भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि! - bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव
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भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

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bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि : पृथ्वी क्या, मृत्युलोक। संसार क्या, सांसारिकता का झमेला। अच्छा क्या, गुजरा वक्त अपना अतीत! कर्मफल क्या, भाग्य में लिखा हुआ! विश्वास, रास्ता और विकल्प क्या, भगवानजी के शरण और जैसे रामजी रखेंगे। जीवन का लक्ष्य क्या, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति! कर्म किसलिए, अगले जन्म के लिए!… ऐसा स्वभाव, यह अध्यात्म सदियों की गुलामी में दिल-दिमाग, बुद्धि का कलियुगी रूपांतरण है।

भारत कलियुगी-17: बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

भारत कलियुगी- 18: लाख टके का सवाल है इक्कीसवीं सदी में हिंदू कैसे जीवन जीता है? मतलब आर्ट ऑफ लिविंग, आर्ट ऑफ बीइंग, आर्ट ऑफ डूइंग याकि जीने की कला, स्वभाव और कर्म क्या? सवाल बड़े हैं और हिसाब से इस पर वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि पिछले तीन हजार सालों के अनुभव में विचारना चाहिए। इसलिए कि हम जैसे आज जी रहे हैं वैसे तीन हजार सालों से लगातार जीते हुए हैं। ऐसा भरतवंशियों की बनाई जीने की पद्धति, तरीके मतलब सतुयगी स्वभाव-अध्यात्म के भटकावों से है। अपना जीना कुछ विश्वासों-मान्यताओं पर जीने की प्रक्रिया और तरीका है। भरतवंशियों के दिल-दिमाग-बुद्धि का जो स्वभाव बना और वह जिन मान्यताओं-विश्वासरूपी अध्यात्म में ढला था तो उसी से आत्मा-परमात्मा, ब्रह्मज्ञान, कर्मकांड, निर्वाण के जितने दीये बने वे स्थायी और सनातनी हैं। स्वभाव (अध्यात्म) के आचरण से है अपना जीवन को जीना। इसी से हर दिन शरीर का जीवन धर्म-कर्म-काम-मोक्ष की प्रवृत्तियों, कर्मकांड, आस्था-भक्ति, आचार-विचार-सदाचार, पाप-पुण्य की दिनचर्या में ऑटोमेटिक चलता होता है। bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि.

भारत कलियुगी-16: कलियुगी बीमारी और लक्षण

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सोचें, कैसा गजब मामला है कि पूरी तरह अज्ञानी, गंवई जीवन जीने वाला शरीर भी अपने आप सुबह उठता है तो उस दिन की तिथि-तारीख के अच्छे-बुरे होने के अनुसार व्रत-उपवास, धर्म-कर्म लिए होता है। निज पुण्यता-लाभ में वह नदी स्नान को जाएगा। हनुमान, शनि, गुरू आदि देवी-देवताओं को साधेगा। कुंभ में जाएगा, पर्व के मेलों में दर्शन करेगा। ऐसा सदियों-सहस्त्राब्दियों से चला आ रहा है और बिना किसी पोप-चर्च या मौलाना-कुरान के संगठित फतवों के। भरतवंशी सनातनियों के जीवन जीने के तरीके और पद्धति बिना संस्थागत धर्म रचना, बिना फतवों और आदेशों के है। तभी अद्भुत बात है कि अपना जीना, अपना स्वभाव (अध्यात्म), अपनी आजाद ख्याली पृथ्वी पर जन्मते ही है। मनुष्य पूरी स्वतंत्रता-आजादी से जीवन को अपनी तरह से जीने का स्वभाव लिए हुए है!

