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काँग्रेसी प्रदर्शन को अयोध्या से क्यों जोड़ा… अनुच्छेद-370 से क्यों नहीं…?

भोपालI भारत के राजनीतिक व धार्मिक इतिहास में पांच अगस्त की तारीख काफी महत्वपूर्ण हो गई है, यदि धार्मिक पहलू से देखा जाए तो दो साल पहले पांच अगस्त को प्रधानमंत्री जी के हाथों अयोध्या में प्रस्तावित भव्य राममंदिर की आधारशिला रखी गई थी और राजनीतिक चश्में से यदि पांच अगस्त को देखा जाए तो इसी तिथि को तीन साल पहले मोदी सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद-370 के खात्में की घोषणा की थी…. और अब इस साल पांच अगस्त को आयोजित कांग्रेस के मंहगाई विरोधी काले वेषधारी देशव्यापी आंदोलन ने इस तारीख की राजनीति में एक ओर कड़ी जोड़ दी है….

किंतु पूरे देश के बुद्धिजीवी वर्ग में आश्चर्य इस बात पर है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस के इस आंदोलन को अयोध्या के राममंदिर से जोड़ा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 से नहीं, जबकि मौजूदा मोदी सरकार व उनकी पार्टी भाजपा धार्मिक दृष्टि से जितना महत्व अयोध्या राममंदिर को देती है, उससे कम जम्मू-कश्मीर से विवादित अनुच्छेद 370 के खात्में सम्बंधी सरकार के फैसले को नही देती, इस फैसले को यह सरकार मोदी जी के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों में मानती है, फिर क्या कारण है कि भाजपा के दोनों दिग्गज नेताओं अमित भाई शाह व योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस के इस राजनीतिक आंदोलन को अयोध्या से जोड़ा जम्मू-कश्मीर से नहीं? दोनों ही दिग्गज नेताओं को कांग्रेसियों के आंदोलन से नहीं बल्कि कांग्रेस नेताओं द्वारा आंदोलन के दौरान पहने गए काले रंग के कपड़ों पर एतराज थाI

उन्हांेने काले कपड़ों को भगवान राम से जोड़कर कांग्रेस को हिन्दू विरोधी जामा पहनाने की कौशिश की, और अनुच्छेद 370 को इसलिए बख्शा क्योंकि जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव सन्निकट है और भाजपा तथा मोदी सरकार इसी अनुच्छेद 370 की समाप्ती के मुद्दें को मुख्य उपलब्धि मुद्दा बताकर वहां वोट बटोरने का प्रयास करने वाली है साथ ही इसका एक कारण यह भी है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ती से आम कश्मीरी वोटर काफी नाराज है और फिलहाल भाजपा यह मुद्दा अभी उठाकर आम कश्मीरियों की भावना को उद्वेलित नहीं करना चाहती, भाजपा फिलहाल यह ही तय नही कर पा रही है कि मोदी सरकार का कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्में का फैसला जम्मू-कश्मीर में भाजपा के लिए चुनाव के समय वरदान बनेगा या अभिशाप? क्योंकि मोदी सरकार के इस कथित उपलब्ध्धिपूर्ण फैसले से कश्मीर का आम नागरिक तो क्या वहां के सभी सियासी दल व उनके नेता मोदी सरकार व भाजपा से अप्रसन्न है, जिसका बदला वे जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय भाजपा से लेना चाहते है?

फिर…. भारत के लिए यह भी एक बड़ा ‘सरदर्द’ पैदा हो गया है कि कश्मीर से यह अनुच्छेद खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले ने कश्मीरियों को पाकिस्तान के और निकट ला दिया है और पाक हुक्मरानों ने भी इस मुद्दें पर कश्मीरियों की भावना के साथ खेल खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी इसलिए इस फैसले के बाद पाक ने कश्मीरियों को अपने साथ रखने के लिए उनकी सुरक्षा व बाहरी लोगों की हत्या का आतंकी खेल बढ़ा दिया है।

इन्हीं सब कारणों से भाजपा नेे कांग्रेस के महंगाई विरोधी काले लिबासी आंदोलन को अयोध्या के धार्मिक मुद्दें से जोड़ा, जबकि देश का हर हिन्दू आम वोटर यह जानता है कि यह भाजपा की केवल और केवल राजनीतिक चाल है, इस आरोप का वास्तविकता से कोई लेना देना नही है। ….और मंहगाई के इस दौर मे ंजैसे-तैसे अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाला हर देशवासी यह जानता है कि भाजपा के इस आरोप में कितनी सत्यता है?

इस तरह कुल मिलाकर हमारे भारत के राजनीतिक इतिहास में पांच अगस्त की तारीख भी एक अहम् तारीख बनकर रह गई है।

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