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खेल पत्रकारिता का सबसे बुरा दौर!

Worst era sports journalism

क्रिकेट की हार जीत और अच्छे खराब प्रदर्शन की हर खबर प्रचार माध्यमों पर जगह पा जाती  है लेकिन बाकी खेलों के साथ ऐसा नहीं है। उन पर प्रचार माध्यम तब ही मेहरबान होते हैं जब कोई खिलाड़ी, ओलम्पिक, एशियाड या विश्व स्तर पर पदक जीतता है या कोई बड़ा सम्मान अर्जित करता है। खासकर स्थानीय (लोकल) ख़बरों के लिए देश के मीडिया में कोई जगह नहीं बची है। Worst era sports journalism

पिछले कुछ सालों में भारतीय खेल पत्रकारिता के रूप स्वरुप में भारी बदलाव देखने को मिला है, जिसे लेकर ओलम्पिक खेलों से जुड़े खिलाड़ी, अधिकारी और खेल प्रशासक हैरान परेशान हैं। बेशक, बदलाव का बड़ा कारण देश में क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता को कहा जा सकता है। खासकर 1983 के विश्व कप में मिली जीत के बाद से क्रिकेट प्रचार माध्यमों की प्राथमिकता बन गई है। 

तत्पश्चात दिन पर दिन क्रिकेट प्रगति करती चली गई और आज आलम यह है कि तमाम भारतीय खेल बहुत पीछे छूट गए हैं और मीडिया ने उनकी सुध लेना भी बंद कर दिया है। यह सही है कि भारतीय खिलाड़ी ओलम्पिक पदक जीत रहे हैं, जिसकी खोज खबर लेने के लिए हमारे अखबार, टीवी चैनल और सोशल मीडिया में होड़ रहती है। लेकिन कितने खेल और खिलाड़ी हैं जिन पर मीडिया मेहरबान रहता है?

क्रिकेट की हार जीत और अच्छे खराब प्रदर्शन की हर खबर प्रचार माध्यमों पर जगह पा जाती  है लेकिन बाकी खेलों के साथ ऐसा नहीं है। उन पर प्रचार माध्यम तब ही मेहरबान होते हैं जब कोई खिलाड़ी, ओलम्पिक, एशियाड या विश्व स्तर पर पदक जीतता है या कोई बड़ा सम्मान अर्जित करता है। खासकर स्थानीय (लोकल) ख़बरों के लिए देश के मीडिया में कोई जगह नहीं बची है। देश के बड़े छोटे अखबार पहले से आखिरी पेज तक नेताओं की बयान बजी, उनकी झूठी तारीफों, झूठे आकंड़ों, मार काट, बलात्कार, डकैती और लूट खसोट से सने रहते हैं।

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टीवी चैनल तो झूठ और चाटुकारिता का पिटारा बन कर रह गए हैं। यदि मीडिया से कहीं कुछ गायब है तो लोकल खेल खबरें, जिनसे समाचार पत्रों को जैसे परहेज है। कुछ साल पीछे चलें तो राजधानी के अंबेडकर स्टेडियम में खेले जाने वाले डूरंड कप, डीसीएम कप, दिल्ली फुटबाल लीग और गली कूचों की फुटबाल ख़बरों से दिल्ली के समाचार पत्र पटे रहते थे।

शिवाजी स्टेडियम में खेले जाने वाले जवाहर लाल नेहरू हॉकी टूर्नामेंट, शास्त्री टूर्नामेंट, स्थानीय हॉकी लीग और अन्य कई आयोजन खेल पेज का आकर्षण होते थे। इसी प्रकार दिल्ली कुश्ती, दर्जनों दंगल, बास्केटबाल, वॉलीवाल, कबड्डी, टेबल टेनिस, तैराकी, बैडमिंटन जैसे छोटे बड़े टूर्नामेंट अखबारों के खेल पेज पर जगह पा जाते थे।

 यह सही है कि क्रिकेट ने पैसे कि चमक दमक, अपनी पकड़ और पहुँच का फायदा उठा कर मीडिया को कब्ज़ा लिया है। दूसरे खेलों में से कुछ एक ने भी बड़ी पहचान बना ली है। लेकिन सरकारी पैसे पर पलने वाले भारतीय खेल प्रचार माध्यमों की  पसंद केवल तब ही बन पाते हैं जब हमारा कोई खिलाडी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ बड़ा करता है लेकिन ग्रासरूट स्तर और स्कूल, कालेज एवं स्थानीय स्तर पर उभरती प्रतिभाओं के लिए हमारे अपने प्रचार माध्यमों में कहीं कोई जगह नहीं बच पाई है। पता नहीं अपने देश में खिलाडियों के प्रचार-प्रसार और साधन सुविधाओं के मामले में उल्टी गंगा क्यों बह रही है!

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स्कूल कालेज स्तर पर खिलाडियों की खोज खबर नहीं ली जाती लेकिन इनमें से जब कुछ एक भाग्यशाली खिलाड़ी दुनिया के मंच पर धमाल मचाता है तो हमारा मीडिया उसे पागलपन की हद तक उछाल कर अपने स्वार्थ साधने में जुट जाता है। शर्मनाक बात यह है कि देश की राजधानी में खेल पत्रकारिता के नाम पर बस क्रिकेट पत्रकारिता ही बची है। बाकी खेलों के लिए अखबारों और अन्य समाचार माध्यमों के दरवाजे बंद पड़े हैं तो फिर खेल कैसे तरक्की करेंगे? कौन है जो खेल पत्रकारिता की हत्या करने पर तुला है? सिर्फ क्रिकेट जिम्मेदार नहीं हो सकती।

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