Fear and power is Hindu life भय व सत्ता ही है हिंदू जीवन की कैंसर गांठ!
बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया| Fear and power is Hindu life भय व सत्ता ही है हिंदू जीवन की कैंसर गांठ!

भय व सत्ता ही है हिंदू जीवन की कैंसर गांठ!

Fear and power is Hindu life

क्या हम हिंदुओं में कभी आइडिया बना कि हम अपना सतयुग अपने हाथों बनाएं? इस तरह सोचना हिंदू चरित्र में संभव नहीं। क्यों? इसलिए कि वह सहस्त्राब्दियों से ईश्वर के अवतार की प्रतीक्षा में है। उसी के भ्रम में गुलामी पकने दी। भयाकुल जीवन जीते हुए सत्ता को ब्रह्म बना डाला। कलियुगी राजाओं को अवतार समझा और अपने को उनकी झांकियों, उनके झूठ का आराधक बनाया। जाहिर है हिंदू चरित्र में विकार, उसका कैंसर सचमुच भय और सत्ता से बनी जहरीली गांठें हैं। इन्हीं से हिंदू जीवन सदियों से जर्जर था और है व भविष्य में भी रहेगा। कभी नहीं समझ सकेंगे कि करें तो क्या करें? Fear and power is Hindu life

मनुष्य दो तरह के होते हैं। जिंदादिल या मुर्दादिल। स्वतंत्र या गुलाम। आजाद या पालतू। निर्भयी या डरपोक। मतलब या तो मनुष्य माफिक जीवन जीने वाले मानव या फिर पशु माफिक जीते बेसुध लोग। यह फर्क इतिहास, अनुभव और परिवेश से बना होता है। आखिर पिंजरे के शेर के बच्चे भी जीने का स्वभाव पिंजरे का लिए हुए होंगे। वे बड़े हो कर यह भान नहीं पा सकते कि वे तो जंगल के राजा। ऐसा ही इंसान का मामला है। कई आबादी समूह कबीलाई, धर्मगत, विचारगत पिंजरों में बेसिक कर्मफल से जीते हैं तो जिम्मेवार कारण वंशानुगत पटरी। उसी से चलता जीवन। वे बेसुधी में भान नहीं पा सकते कि उनका जीना मनुष्य जैसा नहीं। न ही उन्हें वह हौसला और रास्ता सूझेगा, जिससे वे पिंजरे से बाहर निकलें, पुरुषार्थ कर दिखाएं। वैभव के देवता बने और सतयुग अपने हाथों लौटा लें। अपने लोकतंत्र को रामराज्य में कनवर्ट कर दें, कुछ वैसे ही जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों ने किया है।

क्या फालतू बात! मैं कहां से कहां पहुंच गया।

पर सोचें क्या हम हिंदुओं में कभी आइडिया बना कि हम अपना सतयुग अपने हाथों बनाएं? इस तरह सोचना हिंदू चरित्र में संभव नहीं। क्यों? इसलिए कि वह सहस्त्राब्दियों से ईश्वर के अवतार की प्रतीक्षा में है। उसी के भ्रम में गुलामी पकने दी। भयाकुल जीवन जीते हुए सत्ता को ब्रह्म बना डाला। कलियुगी राजाओं को अवतार समझा और अपने को उनकी झांकियों, उनके झूठ का आराधक बनाया। जाहिर है हिंदू चरित्र में विकार, उसका कैंसर सचमुच भय और सत्ता से बनी जहरीली गांठें हैं। इन्हीं से हिंदू जीवन सदियों से जर्जर था और है व भविष्य में भी रहेगा। हम कभी नहीं समझ सकेंगे कि करें तो क्या करें? न बुद्धि खुलती है न रास्ता। भला पिंजरों में बंद तोतों की बुद्धि कैसे खुले? वह तो वहीं कहेगा जो मालिक चाहेगा। मालिक कहेगा राम-राम तो तोता बोलेगा राम-राम। मालिक कहेगा, मनोरंजन करो, किस्से सुनाओ तो बीरबल अपने मालिक अकबर को खुश करेगा। मालिक कहेगा मेरी जुबां (भाषा) में मेरी आरती उतारो तो सभी वह जुबां सीख अकबर जैसा, गोरों जैसा, नेहरू जैसा, मोदी जैसा दूसरा कोई नहीं के तराने गाने लगेंगे।… कल्पना करें सदियों के ऐसे पिंजरावास से हम हिंदुओं को क्या फल प्राप्त है? सिर्फ भय और तोता रटंत में जीने की सत्ता। हिंदू चरित्र जिल्ले इलाही की सत्ता के पिंजरों में वंशानुगत वैसे ही कुंद, मंद और पराधीन था जैसे 20-21 वीं सदी में वह प्रधानमंत्री को देखता हुआ था और है। प्रधानमंत्री (राजा-सत्ता) ही माई-बाप, ईश्वर का अवतार और उसी से रक्षा-सुरक्षा-विकास सब। 

