जात के कैक्टस से खलास किडनी | Cast in Politics Hindu Naya India
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जात के कैक्टस से खलास किडनी!

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गर्व से कहों मैं यादव, मैं दलित, मैं गुर्जर, जाट का छोरा तो उधर गर्व से बोलो में हिंदू! लगभग दस साल की अवधि में ब्लू स्टार आपरेशन, मंडल आयोग और बाबरी मसजिद के ध्वंस की तीन घटनाओं को मैं अब याद करता हूं तो पहले हिंदू-सिक्ख, फिर हिंदुओं के भीतर जातिय झगड़े और उसके बाद मंदिर यात्रा में हिंदू बनाम मुस्लिम के जितने घाव बने है वे हमें कहां ले आए है? देश के नेतृत्व और जनमानस का अब जैसा मानसिक स्तर है वह कुल मिलाकर क्या यह सत्य लिए हुए नहीं है कि हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा !

Cast in Politics Hindu : पत्रकारिता के 45 सालों में मैंने भारत के नैरेटिव में सर्वाधिक जो शब्द सुने हैं उनमें प्रमुख है, जाति! हां, भारत में जाति और भ्रष्टाचार शब्द में भारत की आत्मा होने की होड़ है। इन दो शब्दों का समाज व राजनीति दोनों में उत्तरोत्तर उपयोग बढ़ा। सन् 1971 के बाद जाति का प्रदूषण अधिक फैला। तभी आजादी के पचहतर सालों में भारत ज्यों-ज्यों आगे गया, उतना ही पीछे भी गया। बचपन में मुझे छोटी जात, छुआछूत का बोध था। मगर रैगर, दरोगा, धोबी, ब्राह्मण-बनिया घरों के साझा मोहल्ले और सरकारी स्कूल की पढ़ाई में यह ख्याल दिमाग में कतई नहीं पैठा कि कक्षा में फलां लड़का फलां जाति का है। धोबी, नाई, सुथार, खटिक, सोलंकी, मीणा, गुंजल, टुकलिया सभी तो सेकेंडरी व कॉलेज में सहपाठी थे। उस वक्त न ऐसा ख्याल था कि फलां को आरक्षण से नौकरी मिलेगी, जबकि ब्राह्मण-बनिये के लिए आगे दाखिला व रोजगार नहीं हैं। हां, सन् 1975 में जेएनयू में आने से ले कर पत्रकारिता शुरू होने, टाइम्स ग्रुप में ट्रेनी पत्रकार या ‘जनसत्ता’ में 27-28 साल में ही सीधे सहायक संपादक की नियुक्ति के अपने सफर में जाति, आरक्षण की ग्रंथियां मेरे दिमाग में नहीं थीं। याद आता है कि कॉलेज में पढ़ाई तक दिल-दिमाग में स्वतंत्रता दिवस, नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी, लोकतंत्र, कांग्रेस, जनसंघ, समाजवाद, भ्रष्टाचार जैसे शब्दों की फ्रीक्वेंसी थी। जाति, आरक्षण और हिंदू जैसे शब्दों का जिक्र होने न होने के बराबर था।

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मेरे दिमाग में जाति की बिजली तब कड़की जब 1977 में चुनाव घोषणा के बाद जगजीवन राम ने इस्तीफा दिया। तब यह कयास जाना-सुना कि इंदिरा गांधी को दलित वोट नहीं मिलेंगे। जगजीवन राम का इस्तीफा टर्निंग प्वाइंट है। उसके बाद जाट चरण सिंह बनाम दलित जगजीवन राम की प्रधानमंत्री बनने की राजनीति देखी तो आंखें खुली रह गईं। निःसंदेह 1977 का चुनाव जातिवादी नहीं था लेकिन नतीजों के बाद प्रधानमंत्री का फैसला जाति के झंझट में था। बाद में चरण सिंह के जातीय अहंकार में ही मोरारजी सरकार का पतन हुआ। इंदिरा गांधी-संजय गांधी ने राजनारायण को उकसा कर तब चरण सिंह को विभीषण बनाया। जात के उस सियासी एंगल में फिर यूपी-बिहार में खासकर समाजवादियों- डॉ. राममनोहर लोहिया की थीसिस का जमीनी मतलब समझ आया।

