ब्लू स्टार भिंडरावाले की किंवदंती Jarnail Singh Bhindranwale
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ब्लू स्टार: भिंडरावाले की किंवदंती

Jarnail Singh Bhindranwale

राजनीति ने ही भिंडरावाले को कौम की आवाज, हितैषी, लड़ाका और संत बनाया। न ज्ञानी जैल सिंह ने सोचा, न लोंगोवाल ने कि चंडीगढ़ विवाद, यमुना कैनाल, पंजाबी भाषा जैसी छोटी-छोटी बातों को उछाल कर सिखों के आम मानस में अन्याय, भेदभाव, उत्पीड़न और दोयम दर्जे का नागरिक होने का जो जहर घोला जा रहा है वह अंतत: आर-पार की लड़ाई बनाने वाला होगा।

Indira gandhi blue star

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Jarnail Singh Bhindranwale : ब्लू स्टार ऑपरेशन यदि हिंदू-सिख रिश्तों में मोड़ है तो जरनैल सिंह भिंडरावाले वह सिख किंवदंती है, जिसे भारत को बतौर राष्ट्र समझ कर सबक लेना चाहिए। सवाल है जरनैल सिंह भिंडरावाले का उभरना, बनना और नौजवान सिखों की एक पीढ़ी का हीरो होना, सिख राजनीति को नचाना, हिंदू-सिख खाई खुदवाना, आंतक-खालिस्तान का वैश्विक चेहरा बनना और अंत में भारत की सेना से लड़ कर मरने की गति को प्राप्त होना कैसे हुआ? बहुत अहम सवाल है और जवाब बिखरा हुआ है।

मुझे उस वक्त के अनुभव में यह समझ आया कि Jarnail Singh Bhindranwale का पनपना-उभरना बतौर पंजाब के मुख्यमंत्री, देश के गृह मंत्री, भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की बदौलत था। भिंडरावाले का बनना कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से था। इसके साथ नौजवान सिखों की पीढ़ी का हीरो बनना भिंडरावाले की चतुराई, धर्म प्रचार याकि शराब, पोर्नोग्राफी छोड़ो, दहेज बंद करो, सेवा करो और निरंकारियों के फैलाव से धर्म पर खतरे की चिंता में उठो-जागो, लड़ो से था। ये पुराने नेता, पुरानी पार्टियां पापी हैं इनके झांसे में न आओ। मेरे साथ चलो, पुलिस-जुल्म से लड़ो।

इसके बाद भिंडरावाले का सिख राजनीति का टेकओवर उनके आगे अकाली पार्टी व गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटियों के सरेंडर से था। हिंदू और सिख खाई की खुदाई में जहां भिंडरावाले के खाड़कुओं की आंतकी गतिविधियां जिम्मेवार थीं तो जनसंघ-कांग्रेस के हिंदू नेता, पंजाब के हिंदी अखबार व मुख्यमंत्री भजनलाल जैसे नेता भी जिम्मेवार थे।

भिंडरावाले का खालिस्तानी वैश्विक चेहरा बनना भिंडरावाले के खुद के बयानों (आखिरी दिनों में ही खालिस्तान वाले बयान थे) से उतना नहीं था, जितना मीडिया के सही-गलत नैरेटिव से था। भारत राष्ट्र-राज्य की सेना से लड़ने की भिंडरावाले की हिम्मत का जहां सवाल है तो वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भारत राष्ट्र-राज्य के अफसरों के तंत्र की स्थायी बुद्धिहीनता की बदौलत थी।

इंदिरा गांधी और दिल्ली में रायसीना पहाडी के सत्तावानों की अदूरदर्शिता, नासमझी और डर की बदौलत भिंडरावाले बनाम सेना की लड़ाई हुई। भारतीय सेना के रिटायर मेजर-जनरल शाहबेग सिंह ने सेना में अपने साथ ज्यादती की खुन्नस में जब भिंडरावाले को ज्वाइन किया और स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी शुरू हुई तभी लग गया था आर-पार की लड़ाई होगी और पता नहीं क्या हो!

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हिंदुओं को राज करना नहीं आता है वाली अपनी थीसिस में प्रमाण है जो आजाद भारत की हिंदू सत्ता में पंडित नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी सभी के कार्यकाल में समाज को तोड़ने, धर्मयुद्ध बनवाने, जातियों में कलह करवाने, शेख अब्दुल्ला को, भिंडरावाले को, प्रभाकरण को और इन दिनों ओवेसी को हीरो बनाने का सिलसिला स्थायी है।

इस पर जितना विचारेंगे उतना लगेगा कि हम हिंदू हजार साला गुलामी से वे राज्येंद्रियां सचमुच गंवाएं हुए हैं, जिनसे सत्तावान व लोगों को किसी भी स्तर पर भान नहीं होता कि मेरे सोचने, करने, चाहने का आगे पांच-दस-बीस साल बाद क्या असर होगा। प्रधानमंत्री न समझेंगे, न जानेंगे, न मानेंगे और अपनी सर्वज्ञता में खाली बुद्धि के पीपे की लफ्फाजी में विवेकहीन राज करेंगे।

