संतों को सच कौन सिखाए! - Naya India
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संतों को सच कौन सिखाए!

Muslim Country in the world

गत सौ सालों से शुरू हुई अनेक वैचारिक परंपराओं में सब से बुरी है: सभी धर्मों को एक बताना। कुछ लोगों ने वैदिक ‘‘एकम् सद विप्र बहुधा वदन्ति’’ को सभी रिलीजनों पर लागू कर दिया। मानो सत्य और रिलीजन एक चीज हों। जबकि सत्य तो दूर, भारतीय धर्म भी रिलीजन नहीं है।

धर्म है: उचित आचरण। रिलीजन है: फेथ। यहूदी, क्रिश्चियन, मुहम्मदी, आदि इस फेथ श्रेणी में आते हैं। कोई ‘फेथ’ भयावह, वीभत्स, अत्याचारी भी हो सकता है, इस की समझ महात्मा गाँधी को थी। भारत के गत हजार साल का इतिहास उन्होंने पढ़ा नहीं, तो सुना अवश्य था। परन्तु उसी की लीपा-पोती करने के लिए गाँधीजी ने फेथ को धर्म जैसा बताने की जिद ठानी। उस के क्या-क्या दुष्परिणाम हुए, वह एक अलग विषय है।

वही बुरी आदत कुछ आधुनिक हिन्दू संतों ने अपना ली। गाँधीजी की ही तरह उन्होंने न प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी पढ़ी, न उन के कथनों, आदेशों का संग्रह हदीस, न आद्योपान्त कुरान, न शरीयत। न इस्लाम का इतिहास। फिर भी वे इस्लाम पर भी प्रवचन देते हैं। यह जनता से विश्वासघात है, जो उन्हें ज्ञानी मानती है।

ऐसे संत यह मोटी बात नहीं जानते कि इस्लाम केवल 20 % धर्म है, शेष 80 %  राजनीति। अल्लाह, जन्नत, जहन्नुम, हज, रोजा, जकात, आदि धर्म-संबंधी विचार, कार्य इस्लामी मतवाद का छोटा हिस्सा है। इस का बहुत बड़ा हिस्सा है:  जिहाद, काफिर, जिम्मी, जजिया, तकिया, दारुल-हरब, शरीयत, हराम-हलाल, आदि। कुल मिलाकर मूल इस्लामी ग्रंथों का एक तिहाई केवल जिहाद पर केंद्रित है। कुरान की लगभग दो तिहाई सामग्री काफिरों से संबंधित है। इस राजनीतिक सरंजाम का घोषित उद्देश्य है – काफिरों को छल-बल-धमकी-अपमान आदि किसी तरह से मुसलमान बनाना, या खत्म कर देना। यह कुरान, हदीस, सीरा को पढ़ कर सरलता से देख सकते हैं।

प्रोफेट मुहम्मद ने कहा था कि दूसरे प्रोफेटों की तुलना में उन्हें ‘पाँच विशेष अधिकार’ मिले हैं। इन में चार शुद्ध राजनीतिक हैं। पर ये अधिकार उन्हें अरब लोगों ने नहीं दिए! मक्का के लोगों ने 13 वर्षों तक मुहम्मद के प्रोफेट होने का दावा लगातार खारिज किया। लेकिन जब मुहम्मद ने मदीना जाकर लड़ाई का दस्ता बनाया, आस-पास के कबीलों और व्यापारी कारवाँओं पर हमले किए, उन लूटों का माल अपने दस्ते में बाँटा, तब उन के अनुयायी बढ़े। उस हथियारबंद दस्ते द्वारा मौत या जिल्लत के विकल्प के सामने हार कर अरबों ने मुहम्मद के सामने आत्मसमर्पण किया। यह सब मुहम्मद की प्रमाणिक जीवनी में, शुरू से ही स्पष्ट दर्ज है। इस प्रकार, मात्र राजनीतिक बल से इस्लाम बढ़ा। वही आज भी उस की ताकत है। क्या इसे धर्म कहना चाहिए?