अपना मानना है भारत को, भारत के लोकतंत्र को और समाज को डॉ. राममनोहर लोहिया ने जाति के विचार का जो दीमक पैठाया वैसा योगदान 75 सालों में किसी का नहीं हुआ। जात बनाम हिंदू राजनीति का फर्क यह है कि जनसंघ, भाजपा, आरएसएस की हिंदुवादी राजनीति इतिहास के घाव से थी, 1947 के विभाजन से निरंतरता लिए हुए थी। मतलब सावरकर के इतिहास के दुखी हिंदुओं के लिए राजनीतिक दर्शन में नया कुछ नहीं था लेकिन समाज की दुखी दबी-छोटी जातियों से समाजवादी राजनीति डॉ. लोहिया का मौलिक नुस्खा था। उनकी यह सोच दरअसल पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी से चिढ़ याकि पारिवारिक शत्रुता में कांग्रेस का वोट आधार खत्म कराने मकसद से थी। त्रासद है यह सत्य कि डॉ. लोहिया, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज समाजवादी सच्चे थे लेकिन इन्होंने जाति के जरिए भारत में कलमी समाजवाद पकाया। जातियों के गिरोह बनवाए। लोकतंत्र में छीना-झपटी कराई और समाज में परस्पर जलन पैदा कर असमानता के नए खांचे बनाए।

तभी आजाद भारत का दुर्भाग्य है कि सावरकर का हिंदी राजनीतिक दर्शन और राष्ट्रवाद का विचार जहां ले दे कर दुखी हिंदुओं का मुसलमान को ले कर रोना है वहीं डॉ. लोहिया ने दुखी दबी-पिछड़ी-छोटी जातियों से समाजवादी कैक्टसों की खेती बनवाई। डॉ. लोहिया ने 1959 में भारत को कंटीला, कैक्टसी समाजवाद बनाने के ये बीज मंत्र दिए थे- सब सुखी नहीं हो सकेंगे, कभी कोई दुखी होगा तो कभी कोई और, यह चक्र चलता रहेगा। अगर आप चाहते हो कि कोई एक सुखी न हो, बल्कि सभी सुखी हों तो फिर इस जाति के चक्र को तोड़ना होगा। वह तभी हो सकता है जबकि किसी एक जाति के अधिकार को कम करके दूसरी जाति को बैठाने के बजाय कोशिश यह की जाए कि सब लोगों के अधिकार करीब-करीब बराबर हो जाएं। इसका कोई तरीका निकाला जाए।

ये वाक्य समाजवाद में समान अवसर के मूल विचार में डॉ. लोहिया ने कहे थे लेकिन फिर उपाय में उन्होंने यह फतवा दिया- छोटी जात वालों को ऊंची जगहों पर बैठाओ। उसके बिना तो कुछ आने-जाने वाला है नहीं। यही फर्क है सोशलिस्ट पार्टी में और दूसरी पार्टियों में।.. यह अकेली पार्टी है और कहती है कि पहले अवसर और फिर योग्यता। …70-80 बरस के बाद शायद सारा हिंदुस्तान एक जगह पर खड़ा हो जाएगा और तब अपना कामकाज चला पाएगा। लेकिन चालीस-पचास बरस तक तो इस सिद्धांत को मानना पड़ेगा।…30-40 बरस में हिंदुस्तान का यह हिस्सा जो अब तक बिल्कुल मुरदा है, प्राणवान बनेगा। और इसका यही तरीका है कि पिछड़ों को ऊंची जगह बैठाओ। ..सोशलिस्ट पार्टी की इस वक्त नीति है, उसमें जहर भी है… एक खराबी है कि जो पिछड़ी जाति के लोग हैं, बिना मेहनत किए हुए, बिना काबिल बनने की कोशिश किए हुए ऊंची जगह पर बैठने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे। यह एक खराब नतीजा है, मैं समझता हूं होगा किसी हद तक। लेकिन अगर यह बात चल गई तो ज्यादा नहीं होगा। दूसरा खराब नतीजा..नीची जाति वाला जब उठता है तो वह ऊंची जाति वाले की नकल करके उन्हीं के जैसा बनना चाहता है।…