सत्य है कि भिंडरावाले ( Jarnail Singh Bhindranwale ) दमदमी टकसाल का एक सामान्य जत्थेदार था। उसका उपयोग पहले बतौर पंजाब के मुख्यमंत्री, फिर गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने किया। जैसे इन दिनों नरेंद्र मोदी, अमित शाह जातियों का हिसाब लगा कर छोटे-छोटे जाति समूह के नेताओं को महत्व देते हैं और हिंदू-मुस्लिम कराते हुए ओवेसी को धीरे-धीरे धर्म का प्रतिनिधि हीरो बनवा रहे हैं वैसे ही ज्ञानी जैल सिंह (गैर-जाट सिख) ने इमरजेंसी दौरान जाट सिखों की अकाली पार्टी का बहुत विरोध झेला था।

अकालियों की रिकार्ड तोड़ गिरफ्तारी और सरकार की नाक में दम। जैल सिंह शायद प्रदेश के पहले गैर-जाट सिख मुख्यमंत्री थे और उनका वोट आधार गरीब माझा-दोआबा इलाका था, जहां सिख नौजवान और सिख राजनीति लावारिस थी। इमरजेंसी के बाद बाकी राज्यों की तरह पंजाब में अकाली-जनसंघ आदि की मिलीजुली सरकार बनी। जनता पार्टी का पतन हुआ तो पंजाब में इंदिरा गांधी-संजय गांधी के खास जैल सिंह थे और उन्होंने अकालियों को निपटाने के लिए माझा-दोआबा के अपने आधार इलाके की रणनीति में मेहता चौक के दमदमा टकसाल के जत्थेदार भिंडरावाले को पटाया।

तब तक 13 अप्रैल 1978 में अकाली-निरंकारी टकराव और 24 अप्रैल 1980 में निरंकारी संत की हत्या की घटनाओं व सिख छात्र संगठन (एआईएसएसएफ) के जुनूनी नौजवानों पर दबदबे से भिंडरावाले उग्र नौजवान जत्थेदार की इमेज पा चुका था।

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जैल सिंह गृह मंत्री बने तो विधानसभा में बहुमत होने के बावजूद अकाली सरकार बरखास्त हुई। कांग्रेस ने चुनाव कराए। कांग्रेस जीती और इंदिरा गांधी ने शायद अकालियों में सिख जाटों की बहुलता याकि पंजाब के मालवा अंचल के बादल, बरनाला, अमरिंदर, रविंदर, बलवंत आदि की काट में माझा-दोआबा के सिख-जाट सरदार दरबारा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। अब दरबारा सिंह उसी होशियारपुर इलाके में जैल सिंह के विरोधी थे, जहां से वे सांसद थे।

सो, जैल सिंह बनाम दरबारा सिंह का झगड़ा सभी की जानकारी में था। हर कोई तब यह लिखते हुए था कि भिंडरावाले के संरक्षक गृह मंत्री जैल सिंह! और भिंडरावाले की खुराफातों से दरबारा सिंह को जैल सिंह चैन से राज नहीं करने दे रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर कानून-व्यवस्था के झंझट। पुलिस हैरान।

जैल सिंह का Jarnail Singh Bhindranwale से क्या नाता था, उन्होंने उसका उपयोग किया या भिंडरावाले ने चतुराई से उनका व अकालियों सबका उपयोग करके अपने को कौम का नेता बनाया, इस बहस में उलझने का खास अर्थ नहीं है। मोटा तथ्य है कि भिडंरावाले के तेवर और उसकी नौजवान खाड़कू भीड का हर पुराना स्थापित नेता-गुरूद्वारा प्रबंधक इस्तेमाल चाहता था। संपादक लाला जगतनारायण की हत्या के बाद भिंडरावाले की गिरफ्तारी, उसे जेल के बजाय सर्किट हाउस में ठहराने और गृह मंत्री जैल सिंह द्वारा हत्या में भिंडरावाले के हाथ होने का सबूत नहीं होने की बात के बाद उसकी रिहाई की घटनाओं से ये संकेत साफ थे कि कौन किसका उपयोग कर रहा हैं।

हां, स्वर्ण मंदिर के बाहर सशस्त्र नौजवानों के साथ पुलिस को ललकारते हुए या दिल्ली में वैसा ही जलवा दिखलाते हुए रकाबगंज गुरूद्वारा में आकर ठहरना, या मुंबई में बाल ठाकरे की ललकार पर मुंबई जाकर दादर के गुरूद्वारे से अप्रैल 1982 में ठाकरे को जवाब आदि की भिंडरावाले की हिम्मत की तमाम घटनाओं के दो ही अर्थ थे। एक, दिल्ली की सत्ता ने, व्यवस्था ने भस्मासुर बनने दिया। दो, अकाली से लेकर कांग्रेस, हिंदू नेताओं सभी ने वह रोल अदा किया, जिससे लोगों में भिंडरावाले का खौफ और जलवा बना।