अरब, मेसोपोटामिया, स्पेन, फारस, अफगानिस्तान से लेकर लेबनान तक इस्लाम ने जिस तरह कब्जा किया और काफिरों को मिटाया, वह तरीके तनिक भी नहीं बदले हैं। हाल में बना पाकिस्तान, बंगलादेश भी प्रमाण है। फिर यहीं, तबलीगी जमात या देवबंदियों के क्रिया-कलाप देख सकते हैं। अफगानिस्तान-पाकिस्तान के कुख्यात तालिबान देवबंदी मदरसों की पैदावार हैं। क्या इन हिन्दू संतों ने सोचा है कि इन मदरसों के पाठ्य-क्रम, पाठ्य-सामग्री सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? उन्हें छिपाने का कारण क्या है? ताकि हिन्दू लोग 20%  धर्म के पर्दे के पीछे 80% घातक राजनीति को न देख पाएं।

मुरारी बापू जैसे कथावाचक अली को कोई संत-महात्मा समझ कर झूमते हैं। जबकि अली एक खलीफा, यानी सैनिक-राजनीतिक कमांडर थे। अली ने ही कहा कि बकौल मुहम्मद, ‘‘जो इस्लाम छोड़े, उसे फौरन मार डालो।’’ अरबों ने डर से इस्लाम कबूल किया था, इस का सबूत यह भी है कि जैसे ही मुहम्मद की मृत्यु हुई, असंख्य मुसलमानों ने इस्लाम छोड़ दिया! तब खलीफा अबू बकर को मुसलमानों को इस्लाम में जबरन रखने के लिए अरब में एक साल तक युद्ध करना पड़ा। उसे ‘रिद्दा’-युद्ध कहा जाता है। रिद्दा, यानी कदम पीछे हटाना, इस्लाम छोड़ना। सच यह है कि आज भी यदि तलवार का आतंक हटे तो असंख्य मुसलमान इस्लाम छोड़ दें। अब तो भय के बावजूद मुलहिद (इस्लाम छोड़ने वाला) धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।

ऐसे कैदखाने जैसे मतवाद को ‘शान्ति’ का धर्म बताने वाले संत घोर अज्ञानी हैं। उन्हें मुसलमानों से प्रेम जताने का तरीका स्वामी विवेकानन्द से लेकर पीछे गुरू नानक तक से सीखना चाहिए। न कि अधकचरे नेताओं से। हमारे ज्ञानियों ने अल्लाह का सम्मान किया था। अल्लाह की धारणा अरब में मुहम्मद से पहले से है। अरब के कई देवी-देवताओं में अल्लाह भी एक थे। उसी रूप में हमारे ज्ञानियों ने सभी देवी-देवताओं को एक ही परमात्मा का संकेत कहा था। किन्तु उन्होंने मुहम्मदी राजनीति की अनुशंसा कभी नहीं की। जबकि वही इस्लाम की जान है।

फारसी में कहावत भी है, ‘बाखुदा दीवानावाश, बामुहम्मद होशियार!’ यानी खुदा के साथ तो थोड़ी चुहल कर लो, मगर मुहम्मद से सावधान रहो। इसलिए, इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार-इतिहास से अनजान कथावचाकों द्वारा अपने प्रवचन में इस्लाम की छौंक लगाना अपने विनाश का रसायन तैयार करने जैसा है। उन्हें खोजना चाहिए कि अभी 75 साल पहले तक लाहौर, मुलतान, ढाका में बड़े-बड़े हिन्दू संत, मठ और संस्थान होते थे। उन का क्या हुआ? आज पाकिस्तान में स्वामी रामतीर्थ के भक्त, और बंगलादेश में रामकृष्ण परमहंस के भक्त कहाँ हैं?

हमारे संत यदि वही हालत बचे-खुचे भारत की करना नहीं चाहते, तो उन्हें मूल इस्लामी वाङमय का अध्ययन करना, करवाना चाहिए। वे एक हाथ में आ जाने वाली मात्र तीन-चार पुस्तकें हैं। उस से इस्लाम का सत्य दिखेगा। बिना उसे जाने अपनी मनगढंत से वे हिन्दुओं की भयंकर हानि कर रहे हैं। यह गाँधीजी वाले अहंकार का दुहराव है। आज पूरी दुनिया में इस्लाम के धार्मिक अंश से राजनीतिक भाग को अलग करने, दूर हटाने की कोशिश की रही है। स्वयं सऊदी अरब राजनीतिक इस्लाम से पल्ला छुड़ाने का उपाय कर रहा है। तब उसे गड्ड-मड्ड कर झूठी-मीठी बातें बोलना अक्षम्य अपराध है।

हमें दूसरों के और अपने मत की सम्यक जानकारी रखनी चाहिए। ‘एकम् सत’ कहने और ‘अल्लाह के सिवा कोई गॉड नहीं’ के दावे में जमीन-आसमान का अंतर है। अधिकांश हिन्दुओं को एक ही सत्य वाली बात का संदर्भ मालूम नहीं है। इसी का दुरुपयोग कर सभी रिलीजनों को एक सा सत्य बताया जाता है। किन्तु इस से बड़ा असत्य  दूसरा नहीं हो सकता!

