अलग-अलग भागों की मांसपेशियों के समूहों को प्रभावित करता है। यह आमतौर पर ट्रंक या अंगों में शुरू होता है। इसके प्रमुख लक्षण हैं- पहले संकेत के रूप में पैर का एक ओर मुड़ना, शरीर की गतिविधियों के समन्वय या नियंत्रण में कठिनाई, ट्रंक या अंगों में घुमाव, मांसपेशियों में सामान्य या दर्दनाक ऐंठन, असामान्य चाल, तेज, लयबद्ध मूवमेंट जिससे शरीर के कुछ हिस्से असामान्य स्थिति में रह सकते हैं इत्यादि।

हेमीफेसियल स्पाज्म: इसमें चेहरे के एक तरफ की मांसपेशियों में ऐंठन और खिंचाव महसूस होता है जिससे व्यक्ति असहज रहता है।

लेरेन्जियल (स्वरयंत्र) डिस्टोनिया: इसमें आवाज बॉक्स (स्वरयंत्र) में ऐंठन से स्वर बैठने के कारण  आवाज की गुणवत्ता खराब हो जाती है, गम्भीर स्थिति में व्यक्ति बोल नहीं पाता।

ओरोमैंडिबुलर डिस्टोनिया: इसमें मुंह, जीभ और जबड़े की मांसपेशियों में ऐंठन से पीड़ित बार-बार अपना जबड़ा खोलने-बंद करने या जीभ बाहर निकालने लगता है।

टास्क-स्पेसिफिक डायस्टोनिया: इससे लेखक, संगीतकार, टाइपिस्ट और गोल्फर ज्यादा पीड़ित होते हैं, इसमें हाथ और कलाई में दर्दनाक ऐंठन से व्यक्ति कोई काम नहीं कर पाता।

पैरोक्सिसमल डिस्टोनिया: इसमें एक दौरे की तरह से पूरे शरीर, किसी एक अंग या चेहरे में कंपकंपी, दर्द और मरोड़ उठती है लेकिन व्यक्ति संवेदना नहीं खोता। यह दौरा कुछ मिनट या कई घंटे चल सकता है। तनाव, थकान, कॉफी या शराब सेवन और शरीर में अचानक हलचल से ट्रिगर होने वाला  यह डिस्टोनिया आमतौर पर किशोरावस्था में शुरू होता है।

डिस्टोनिया का टाइप पता लगाने के लिये डॉक्टर विभिन्न तरीके इस्तेमाल करते हैं। जिसमें उम्र, शुरूआत और शरीर के डिस्टोनिया प्रभावित हिस्सों पर विशेष ध्यान देने के साथ यह भी देखते हैं कि यह समय के साथ बदतर हुआ, स्थिर रहा या इसमें सुधार आया। दिन में किस समय या किस गतिविधि से ट्रिगर हुआ, क्या सभी स्थितियों में लक्षण एक समान थे या अलग-अलग। ईटियोलॉजी से शरीर में अंतर्निहित न्यूरोलॉजिकल क्षति, आनुवंशिक और पर्यावरणीय प्रभावों को भी देखा जाता है।

क्यों होता है डिस्टोनिया?

यह आनुवंशिक या पर्यावरणीय कारकों से उत्पन्न होता है, आनुवंशिक परिवर्तन विरासत में मिलने की वजह से जन्म से मौजूद होते हैं। विभिन्न आनुवंशिक कारक रसायनों के संतुलन को इस तरह  प्रभावित करते हैं जिससे अलग-अलग तरह का डिस्टोनिया होता है। जिन पर्यावरणीय कारकों और स्वास्थ्य स्थितियां से डिस्टोनिया ट्रिगर होता है उनमें मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी या रक्त स्त्राव, दवाओं के साइडइफेक्ट (जैसे एंटीसाइकोटिक्स, डोपामाइन एगोनिस्ट), भारी धातुओं या कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में आना, ब्रेन ट्यूमर, इंसेफेलाइटिस संक्रमण, ब्रेन स्ट्रोक, मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में चोट, विल्सन डिसीस, बेसल गैन्ग्लिया प्रमुख हैं।

पुष्टि कैसे?

