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‘उपचुनाव’ तय करेगा कांग्रेस का सियासी भविष्य?

मध्य प्रदेश की 24 सीटों पर होने वाले उपचुनाव जहां कांग्रेस के लिए सत्तासीन होने की संभावनाओं वाला होगा तो इन्हीं चुनाव से इस पार्टी का राजनीतिक भविष्य भी तय होगा.यहां कांग्रेस के सियासी भविष्य तय होने का आशय ये है

कि कांग्रेस उपचुनाव में कमलनाथ का चेहरा ले जाकर जनता के बीच जाएगी तो क्या पूर्व मुख्यमंत्री के अलावा भी इस चुनावी रण में कांग्रेस की टीम ‘बी’ यानी अगली पीढ़ी का कुछ कमाल करने वाला हुनर,जौहर दिखाई देगा जो उन्हें पार्टी की भविष्य की कमान संभालने वाले नेता के बतौर स्थापित करेगा या फिर उपचुनाव के बाद भी पार्टी की कमान कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के इर्द गिर्द ही घूमती रहेगी।

उपचुनाव के लिए बिछाई जा रही सियासत की शतरंज में कांग्रेस की ओर से मोहरों को सेट करने में कमलनाथ की बतौर पार्टी मुखिया और नेता प्रतिपक्ष एकतरफा चल रही है.इसे नाथ का 24 सीटों पर होने वाले सत्ता के सेमीफइनल को जीतने का कॉन्फिडेंस कहें या ओवर कॉन्फिडेंस जो उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठों डॉ गोविंद सिंह,रामनिवास रावत से ज्यादा अपने निष्ठावान जैसे सज्जन सिंह,एनपी प्रजापति आदि पर भरोसा जताकर उन्हें उपचुनाव के मद्देनजर महती जिम्मेदारी दी है.ऐसे में अब यहां कई सवाल खड़े होना लाजमी हैं कि कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के जिन नेताओं को महत्वपूर्ण जबावदेही मिली है वो भविष्य के चुनावी महासंग्राम में पार्टी की जीत के साथ अपनी उपयोगिता साबित कर खुद को बतौर पार्टी के भविष्य के तौर पर खड़ा कर पाएंगे?

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बाद क्या ये दूसरी पीढ़ी के नेता जिस प्रकार प्रेसवार्ता में प्रखरता और तेजस्विता दिखाते हैं जनता के बीच जाकर मतदाताओं को आकर्षित कर पाएंगे?आगामी उपचुनाव में क्या कांग्रेस का कोई ऐसा प्रभावी युवा नेतृत्व उभरकर सामने आएगा जो जनप्रिय नेता की छाप जनता पर छोड़कर भविष्य में कांग्रेस की बागडोर सम्हालने की गुंजाइश छोड़े? आपसी झगड़े-झंझट से छुटकारा पाकर कांग्रेस क्या ये संदेश दे पाएगी कि अब पार्टी में कोई अंतर्कलह नहीं है?ये चंद वो सवाल हैं जो कांग्रेस के लिए तो चिंतन का विषय हैं ही वहां इस पार्टी के भविष्य के कर्णधार बनने का सपना संजोने वाले दूसरी पंक्ति के नेताओं के लिए बड़ी चुनौती होंगे।

कांग्रेस की 15 महीनों की सरकार के सत्ताविहीन होने के बाद से ही पार्टी के भीतर नए अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को लेकर जमकर उठापटक का दौर चला.पार्टी में एका रहे और अधिक बिखराव न हो इसलिए फिर एक बार कांग्रेस हाईकमान ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ की बादशाहत बरकरार रखी और उन्हें ही नेताप्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी.यानी कांग्रेस ने फिर एक बार साफ संदेश दिया कि जिस प्रकार 2018 चुनाव में कमलनाथ चेहरा थे उसी तरह उपचुनाव में भी पार्टी उन्हीं के चेहरे पर मतदाताओं के पास जाएगी बस अंतर इतना होगा कि इस बार महाराज और उनके 22 गण जो कभी कांग्रेस के रहे अब लड़ाई उनसे है और उनके साथ खड़ी भाजपा से.अब 24 सीटों के उपचुनाव का मुख्यालय कांग्रेस ग्वालियर में खोलने जा रही सो चुनावी अखाड़े का सेंटर ग्वालियर-चंबल ही रहेगा ये बात तो तय हो गई.पर क्या इस उपचुनावी संग्राम में जिन सेनानायकों और सिपहसालारों को लेकर कांग्रेस चुनावी समर में जा रही है क्या वो उस भाजपा के चक्रव्यूह को भेद पायेंगे जो महाराज से लेकर शिवराज,संघ से लेकर संगठन और सरकार के मंत्रियों ने तैयार कर रखा है।