कृपया ऋगवेद का वह पूरा मंत्र देखें:  ‘‘इन्द्रम्  मित्रम् वरुणम् अग्निम्  आहुः / अथो दिव्यः सा  सुपर्णो गरुत्मान्/  एकम्  सद्  विप्राः बहुधा वदन्ति /  अग्निम् यमम् मातरिश्वन् आहुः।’’ अर्थात इन्द्र,  सूर्य, वरुण,  अग्नि के रूप में उन का ही आवाहन किया जाता है। उन्हीं को दिव्य गुणों वाले  गरुड़ के रूप में आहुति दी जाती है। एक ही अस्तित्व है, जिसे विद्वान विभिन्न नामों से बुलाते हैं।  चाहे वह आवाहन अग्नि,  यम या वायु का किया जाता हो।

जरा सोचें, कि आज हम अपने महान् ग्रंथ के मंत्र का केवल एक चौथाई क्यों उद्धृत करते हैं?  उस चौथाई के कुल पाँच शब्दों में भी मात्र  ‘एकम्’   को ही महत्व क्यों देते हैं?  वह भी मूल संदर्भ भुला कर। हमें झूठी राजनीति एवं सच्चे धर्म के बीच अंतर करना सीखना चाहिए। वरना बचे-खुचे भारत को लाहौर वाली दुर्गति में डूबते देर नहीं लगेगी। यही राजनीतिक इस्लाम है। यह धर्म नहीं है।  आत्म-मुग्ध हिन्दू संतों को समझना चाहिए कि सही इस्लाम की जानकारी तमाम ईमामों, उलेमा को है। मुस्लिम विश्व उसी से चलता है। भारतीय मुसलमान भी अपने मौलानाओं से ही पूछते हैं। हिन्दू संत इस्लाम के बारे में स्वयं अंधेरे में रहकर हिन्दुओं को भ्रमित कर रहे हैं। मनगढ़ंत बातों से लोगों को भरमाना दोहरा पाप है।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

21 comments

  1. आदरणीय शंकर शरण जी , तथ्य पूर्ण तथा सारगर्भित विचार।

  2. बहुत ही महत्वपूर्ण तार्किक व तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है आपने आदरणीय शंकर जी! साधुवाद! महात्मा गाँधी के अति आदर्शवादी “ईश्वर अल्लाह- तेरो नाम” व “ सर्व- धर्म- समभाव “ को ही तथाकथित “ सेक्युलरिज्म” ( धर्मनिरपेक्षतावाद ) का सही अर्थ मान लिया गया!!

  3. शकरजी यूं तो आपका प्रत्येक लेख बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं मौलिक होता है परन्तु इस्लाम और धर्म के परिप्रेक्ष्य मे यह लेख अतुलनीय है।एकम् सद् विप्राः बहुधा वदन्ति की वास्तविक व्याख्या आज प्रथम बार जानी।

  4. हमे ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है । कश्मीर व हाल ही में दिल्ली प्रकरण हमे चीख-चीख कर हमें जगा रहा है । ये तथाकथित सन्त ये बताए कि यह दुनिया में जो आतंकवाद चल रहा है । उसके पीछे कौनसा पवित्र उद्देश्य है ?

  5. संतो, मोलाना, पंडित और पादरी सभी को सच सिखाने और दिखाने के लिए असली जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज आ चुके है और सभी ग्रन्धों के गूढ़ रहस्यों को समझ5 रहे है जो कोई भी नही समझ सका। उनका सत्संग सुने ज्ञान देखे फिर अपना आत्म कल्याण करवाय।
    सत साहेब

  6. एक हमरा पिता एक्स के हुम वारिस
    न हिन्दू बुरा है नाही सिख ईसाई मुसलमान बुरा है बुराई पे उतर अये वो इंसान बुरा है

    धर्म हमे अछा और सुखी जीवन जीने के लिए प्रेणा देते है

    धर्म कभी नही कहते किसी की निंदा चुगली करो किसी का बुरा करो या धगगी बेमानी करो और किस धर्म मे लिखा है शराब मांस अंडा कहना जरूरी है किसी भी धर्म मैं नही