भारत कलियुगी-15: लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

तब फिर जिंदगी का हर दिन, हर तिथि और तिथि के चौबीसों घंटे शुभ-अशुभ का समय लिए हुए क्यों? यही पेंच है। इसे कलियुगी अंधकार-पतन के शाप में समझा जाना चाहिए। एक समय, सप्तसिंधु के किनारे के भरतवंशियों के सतयुगी ऋषि-ज्ञानी-लोग वक्त में उड़ते हुए थे। वे स्वभाव-अध्यात्म में फ्री थिंकर थे। वे बदलते हुए थे। जीने के तरीकों को निरंतर जांचते हुए उन्हें बदला जाता था। रूढ़ी में जड़ होना तब नहीं था, बल्कि दिमाग-बुद्धि का लगातार विचारना, नए विकल्प-नई संभावनाओं-नए सत्य खोजने का आजाद मिजाज था। क्यों? इसलिए कि सत्यवादी सतयुगियों ने जीवन की निरंतरता, चिरंतनता, अखंडता को बूझा था। जाना और माना था कि पृथ्वी पर जीवन रहेगा। पृथ्वी जीवलोक है यह समझा था और इसलिए मंत्र बनाया कि यज्ञ बार-बार होना है, सृष्टि में नया रचना है और जीवन को नए-नए संकल्पों से उत्तरोतर आगे बढ़ाना है। सचमुच वक्त की जरूरत में ही यज्ञ परंपरा बनी, जिनसे यजमान और आह्वान हुए देवता का वक्त माफिक नया जन्म, नए अर्थ, नई प्राप्ति की सिद्धि होती है।

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वह सिस्टम, वह सोच कलियुग में खत्म। कलियुग में बुद्धि और स्वभाव ने वह जड़ता पाई, जिससे अर्थ का अनर्थ हुआ। सब कुछ रूढ़िबद्ध, निश्चित सांचे याकि साल के बारह महीने और 365 दिनों का एक-एक पल निश्चित कर्मफल का बहीखाता लिए हुए। फलां तिथि, फलां वक्त फलां कर्म तो फलां लाभ, पुण्य। जैसे दिन के 24 घंटों का चौघड़िया शरीर जीवन को नियंत्रित करता हुआ वैसे ही साल के बारह महीने और उम्र की हर अवस्था का भी पूर्वनिर्धारित कर्मयोग, कर्मफल और इसी में कोल्हू का बैल बनकर जीवन गुजारना!

भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

गौर करें, ध्यान रहे कि यहां कौम, नस्ल, राष्ट्र नहीं, बल्कि सिर्फ व्यक्ति, शरीर जीवन की दिनचर्या, उम्रचर्या केंद्र में है। जाहिर है सनातनी जीवन पद्धति क्योंकि व्यक्ति, निज जीवन के जीने के तरीके, कला (आर्ट ऑफ लिविंग, आर्ट ऑफ बीइंग, आर्ट ऑफ डूइंग) अर्थ और कर्म में केंद्रित है तो सारा मामला स्वकेंद्रित स्वभाव व आध्यात्मिकता का है। मतलब एकांगी आध्यात्मिकता।

कलियुगी अंधकार में यह पहेली पेचीदा है कि जीवन जीने के स्वभाव में ब्राह्मणों ने सामुदायिक-सामाजिक ढांचा तो बनाया लेकिन जीवन को एकांगी आध्यात्मिकता में, स्वकेंद्रित रखा। मतलब पहली प्राथमिकता अपने जीवन की चिंता करो। तभी तीन हजार साल से हिंदू व्यक्ति का जीवन पूरी तरह सेल्फ सेंटर्ड है। दिल-दिमाग निज केंद्रित है। वह अकेले अपने सुख, अपने पाप-पुण्य, अपने स्वार्थ-परमार्थ और मोक्ष की चिंता, उसके स्वभाव, उसकी आध्यात्मिकता में जुटा हुआ है।

कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

धर्म की व्याख्या-व्यवस्था क्योंकि एक-एक व्यक्ति के शरीर जीवन की चिंता है इसलिए हमारी कलियुगी बुद्धि एक तो हिपोक्रेटिक है और दूसरे सुविधा और मौके के अनुसार वह भौतिकता याकि जीवन के सुख बनाम आध्यात्मिकता ज्वार भाटे में अपने को घटाते-बढ़ाते हुए होती है। यदि मौका मिले तो दरबार का दरबारी बन कर इंद्रियों के सभी सुख, सारा पापाचार करो और जब गुलामी-दासता-अशुभ घड़ी है तो जीवन निसार, आध्यात्मिकता और गंगा स्नान!

