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विमान उड़ानों की चिंताजनक खबरे, कौन जिम्मैवार?

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विमानों में तकनीकी ख़राबी की सुर्ख़ियों आ रही है। ऐसा होने के पीछे कई कारण हैं। इनमें से प्रमुख है विमानों के रख-रखाव के कर्मचारियों की कमी। और तकनीकी कर्मचारियों की कमी का कारण है उन्हें एयरलाइन द्वारा उचित मानदेय नहीं देना। …सवाल है कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश भारत का नाम क्यों बदनाम हो रहा है? क्या केवल एयरलाइन कम्पनियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? क्या नागर विमानन महानिदेशालय या डीजीसीए की इसमें कोई भूमिका नहीं है?

पिछले कुछ हफ़्तों से एयरलाइन कम्पनियों के विमानों में तकनीकी ख़राबी की सुर्ख़ियों आ रही है। ऐसा होने के पीछे कई कारण हैं। इनमें से प्रमुख है विमानों के रख-रखाव के कर्मचारियों की कमी। और तकनीकी कर्मचारियों की कमी का कारण है उन्हें एयरलाइन द्वारा उचित मानदेय नहीं देना। इसके विरोध में कई कर्मचारी हड़ताल भी कर चुके हैं।  सवाल है कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश भारत का नाम क्यों बदनाम हो रहा है? क्या केवल एयरलाइन कम्पनियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? क्या नागर विमानन महानिदेशालय या डीजीसीए की इसमें कोई भूमिका नहीं है?

नागर विमान क्षेत्र में हाल ही में हुई तकनीकी कमियों की घटनाओं में से अहम घटनाएँ कुछ इस प्रकार हैं। गो-एयर के एक विमान की विंडशील्ड का आकाश में उडान के वक्त चटख जाना। इसी कम्पनी के दो विमानों के इंजन में कमी होने के कारण उड़ान नहीं भरी जा सकी। एक अन्य एयरलाइन में उड़ान के बीच केबिन में धुआँ उठने लगा। एक विमान में तो फ़्यूल इंडिकेटर की ख़ामी सामने आई। बैंकॉक से आते हुए एक निजी एयरलाइन के विमान का एक इंजन ही फेल हो गया और उसे एक इंजन के भरोसे ही लैंड करना पड़ा।

खबरों में यह भी पता चलता है कि एयरलाइन क्रू के सदस्य ने ‘ब्रेथ एनलाइजर टेस्ट’ (खून में नशे की मात्रा की जाँच) में दोषी पाए जाने के बावजूद उड़ान भी भरी। ऐसे अनेक मामले हैं जिन्हें गम्भीरता से लेने की ज़रूरत है। ऐसी ही तकनीकी या अन्य लापरवाही किसी बड़े हादसे को अंजाम देती है।

तकनीकी लापरवाही को भविष्य में दोहराया न जाए इसके लिए देश के नागर विमानन महानिदेशालय में एक ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ होता है। इस विभाग की ज़िम्मेदारी विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। परंतु जिस तरह के हादसे पिछले हफ़्तों में सामने आए हैं उनसे लगता है कि डीजीसीए के अधिकारी विमान सुरक्षा को भगवान भरोसे छोड़ कर अपने आरामदायक कमरों से बाहर निकलना पसंद नहीं कर रहे हैं। ये अधिकारी सारा दोष कर्मचारियों पर डालकर उनकी कमी बता देते हैं।

हर विमान उड़ान भरने से पहले तीन चरण की तकनीकी जाँच से गुजरता है। इन तकनीकी जाँचों को तीन श्रेणी के एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियर अंजाम देते हैं। बी2 श्रेणी के इंजीनियर विमान के इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की जाँच कर उसकी ख़ामियों को दुरुस्त करते हैं। वहीं बी1 श्रेणी के इंजीनियर विमान के मकेनिकल पुर्ज़ों की जाँच कर उसकी ख़ामियों को दुरुस्त कर सकते हैं। ए श्रेणी के इंजीनियर अन्य चीजों की जाँच करते हैं। जब कई हादसे एक के बाद एक सामने आए तो डीजीसीए के अधिकारियों की आँख खुली। जाँच में पाया गया कि उड़ान भरने के तनाव के चलते और एयरक्राफ़्ट मेंटिनेंस इंजीनियरों की कमी के चलते विमानों की जाँच केवल ए श्रेणी के एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियरों द्वारा ही की जा रही थी। बाक़ी के इंजीनियर नदारद हैं। जबकी नागर विमानन क़ानून के तहत विमान कि उड़ान पूर्व जाँच केवल बी2 व बी1 श्रेणी के द्वारा ही की जानी चाहिए।

ये तो हुई निजी एयरलाइन की बात। परंतु राज्य सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग हों या फिर निजी चार्टर सेवा, इन सब में तो नियम क़ानून की धज्जियाँ खुले आम उड़ाई जाती हैं और डीजीसीए आँख मूँद कर बैठा रहता है। इतिहास गवाह है कि देश के कई बड़े नेताओं ने विमानों की तकनीकी ख़राबी के चलते अपनी जान गवाई। परंतु डीजीसीए ने इन हादसों से कोई सबक़ नहीं सीखा।

विमान की उड़ान पूर्व तकनीकी जाँच में हुई इस चूक की ज़िम्मेदारी केवल एयरलाइन के सिर मढ़ने से डीजीसीए का ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता। ग़ौरतलब है कि हर उड़ान की एक लॉग बुक होती है जिसमें प्रत्येक छोटी बड़ी जाँच की रिपोर्ट दर्ज होती है। इसके साथ ही उस जाँच को करने वाले का भी ज़िक्र इसी लॉग बुक में होता है। जिसे एयरलाइन द्वारा डीजीसीए में नियमित रूप से जमा किया जाता है। सोचने वाली बात है कि डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ के अधिकारियों तक या तो यह सूचना पहुँच नहीं रही थी या सूचना मिलने के बावजूद डीजीसीए के अधिकारी निहित स्वार्थ के चलते इस पर जान-बूझ कर कार्यवाही नहीं कर रहे थे। यदि सूचना का नहीं पहुँचना या देर से पहुँचना कारण है तो पहली गलती पर ही इन अधिकारियों ने शोर क्यों नहीं मचाया? यदि सूचना समय पर पहुँच गयी थी तो ये अधिकारी आँख मूँद कर क्यों बैठे थे? जानकारों के मुताबिक़ ऐसा इसलिए है क्योंकि डीजीसीए जैसी संस्था में तकनीकतंत्र पर अफ़सरशाही हावी है।

डीजीसीए के कुछ अधिकारियों द्वारा कुछ निजी एयरलाइन कम्पनियों के साथ ‘ख़ास रिश्तों’ के चलते उनकी गंभीर ग़लतियों को भी अनदेखा कर दिया जाता है। दूसरी तरफ़ जहां इन अधिकारियों के ‘रिश्ते’ अच्छे नहीं होते तो उस एयरलाइन के स्टाफ़ की मामूली सी गलती पर कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाती है।

एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्रैफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि इस क्षेत्र में हमें एक अच्छी पहचान बनानी है तो डीजीसीए के चुनिंदा अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए देश के नागरिकों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।  डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है।

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