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डॉ. लोहिया को मैंने इतना कोट इसलिए किया क्योंकि 1955-60 के बीच उन्होंने समाजवादी पार्टी के लिए वोट की जो राजनीति सोची थी उससे बाद के 60 सालों में भारत में वह सब हुआ, जिससे छोटी जाति को आरक्षण का ब्रह्मास्त्र मिला। कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा आदि सचमुच में मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री की ऊंची जगहों पर याकि पंडित नेहरू, एनडी तिवारी की जगह सत्तावान हुए। पिछड़ी-छोटी जातियां इतनी प्राणवान बनीं कि न केवल देश, समाज सब जातिवादी हो गए, बल्कि राष्ट्र-राज्य का सारा स्वस्था, दिमाग-बुद्धि-काबलियत-सत्यता सबका सत्यानाश और छीना-झपटी के भंवर के अलावा कुछ नहीं। सोचें, बकौल लोहिया 70-80 बरस के बाद हिंदुस्तान क्या आज एक जगह पर खड़ा है? और न कभी कोई दुखी और कभी कोई दुखी का चक्र (जातिवाद) खत्म है। न समता है और न समान अवसर है।

तथ्य है डॉ. लोहिया (बनिया) के अनुयायी ब्राह्मण मधु लिमये, भूमिहार राजनारायण, ईसाई जार्ज फर्नांडीज को ज्योंहि 1977 में जनता पार्टी की सरकार में मौका मिला तो ब्राह्मण प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, जाट चौधरी चरण सिंह को येन केन मना कर इन्होंने पिछड़े लोगों के लिए मंडल आयोग बनवाया। एक जनवरी 1979 के दिन राष्ट्रपति द्वारा मंडल आयोग के गठन के आदेश पर दस्तखत का काम वैसा ही फैसला था, जैसे संविधान सभा की ड्राफ्ट समिति के एससी-एसटी आरक्षण के प्रस्ताव पर पंडित नेहरू जैसे अगड़ों की बहुलता वाली संविधान सभा का ठप्पा था। तब कतई वोट राजनीति का स्वार्थ नहीं था। मानवीय सहजता में समाज में समरसता के खातिर तब सोचा गया कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों को समान अवसर देने के मूलभूत सिद्धांत और किसी भी समुदाय या वर्ग के लिए आरक्षण नहीं होना चाहिए की दो राय के मध्य में कुछ समय के लिए (दस वर्ष) उन कुछ समुदायों को आरक्षण मिले जो प्रशासन से बाहर हैं। पंडित नेहरू, डॉ. आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया तीनों बुनियादी तौर पर सभी नागरिकों को समान अवसर देने के सिद्धांत को मानते थे। लेकिन तीनों की बुद्धि ने दूरदर्शिता में नहीं समझा कि वे जो बीज बो रहे हैं तो इससे उलटे जाति चक्र तेज होगा। भारत का लोकतंत्र धर्म और जाति का अजायबघर हो जाएगा!

