गरीब कल्याण अन्न योजना नवम्बर तक ही क्यों….?

पिछले सोमवार को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा अचानक जब यह घोषणा की गई कि मंगलवार को अपरान्ह चार बजे प्रधानमंत्री जी राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे तो चौबीस घण्टों तक पूरे देश में हर स्तर पर ये कयास लगाए जाने लगे कि आखिर संक्रमण काल के दौरान प्रधानमंत्री जी छठवीं बार राष्ट्र को सम्बोधित कर देश को कौन-सा जरूरी संदेश देना चाहते है?

कुछ बुद्धिजीवी व प्रचार तंत्र से जुड़े लोग मोदी के सम्बोधन को चीन की संघर्षपूर्ण गतिविधियों से जोड़कर कयास लगाने लगे तो कुछ वर्ग देश में कोरोना के विस्तार से जोड़कर कयास लगाते रहे, किंतु जब मोदी जी का अत्यावश्यक संदेश सामने आया तब कोरोना से बचाव व सावधानी की तो चर्चा अवश्य की गई किंतु चीन का नाम तक उन्होंने अपने सोलह मिनीट के राष्ट्र सम्बोधन में नहीं लिया। भाषण के बाद यह निष्कर्ष निकल कर सामने आया कि उन्होंने देश के अस्सी करोड़ गरीबों को जो पिछले कुछ महीनों से मुफ्त अनाज दिया जा रहा है, उसकी वितरण अवधि नवम्बर तक बढ़ाने के लिए ही यह सम्बोधन दिया था।

सम्बोधन के बाद पहला अह्म सवाल यही उठाया गया कि इस सुविधा को सिर्फ नवम्बर तक के लिए ही क्यों बढ़ाया गया? क्या नवम्बर के बाद गरीबों को अन्न की जरूरत नहीं पड़ेगी? या वे अन्न खरीदकर खाने में सक्षम हो जाएगें? इस प्रश्न का संभावित उत्तर भी प्रधानमंत्री जी के सम्बोधन में ही निहित है, उन्होंने अपने सम्बोधन में अगस्त से नवम्बर तक आने वाले हिन्दू त्यौहारों के नाम गिनाए, जिसमें दो बार बिहार की महिलाओं के प्रमुख त्यौहार छठ पूजा का भी नाम लिया, इसी तरह उन्होंने दुर्गा पूजा का भी दो बार जिक्र किया, जो पश्चिम बंगाल का प्रमुख त्यौहार है और इन दोनों ही राज्यों में इसी साल के अंत या अगले साल के प्रारंभ में विधानसभा चुनाव होने वाले है,

इसलिए छठ पूजा का दो बार जिक्र कर उन्होंने जहां बिहार की महिलाओं को रिझाने की कौशिश की, वहीं दुर्गा पूजा का जिक्र कर उन्होंने पश्चिम बंगाल के गरीबों के हितैषि बनने का प्रयास किया और चूंकि नवम्बर तक ये त्यौहार और चुनाव दोनों के ही निपट जाने की संभावना है, इसलिए इस योजना को नवम्बर तक जारी रखने की घोषणा की गई। अपने सोलह मिनिट के सम्बोधन में देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों का जिक्र तक नहीं करना, चीन-पाकिस्तान की मिलीभगत का उल्लेख न करना, प्रतिपक्षी दलों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब न देना और सिर्फ प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अवधि विस्तार तक अपना सम्बोधान सीमित रखना, थोड़ा विस्मय पैदा करने वाला तो है, फिर देश की ज्वलंत समस्याओं को नजर अंदाज कर एक सरकारी योजना के अवधि विस्तार पर इतनी लम्बी चौड़ी बातें करने का क्या फिलहाल यह उचित समय था, क्या कोई मंत्री या सरकारी सूचना तंत्र यह घोषणा नहीं कर सकता था? अब ये कुछ ऐसे ज्वलंत सवाल है, जिसका उत्तर जानने को पूरा देश उत्सुक है।

आज यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया कि चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर हमारी सीमा पर दो फ्रंट खोलकर हमारे लिए परेशानी पैदा करने की योजना बना रहे है, चीन पाकिस्तान के आतंकवादियों का सहारा ले रहा है, क्या इसकी खबर मंगलवार तक प्रधानमंत्री जी को नहीं थी? वे चाहते तो अपने सम्बोधन में कड़ा रूख अपनाकर चीन-पाकिस्तान दोनों को कड़ी चेतावनी भरी नसीहत दे सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने सम्बोधन में देश की इस सबसे बड़ी समस्या की पूरी उपेक्षा की और एक सरकारी योजना की अवधि विस्तार का एलान करने के लिए इस महत्वपूर्ण समय को चूना, यह कहां तक उचित है?

यह सही है कि देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सर्वेसर्वा भी प्रधानमंत्री जी ही है, उन्ही पर इस पार्टी का भविष्य अवलम्बित है, किंतु क्या उन्होंने ‘‘हींग लगे न फिटकरी और रंग चौखा होय’’ कहावत का अनुपालन अपनी पार्टी के चुनावी प्रचार के लिए नहीं किया? जबकि अभी बिहार – पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में काफी समय शेष है?

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