उफ! सदियों के उलटे अनुभव के बावजूद ऐसी नासमझी। हां, अपने जिस राजनीतिक दर्शन (याकि राजा है ईश्वर अवतार और हर युग, हर संकट में हिंदुओं को बचाने के लिए होगा अवतारी पुरूष का अवतरण) में राजाओं याकि पृथ्वीराज चौहान की परंपरा में हिंदुओं ने धोखा खायाविधर्मी सत्ता की पराधीनाता पाई, उसी राजनीतिक विश्वास से हिंदू आज भी, 1947 के बाद जस के तस चिपके हुए हैं तो इसका क्या अर्थ? क्या बेसुधी-नासमझी में जीते जाना नहीं? पिछले 75वर्षों में भी हिंदुओं ने कईयों को अवतार माना। कभी पंडित नेहरू की आरती तो कभी नरेंद्र मोदी की। देश के स्तर पर, प्रदेश के स्तर पर, जाति के स्तर पर अवतार ही अवतार। इसी में फिर अवतारी हाकिम अपने सत्ता मंदिर, अपनी झांकियों व प्रवचन-प्रोपेगेंडा से भक्तों को आह्वान करता हुआ कि ऐसा करो, वैसा करो और मुझे दिया वोट श्रीराम के चरणों में वोट!

इसी तरह का हिंदू जीवन मुस्लिम हमलों से पहले भी था। हम हिंदू अवतारी राजा होने के राजनीतिक दर्शन में जीते थे या गुलाम हुए तो यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत के भरोसे इंतजार में रहे। यह मान पलायन बनाए रहे कि देवलोक से अवतार उतरेगा तब हिंदुओं का पुनरूत्थान होगा। ऐसे ही मनोभाव में हजार साल गुलामी की सत्ता में ढले। भय, समर्पण, पलायन और पालतू जीवन के आदी हुए। वक्त ने, 19वीं सदी ने पृथ्वी की आबोहवा बदली और हिंदुस्तान में आजादी की हवा पहुंची तब भी हम हिंदू आजादी के नाम पर सत्ताट्रांसफर की धुनी लगाए बैठे। एक महात्मा के औचक प्रयोगों से सत्ताट्रांसफर का स्वराज चाहा। उस अवतारी महात्मा ने भी सत्तासे रामराज्य आते देखा तो उनके देवपुरूष नेहरू ने अपना समाजवाद खिलता सोचा। हिंदू महज दर्शक था। उसका महात्मा के लिए भी जयकारा और नेहरू के लिए भी जयकारा क्योंकि दोनों चमत्कारी अवतारी माने गए। दोनों के मंदिर बने, पूजा हुई और घर-घर सत्ताकी वह प्रसादी पहुंचने लगी, जिससे हिंदू का जीवन और सत्ता आश्रित बना।

उस नाते सत्ताश्रय या सत्ता की पराधीनता को यदि आजाद भारत के 75वें अमृत वर्ष का कोई अमृत (विष) कहे तो वह ऐसा कह सकता है।