‘गोविंद’ और ‘राम’ पर नहीं सज्जन और एनपी पर भरोसा?
उपचुनाव में जिस ग्वालियर चंबल अंचल को भाजपा ‘की’ फैक्टर मानकर चल रही है और इस अंचल की 16 सीटों को जीतने जिस तरह महाराज सिंधिया का कद बढ़ाने सहित उनके समर्थकों को पलकों पर बैठाकर दर्जनभर मंत्री पद नवाज़ रही है इससे तो यही कहा जा सकता कि भाजपा महाराज के प्रभाव वाले इस क्षेत्र को संदेश दे रही है कि सिंधिया के कद को निखारने के साथ ग्वालियर अंचल के विकास पर फोकस रहेगा बस आप साथ बनाए रखिए.इन संकेतों,संदेशों के साथ ही भाजपा सभी सीटों पर उपचुनाव जीतने कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है.दूसरी ओर कांग्रेस के ग्वालियर के कांग्रेसी अध्यक्ष और पदाधिकारी नियुक्ति को लेकर आपस मे ही खींचतान मचाये हुए हैं तो प्रदेश नेतृत्व को शायद अंचल के उन पुराने दिग्गज कांग्रेसियों पर भी भरोसा नहीं बचा जिन्होंने दशकों से पार्टी को सींचने का काम किया है.यहां हम बात कर रहे हैं सात बार के विधायक डॉ गोविंद सिंह और कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत की जिनको उपचुनाव के ठीक पहले किनारे करने की कवायद कांग्रेस में शुरू हो गई है।

एक माह पूर्व की बात करें तो ये माना जा रहा था कि उपचुनाव की कसावट के लिए कांग्रेस ग्वालियर चंबल क्षेत्र से इस बार नेता प्रतिपक्ष बनाएगी और उसमें सबसे बड़ा नाम डॉ गोविंद सिंह का ही था.इधर इसी अंचल के एक और बड़े चेहरे रामनिवास रावत को भी संगठन स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी और जबाबदेही मिलने की अटकलें भी पार्टी के अंदरखाने में लगती रहीं पर शायद पार्टी प्रदेश नेतृत्व पहले से ही कुछ तय कर रखे था और कमलनाथ के नेता प्रतिपक्ष बनने से पहले ही जो उनकी करीबी टीम सामने दिखाई दी उसमें सज़्ज़न सिंह वर्मा,एनपी प्रजापति,तरुण भनोत, जीतू पटवारी,पीसी शर्मा,बाला बच्चन सहित कुछ चेहरे नजर आने लगे.कमलनाथ नेता प्रतिपक्ष चुने गए और अब कांग्रेस का दावा है कि उसके यहां कोई गुटबाज़ी नहीं पर इधर ग्वालियर-चंबल अंचल के कांग्रेसियों में यही चर्चा है कि अंचल के सीनियर नेताओं पर कमलनाथ कांग्रेस को भरोसा नहीं.इस बात के कई प्रमाण रखकर कांग्रेस से जुड़ाव रखने वाले लोगों ने बताया कि बाहरी राज्यों के सैकड़ों लोगों ने आकर यहां के क्षेत्रीय कांग्रेस नेताओं से संपर्क किया,कांग्रेस के ऐसे नेताओं को यहां का प्रभारी बनाया गया जिनका क्षेत्रीय राजनीति से कोई वास्ता ही नहीं रहा,जो भी पूर्व मंत्री यहां कांग्रेस की समीक्षा या उम्मीदवारों के चयन को लेकर भेजे जा रहे उनकी क्षेत्रीय और जातीय जानकारी सिर्फ कागजी ज्यादा है.लोगों का कहना है कि कांग्रेस की उपचुनाव के लिए जिस प्रकार स्थानीय कांग्रेसियों की उपेक्षा की जा रही है और उन्हें शंका की दृष्टि से देखा जा रहा है उससे निष्ठावान कार्यकर्ताओं का संबल टूट रहा है।