    जब समुंद्र मंथन हुआ उसमे से काफी अछि चीज़े भी निकली काफी बुरी चीजे भी

    विष को महादेव जी ने गल्ले मैं धारण किया

    और ये भांग वगेरा जो भी नशे निकले ये राक्षसों ने पिये खाये थे महादेव जी ने कोई भांग वगेरा नही पी थी और आजके नोजवान बच्चे महादेव जी नाम पे भांग पीते बेचारे महादेव जी ऐसे ही बदनाम कर दिया

    बस आखरी मैं यही कहना चाहूंगा सब जीवों से प्रेम करो अगर भगवान को पाना है

    गुरबाणी मैं भी आता है जिन प्रेम कियो तीन ही प्रभ पायो

    धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा

    1. ये संगी आपकि बात नहीं समझे गे इनका काम नफरत फैलाना और अपनी राजनीती कि रोटी सेकना

  7. This is wrong information about ISLAM Mr. Shankar Sharan ji first read QURAN get right knowledge than write about ISLAM you don’t know about ISLAM you are only writing baseless thoughts about ISLAM please stop spreading hatred

    1. this is common response from Muz1imz. What is wrong in his statements? Was Mecca not attacked using army and all Moortis in Mandir/Kaaba there not destroyed by the person whom Muz1imz consider as Prophet? Didn’t he convert people in Mecca by force? Was Abu Sufiyan not ‘forced’ to become Muz1im with the terror of Sword? Better read yourself. Just watch https://www.youtube.com/channel/UCvrqvhjYNlQK4qZFrEHmhKw
      https://www.youtube.com/channel/UCwApLxMGVVviOEL0SJqi1bQ
      https://www.youtube.com/user/MahenderPalArya

    2. ये संगी आपकि बात नहीं समझे गे इनका काम नफरत फैलाना और अपनी राजनीती कि रोटी सेकना

    3. ये नफरत फैलाने वाले लोग आपकि बात नहीं समझे गे और इनको सच पता है लेकिन अपने स्वार्थ के लिये अपने राजनीतीक गुरु को खुश करने के लिये ऐसे किर्या कलाप करेंगे सर्व धर्म संभाव इनसे काफी दूर है
      ऐसे जानवरो पे अपना समय व्यर्थ ना करें

      1. इमरान शेख, आप भिन्न विचार वाले व्यक्ति को ‘जानवर’ कह रहे हैं – और उलटे दूसरों को नफरत फैलाने का आरोप लगा रहे हैं!
        यदि किसी लेख या टिप्पणी में कोई गलत या अनुचित बात हो, तो दिखाएं।

    4. You didn’t point out a single ‘baseless’ fact I mentioned.
      I have read Koran, Hadis, and Sira as well.
      If you identify any false statement in my article, I shall provide the evidence from Koran-Hadis-Sira to show the truth.
      Thank you!

  8. हिंदुओं तक यह जानकारी पहुंचे जिससे उन्हें असलियत का पता लगे जो बीभत्स कार्य हुआ है वह असहनीय है, इसके बाद भी हम सहन कर रहे हैं हिन्दू आज भी निद्रा में है जो यह नहीं समझ रहा कि कल यह हम पर भी होगा। एक हिंदुस्तान जाने के बाद हमारे पास क्या रहेगा।

    1. बहुत ही महत्वपूर्ण तार्किक व तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है आपने आदरणीय शंकर जी! साधुवाद! महात्मा गाँधी के अति आदर्शवादी “ ईश्वर अल्लाह- तेरो नाम” व “ सर्व- धर्म- समभाव “ को ही तथाकथित “ सेक्युलरिज्म” ( धर्मनिरपेक्षतावाद ) का सही अर्थ मान लिया गया ?? – सुधीर कुमार

  9. आदरणीय आप के लेख से बहुत बहुत ज्ञान मिलता है ,आप का राष्ट्र के प्रति प्रेम ही आप को ऐसे लेख लिखने के लिए प्रेरित करता है
    बहुत ही उपयोगी लेख है

  10. एक एक हिंदू के पास यह ज्ञान पहुंचना चाहिए और एक एक हिंदू को यह ज्ञान जानना चाहिए वरना उस दिन दुर्दिन काे याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं|

  11. It’s astonishing fact that Allah was one of so many gods worshipped in the Arab.

    It’s pitiable that our kathavachaks are so ignorant about the radical ideology of Islam, and keep on admiring it.
    In earlier time, saints and spiritual leaders were responsible for protecting society from such adharmies. Today they are protecting adharmi es.

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