अजायबघर निर्माण में फिर मील का पत्थर था अगस्त 1990 का दिन! जिस वीपी सिंह को मैंने साफ-सुथरे, भ्रष्टाचार रहित लोकतंत्र के लिए लिख लिख कर व ‘जनसत्ता’, रामनाथ गोयनका ने संस्थागत स्तर पर समर्थन दे कर राजा नहीं फकीर की धारणा में सिर पर बैठाया था. उन्होंने वह जातीय ब्रह्मास्त्र चला कि राजनीति हमेशा के लिए जातीय गिरोहों के सरदारों की गिरवी बन गई। वीपी सिंह का फैसला सौ टका सत्ता के निज स्वार्थ में था। सभी को साथ ले कर चलने का स्वभाव नहीं होने के कारण वे अपने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय मोर्चे को संभाल नहीं पा रहे थे।

नौ अगस्त 1990 को देवीलाल और चौटाला ने दिल्ली के बोट क्लब पर जनसभा का ऐलान किया तो वीपी सिंह ने अपनी बादशाहत पर खतरा बूझा और समाजवादी शरद यादव-रामविलास पासवान ने उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए, पिछड़ों का मसीहा-गांधी बनने का नुस्खा सुझाया। सो, अचानक एक दिन बिना किसी से सलाह-आम राय के वीपी सिंह ने मंडल आयोग के आधार पर पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण का फैसला लिया। तथ्य है कि पांच महीने पहले उनसे संपादकों ने बातचीत में मंडल आयोग पर पूछा और जाति युद्ध की आंशका जताई थी तो उनका जवाब था- यह राजनीति है और हम लोग इतने बेवकूफ नहीं हैं। मतलब मंडल आयोग का नाम लेते रहेंगे लेकिन जरूरी नहीं कि उसे लागू करें।

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लेकिन उन्होंने सत्ता के निज स्वार्थ में समाज शरीर के अंगों को अलग-अलग करने, उन्हें कमजोर बना किडनी फेल करने का आरक्षण ब्रह्मास्त्र चला। नतीजा क्या हुआ? न वीपी सिंह खुद की कुर्सी बचा पाए और न देवीलाल-चौटाला को मात मिली। उलटे पूरा उत्तर भारत और खासकर छात्र-नौजवान, शहरी-पढ़े-लिखे-मध्यवर्ग के घर-घर कड़की बिजली की तरह जातिवादी कीड़ा जा पहुंचा। 19 सितंबर 1990 को पूरा देश हिला जब दिल्ली में एक छात्र राजीव गोस्वामी ने मंडल लागू किए जाने के खिलाफ आत्मदाह करना चाहा। ओड़िशा, यूपी, बिहार, दिल्ली सब तरफ छात्र सड़कों पर निकल पड़े। हिसार, अंबाला, गाजियाबाद, लखनऊ, ग्वालियर आदि शहरों में तब कोई 63 आत्मदाह कोशिशें हुईं। हिंसा और पुलिस गोली से कोई सौ लोग मारे गए।

ब्रह्मास्त्र से वीपी सिंह की कुर्सी नहीं बची। लेकिन करीब एक साल की वीपी सिंह की सत्ता ने वह किया जो आजाद भारत में पहले कभी नहीं हुआ। हिंदू राजनीति पहले तो जाति गिरोह के असंख्य खूंटों में टुकड़ा-टुकड़ा हुई तो इस राजनीति के काउंटर में भाजपा-संघ ने राम मंदिर यात्रा निकाली। हिंदुओं को एकजुट बनाने के लिए नारा बनाया ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’।

गर्व से कहों मैं यादव, मैं दलित, मैं गुर्जर, जाट का छोरा तो उधर गर्व से बोलो में हिंदू! लगभग दस साल की अवधि में ब्लू स्टार आपरेशन, मंडल आयोग और बाबरी मसजिद के ध्वंस की तीन घटनाओं को मैं अब याद करता हूं तो पहले हिंदू-सिक्ख, फिर हिंदुओं के भीतर जातिय झगड़े और उसके बाद मंदिर यात्रा में हिंदू बनाम मुस्लिम के जितने घाव बने है वे हमें कहां ले आए है? देश के नेतृत्व और जनमानस का अब जैसा मानसिक स्तर है वह कुल मिलाकर क्या यह सत्य लिए हुए नहीं है कि हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा !

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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