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राजनीति ने ही भिंडरावाले को कौम की आवाज, हितैषी, लड़ाका और संत बनाया। न ज्ञानी जैल सिंह ने सोचा, न लोंगोवाल ने कि चंडीगढ़ विवाद, यमुना कैनाल, पंजाबी भाषा जैसी छोटी-छोटी बातों को उछाल कर सिखों के आम मानस में अन्याय, भेदभाव, उत्पीड़न और दोयम दर्जे का नागरिक होने का जो जहर घोला जा रहा है वह अंतत: आर-पार की लड़ाई बनाने वाला होगा।

भिंडरावाले को राजनीति ने बनाया। वह मीडिया के हल्ले से हीरो बना। भिंडरावाले को याद करते हुए मुझे बार-बार आज मुसलमानों में मौन हीरो बनते हुए ओवैसी का चेहरा याद आता है। ओवैसी जैसे मुसलमानों में चुपचाप एक चेहरा बन रहे हैं और उनकी आक्रमकता में दोनों तरफ जैसा रिएक्शन पैदा होता है व चुपचाप हिंदू-मुसलमान का मनोविज्ञान सुलगा रहता है वैसा ही उस वक्त भिंडरावाले पर क्रिया-प्रतिक्रिया में मनोविज्ञान बना था। हां, भिंडरावाले एक जत्थेदार से नौजवानों को शराब छुड़वाने, निरकांरियों से पंथ को खतरे, सिखों के साथ अन्याय, सिख राजनीति और दिल्ली के हिंदू राज से लड़ने व खालिस्तान की बात करने वाला नायक-खलनायक जैसे हुआ तो उसमें हिंदू नेताओं का व्यवहार कम जिम्मेवार नहीं था।

फरवरी 1983 में बाल ठाकरे ने यह कहते हुए ललकारा कि हिंदू 70 करोड़ हैं, जबकि सिख दो करोड़। एक सिख पर 35 हिंदू भारी होंगे। जवाब में भिंडरावाले अप्रैल में मुंबई जा पहुंचा। वह व्यर्थ की सनसनी और व्यर्थ का टकराव था। एक स्वामी आदित्यवेश ने हरियाणा से सिखों को निकालने की मांग कर डाली तो बतौर मुख्यमंत्री भजनलाल ने दिल्ली के एशियाई खेलों की सुरक्षा में दिल्ली आने वाले सरदारों की पगड़ी तक चेक करवाई।

तो यह सत्य दो टूक है कि सन् 1978 में सिख-निरंकारी झगड़े से लेकर सिखों के साथ अन्याय की फीलिंग भारत राष्ट्र-राज्य की नासमझी से बनी चिंगारियों की बदौलत थी। नेताओं ने वोट और सत्ता के मोह में बरबादी की। तब एक तरफ सत्तारूढ़ अकाली पार्टी ने गुरूद्वारे की राजनीति करके वोट पकाए तो दूसरी तरफ प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने इंदिरा गांधी को अकालियों का डर दिखाते हुए राजनीति खेली।

सो, पहली बात अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में 19 जुलाई 1982 में दो सौ लोगों के साथ भिंडरावाले के शरण लेने से लेकर तीन जून 1984 के दो साल की वह कुल अवधि थी, जिसमें भिंडरावाले क्या से क्या बन गया और बात कहां से कहां जा पहुंची। दूसरी बात, भिंडरावाले के नौजवान सिखों का हीरो बनना, धर्म युद्ध का आह्वान, रिटायर सेनाधिकारियों से करो-मरो की जिद्द वाले खाड़कुओं की भीड़ तैयार कराना, हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना, पाकिस्तान की आईएसआई एजेंसी से भिंडरावाले के लोगों का संपर्क बनना आदि सारा काम भारत सरकार-खुफिया एजेंसियों की नाक के नीचे हुआ!

हां, ब्लू स्टार से पहले भिंडरावाले को यह तक मुगालता था कि वह अजेय है। उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। पत्रकारों से तब उसका कहना होता था कि इंदिरा गांधी के पास क्या है? क्या वे रूसी सेना बुलवाएंगी। हां, भिंडरावाले इस गलतफहमी में था कि भारत की सेना में इतने अधिक सिख हैं कि इंदिरा गांधी सेना भेजने की हिम्मत नहीं करेंगी। इससे पता पड़ता है कि Jarnail Singh Bhindranwale कितना समझदार था तो दूसरी तरफ यह सवाल भी है कि ऐसे दुश्मन के आगे क्या भारतीय सेना को ही उतारा जाना चाहिए था?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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