डिस्टोनिया की पुष्टि व्यक्ति से लक्षण पूछकर और शारीरिक परीक्षणों से होती है जैसेकि विषाक्त पदार्थों और संक्रमणों की जांच के लिए रक्त और मूत्र परीक्षण, ट्यूमर का पता लगाने के लिए एमआरआई स्कैन, लेवोडोपा उपचार और आनुवंशिक परीक्षण।

इलाज क्या?

इसका इलाज कारण और प्रकार पर है, वर्तमान में इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन कुछ  दवाएं लक्षणों को शांत करने में मदद करती हैं जैसेकि-

बोटुलिनम टॉक्सिन (बोटॉक्स) इंजेक्शन: यह मांसपेशियां सिकुड़ने के लिये जिम्मेदार न्यूरोट्रांसमीटर एसिटाइलकोलाइन को रिलीज होने से रोकता है।

डोपामिनर्जिक एजेंट: ये दिमाग में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर बढ़ाते या कम करते हैं, जो मांसपेशियों के मूवमेंट में अहम भूमिका निभाता है।

एंटीकोलिनर्जिक्स: यह एसिटाइलकोलाइन नामक रसायन को रिलीज होने से रोकता है।

मांसपेशियों को आराम देने वाली कुछ अन्य दवायें जैसे डायजेपाम (वैलियम), न्यूरोट्रांसमीटर गाबा को नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनके सेवन से व्यक्ति नींद में रहता है।

फिजियोथेरेपी: इससे व्यक्ति अपनी मुद्रायें प्रबंधित कर सकता है जिससे कुछ प्रकार के डिस्टोनिया के लक्षणों शांत करने में मदद मिलती है जैसे- स्पीच थेरेपी। यदि पीड़ित को डिस्टोनिया की अच्छी जानकारी है तो वह इसे आसानी से हैंडिल करके अपने जीवन की गुणवत्ता बढ़ा सकता है।

शल्य चिकित्सा: यदि उपचार की सामान्य पद्धतियां मदद नहीं करती तो डॉक्टर सर्जरी करते हैं, ऐसा आमतौर पर सर्वाइकल डिस्टोनिया के इलाज में स्लेक्टिव पेरीफेरल डिनर्वेशन से किया जाता है। इसमें गर्दन की उस नर्व के अंतिम सिरे को काट देते हैं जो मांसपेशियों से जुड़ी होती है।

डीप ब्रेन सिमुलेशन: इसमें सर्जन, बेसल गैन्ग्लिया में छोटे इलेक्ट्रोड और छाती में त्वचा के नीचे पल्स जनरेटर से सिग्नल भेज कर बेसल गैन्ग्लिया द्वारा उत्पादित असामान्य तंत्रिका आवेगों को अवरुद्ध करते हैं जिससे मांसपेशियों के अवांछित मूवमेंट को कम करने में मदद मिलती है।

नजरिया

डिस्टोनिया मांसपेशी मूवमेंट से जुड़ा विकार हैं जो अलग-अलग उम्र के लोगों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करता है ये शरीर के अंगों के मुताबिक कई टाइप का होता है। याद रखें कि इसकी कोई सटीक दवा नहीं है लेकिन  वर्तमान में उपलब्ध दवाओं से इसके लक्षणों को कुछ हद तक कंट्रोल कर सकते हैं। फिजियो थेरेपी दवाओं की तुलना में ज्यादा कारगर है। यह ट्रिगर न हो इसके लिये 45 मिनट से ज्यादा एक स्थिति में न बैठें, उठकर चलें, शरीर में पानी की कमी न होने दें क्योंकि शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी से मांसपेशियों की मूवमेंट अनियन्त्रित हो जाती है।

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