उपचुनाव का समर,भाजपा बनाम कांग्रेस
उपचुनाव की 24 सीटों में से ग्वालियर चंबल अंचल की 16 सीटों के लिए जहां भाजपा के पास युवा आइकॉन महाराज सिंधिया,अनुभवी मुख्यमंत्री शिवराज,मेहनती व्यक्तित्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा,केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर,कुशल रणनीतिकार डॉ नरोत्तम मिश्रा,प्रभात झा सहित मध्य प्रदेश सरकार के दर्जनभर मंत्री हैं और ज्यादातर उन्हीं विधानसभा क्षेत्रों के मंत्री हैं जहां उपचुनाव होना है और वो ही उम्मीदवार हैं वहां क्या कमलनाथ और दिग्विजय सिंह,सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया सहित पूरे प्रदेश कांग्रेस के नेता पूर्व मंत्री सज़्ज़न सिंह वर्मा,जीतू पटवारी,तरुण भनोत,बाला बच्चन,पीसी शर्मा,उमंग सिंगार,एनपी प्रजापति,जयवर्धन सिंह,आरिफ अकील,अशोक सिंह,लाखन सिंह,कुणाल चौधरी,अजय सिंह राहुल,अरुण यादव आदि इन क्षेत्रीय नेताओं के सामने अपना लोहा मनवा पाएंगे ये देखना दिलचस्प होगा।

जिन भाजपा नेताओं का जिक्र ऊपर किया गया है उनके अलावा भी भाजपा के पास सत्ता,संगठन में अनेक ऐसे क्षेत्रीय नेता हैं जो जनता में सीधा दखल रखते हैं और संघ के बैकअप से भी इनकार नहीं किया जा सकता जबकि कांग्रेस नेताओं की बात करें तो डॉ गोविंद सिंह और रामनिवास रावत के अलावा अशोक सिंह,हाल ही में कांग्रेसी हुए फूलसिंह बरैया,बालेंदु शुक्ल के अलावा संभवतया किसी भी कांग्रेस के वरिष्ठ और युवा नेता को क्षेत्रीय राजनीति की ज्यादा जानकारी नहीं होगी.दरअसल जिन विधायकों और पूर्व मंत्रियों को कमलनाथ ने ग्वालियर अंचल की विधानसभा सीटों का प्रभारी बनाया है वो भी क्षेत्रीय परिचितों से पूंछ पूंछ कर जिम्मेदारी का निर्वहन करते देखे जा सकते हैं.हालांकि विधानसभा प्रभारियों को कमलनाथ द्वारा एक किताब देने की चर्चायें सुर्खियों में हैं जिसे क्षेत्रीय और राजनीतिक सर्वे के आधार पर खुद नाथ द्वारा तैयार कराए जाने की चर्चा है और इस किताब में दिए गए निर्देशों के आधार पर प्रभारी अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।

स्वीकार्यता साबित करने का एक मौका
उपचुनाव कांग्रेस और कमलनाथ के लिए सत्ता में वापसी की चुनौती होगी तो पार्टी के उन नेताओं के लिए अपने आपको साबित करने का एक मौका होगा जो अभी तक अपने अपने क्षेत्रों सहित पीसीसी में प्रेस वार्ता कर भाजपा के साथ बागियों और सिंधिया पर आक्रोश निकालते रहे.कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री यानी दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजकर उनके लिए उम्मीद से ज्यादा किया,ये उपचुनाव कमलनाथ के चेहरे पर होंगे ये भी तय हो गया.अब यदि इस उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के साथ सरकार ने वापसी की तो निश्चित तौर पर कमलनाथ सिरमौर होंगे पर यदि कांग्रेस की शिकस्त हुई तो पार्टी की आगे की लाइन क्या होगी?

इसलिए  ये अवसर होगा कांग्रेस की दूसरी लाइन को आगे बढ़ाने का दमखम रखने वाले उन युवाओं के लिए जिन्हें उपचुनावों में अपनी ऊर्जा,निष्ठा, समर्पण और कर्मठता के साथ धरातल पर स्वयं की स्वीकार्यता जनता के बीच बनानी होगी और ये साबित करना होगा कि वो भविष्य में कांग्रेस के नेतृत्व करने के काबिल हैं.फिलहाल ये देखने समय शेष है कि इस आगामी सत्ता के सेमीफाइनल में भाजपा के क्षेत्रीय दिग्गजों के सामने जनता का भरोसा जीतने में कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के ये नेता कितने सफल होते हैं और जनता में इनकी स्वीकार्यता बन पाती है या नहीं.जिन युवा नेताओं को उपचुनाव में अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी उनमें सबसे पहला नाम पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र दो बार के विधायक जयवर्धन सिंह का नाम लिया जाएगा.कमलनाथ सरकार में नगरीय प्रशासन मंत्री रह चुके जयवर्धन सिंह का अपनी विधानसभा राधौगढ़ में लोकप्रियता के साथ बड़ा बोलबाला है उन्हें लोग बाबा के नाम से पुकारते हैं,अब उपचुनाव में ये बाबा का जादू कहां कहां देखने मिलेगा ये समय के साथ पता चलेगा.क्या बाबा अपने पिता की छाप से बाहर निकलकर कांग्रेस के उन नेताओं की उम्मीदों पर खरे उतर पायेंगे जो उनमें मध्य प्रदेश कांग्रेस में भविष्य का बड़ा नेता देख रहे हैं।