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कलियुगी सत्य तीन हजार सालों की दासता-गुलामी की बहुलता का है। तभी गुलाम बुद्धि ने ज्यादा और लगभग लगातार दुख-कष्ट की लाचारगी में सोचा है कि करें तो क्या करें! उसका स्वभाव (अंतर्मन, आत्मप्रज्ञता, अध्यात्म-धर्म की मान्यताएं) दुख केंद्रित बना। हिंदू मानस संसार के दुखों, सांसारिकता के कष्टों से मुक्ति की चाहना का स्वभाव बना बैठा। पुनर्जन्म, मोक्ष, 84 लाख योनियों में जीने-मरने के जीवन चक्र की फिलॉसफी और गरूड़ पुराण का पाठ उसके दिल-दिमाग में छाया हुआ है। मसला धर्मानुगत सही तरीके और आचरण से जीने का नहीं रहा, बल्कि पाप-पुण्य के बहीखाते अनुसार उपाय, धर्म-कर्म, दान-दक्षिणा और कर्मफल के जुगाड़ में जीवन जीने का हो गया।

तभी पृथ्वी क्या, मृत्युलोक। संसार क्या, सांसारिकता का झमेला। अच्छा क्या, गुजरा वक्त अपना अतीत! कर्मफल क्या, भाग्य में लिखा हुआ! विश्वास, रास्ता और विकल्प क्या, भगवानजी के शरण और जैसे रामजी रखेंगे। जीवन का लक्ष्य क्या, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति! कर्म किसलिए, अगले जन्म के लिए!

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

ऐसा स्वभाव, यह अध्यात्म सदियों की गुलामी में दिल-दिमाग, बुद्धि का कलियुगी रूपांतरण है। इस पर आश्चर्य या मतभेद इसलिए नहीं होना चाहिए कि हम जिस लूटपाट, जिस हिंसा और जैसे विध्वंस, जैसे भय में सदियों से जीवन जीते आए हैं उसमें समर्पण, पलायन, परतंत्रता, निराशा, हताशा, भक्ति, भाग्य-नियति के जादू-टोनों और अंधविश्वासों में जीवन जीने लगना मानव मिजाज का सहज विकास है! दोषी वक्त है, जिसने सतयुगी बुद्धि का हरण कर उसे कलियुगी बुद्धि-स्वभाव में कनवर्ट किया।

bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि : इसमें विडंबना का त्रासद पहलू यह है कि कलियुगी बुद्धि ने आत्मप्रवंचना में सतयुग की याद से यह मूर्खता पाली कि हमने सत्य को जाना हुआ है। अब हम दुनिया को बताएं कि हम भले गुलाम हों, गरीबी और दुखों में जी रहे हैं लेकिन हमसे आध्यात्मिकता है। हमने बारीकी से ब्रह्म ज्ञान, आत्मा-परमात्मा को जाना है। हमारे शास्त्रों में अंतिम सत्य लिखा हुआ है। तभी हम विश्व गुरू हैं और तमाम सभ्यताओं, कौमों में हम सबसे अद्भुत हैं!

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

सो, एक तरफ जगत मिथ्या, मृत्युलोक और नारकीय जीवन के आगे भाग्य का रोना तो दूसरी और जगत गुरू होने की आत्मप्रवंचना, अहंकार! कलियुगी बुद्धि को यह ख्याल नहीं है कि जगत मिथ्या और जगत गुरू की पटरी बनाना अपनी हंसी उड़वाना है।

सो, सतयुग बाद के संक्रमण काल और फिर गुलामी-हाकिमी काल में हमने जीवन जीने के अनुभव में अपने रवैए में सोचते-देखते जो धारणाएं बनाईं वहीं कलयुगी बुद्धि का पर्याय है। हम उस छ्दम आध्यात्मिकता के स्वकेंद्रित स्वभाव में जकड़े पड़े हैं, जिसमें जीना मर-मर कर जीना है!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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