उमंग सिंघार जो तीन बार विधायक चुने गए और कांग्रेस सरकार जाने के बाद से लगातार सिंधिया और उनके समर्थकों पर हमलावर हैं. कांग्रेस सरकार में ग्रह मंत्री रह चुके और विपक्ष में कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके बाला बच्चन को भी उपचुनाव में अपनी दक्षता साबित करने का एक मौका है. nआजकल कमलनाथ के सबसे करीबी पूर्व मंत्री सज़्ज़न सिंह वर्मा भी बागियों और सिंधिया को लेकर काफी मुखर रहे.हालांकि पूर्व में इन्होंने कांग्रेसी खेमे के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ भी बयानबाज़ी कर चुके हैं.कांग्रेस में इन्हें तेज़ तर्राट नेता की छवि बतौर देखा जाता है,उपचुनाव में इनकी भूमिका भी देखने लायक होगी।

राउ विधायक और पूर्व मंत्री जीतू पटवारी ओजस्वी युवा के तौर पर हमेशा भाजपा और अब सिंधिया को घेरते आ रहे हैं.दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाने वाले इस युवा नेता की असली क्षमता का मूल्यांकन अब उपचुनाव में देखने मिलेगा.2018 चुनाव प्रचार के दौरान पटवारी का एक वीडियो बड़ा सुर्खियों में रहा था जिसमें वो जनसंपर्क के दौरान किसी से वोट मांगते हुए बोल रहे थे कि ‘अंकल मुझे देखना,पार्टी जाए तेल लेने’.अब उपचुनाव में इनकी सक्रियता की बारी है.पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कमलनाथ के करीबी एनपी प्रजापति के लिए भी उपचुनाव में अपना दमखम दिखाने की चुनौती होगी तो बहुजन नेता के तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की जबावदेही भी.कमलनाथ सरकार के चर्चित मंत्री तरुण भनोत हों या फिर आरिफ अकील,पीसी शर्मा,सुखदेव पांसे हों,पूर्व मंत्री लाखन सिंह,विजयलक्ष्मी साधौ,ब्रजेन्द्र सिंह राठौर या कुणाल चौधरी हों सभी के लिए उपचुनाव एक अवसर ही माना जाएगा।

पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया की जनता के बीच पकड़ और उनकी बजनदारी भी इन उपचुनाव में देखने मिलेगी तो कांतिलाल भूरिया के नेतृत्व क्षमता का भी आंकलन होगा जो उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहते भूमिका अदा की थी.कांग्रेस के पास पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव जैसा युवा नेतृत्व भी है जिसकी स्वीकार्यता प्रदेश की उन सभी उपचुनाव वाली सीटों पर देखने मिलेगी क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष रहते जिस कार्यशैली से संगठन के कार्य जिस प्रकार यादव ने किए थे उनकी चर्चायें लोगों के बीच अक्सर सुनने मिल जातीं हैं.इसी तरह कांग्रेस में कई युवा विधायक भी हैं जिनकी ड्यूटी उपचुनाव के लिए लगाई गई है और ये उपचुनाव लक्ष्य,चिंता,चुनौती के साथ उन युवाओं के लिए बड़ा अवसर साबित होगा जो कांग्रेस में पार्टी में काम करने का संकल्प लेकर आगे बढ़े हैं.अब ये देखना बाकी है कि उपचुनाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस की सेकंड लाइन के ये नेता किन किन मुद्दों,किस रणनीति,शैली और ऊर्जा के लोगों के बीच जाकर अपनी छाप जनता पर छोड़ने में कामयाब होकर खुद को साबित कर पाते हैं या नहीं।

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