मैं बार-बार, लगातार सरकार और सत्ता की धुरी पर लौट आता हूं। इसलिए कि इसके अलावा हिंदू जीवन को घूमाने-चलाने वाली दूसरी कोई धुरी नहीं है। हिंदुओं के जीवन में सत्ता ही सूर्य है। सत्ता हिंदू जीवन की ग्रहदशा है। सूर्य, मंगल, शनि, चंद्र सब है। सत्ता की जैसी चढ़ती या उतरती कला होगी वैसे ही हिंदू चरित्र में व्यवहार का ज्वार-भाटा होगा।

Read also यहूदी बनाम हिंदू चरित्र में बूझे निर्भयता और भयाकुलता

कोई माने या न माने अपना मानना है कि 15 अगस्त 1947 के बाद हम हिंदुओं ने अपने हाथों सत्ता को ऐसा माई-बाप बनाया है, उसकी ऐसी नशाखोरी बनाई है कि चरित्र और दिमाग की सभी तंत्रिकाएं उसी की गुलाम हैं। सत्ता वह जादू है, जिसे साधा तो हर बात, हर काम, हर समस्या, हर चिंता और हर चुनौती का निदान। तभी हिंदू का आचरण हमेशा सत्ता माफिक होगा। फिर भले उसके कारण वक्त कितना ही खराब बने, लोग बेमौत बेइंतहा मरे, पर हिंदू के चरित्र में क्रांति-प्रतिरोध संभव नहीं। इसलिए कि सदियों की सत्ताशाही ने हिंदुओं का ऐसा वंशानुगत समर्पण बनवाया है कि वहीं साध्य है और वही साधन। कह सकते हैं दुनिया का हर देश सत्ता और सरकार लिए होता है। तब भला मैं क्यों सत्ता की बोतल में हिंदुओं को बंद, कुंद और लाचार मानता हूं। इसलिए कि दूसरी सभ्यताओं में कौम व देश में सत्तानिर्माण का काम उसी सभ्यता-संस्कृति के सत्व-तत्व में मूल बाशिंदों-नागरिकों से हुआ है। जबकि पृथ्वी के मौजूदा मुकाम में हिंदू वे अनहोने-अजीब लोग हैं, जिन्होने दूसरी सभ्यताओं के मालिकों द्वारा बनाए, छोड़े याकि मुगलों-अंग्रेजों के कोतवाल-कानून-कायदों वाले गुलामी के पिंजरों वाली सत्ताको धारा हुआ है। हिंदुओं की सत्ताहिंदू सभ्यता-संस्कृति से रचित नहीं है, बल्कि वह इस्लाम-ईसाई, पश्चिमी सभ्यता से रचित है। सत्ता क्योंकि मुगल-अंग्रेज रचित विरासत से है तो वह भारतीय, हिंदू की स्वतंत्र चेतना, उसका स्वत्व, उसका मूल, उसकें मानवाधिकार, गरिमा को लिए कैसे हो सकती है?

मसला उलझ रहा है। मोटा मोटी इतना नोट रखें कि ब्रिटेन, फ्रांस, यूरोप, अमेरिका में सत्ता, संविधान और सरकार वहां के लोगों के इतिहासजन्य अनुभवों में खुद द्वारा जमीनी उथल-पुथल, पुनर्जागरण, जन विद्रोह, क्रांति (धर्म-चर्च, सामंतशाही-राजशाही-तानाशाही-नौकरशाही-पराधीनता-गुलामी के खिलाफ) की जिंदादिली से निर्मित है। जो है वह उनका स्वनिर्मित, अंतर्निहित है। ठीक विपरीत हम हिंदुओं ने क्या किया? सदियों पुराने दिल्ली तख्त की कोतवाल सत्ता का अंग्रेजों से ट्रांसफर करवा उससे अपनी सरकार बनाई। नोट रखें चांदनी चौक का कोतवाल या पुणे के घासीराम कोतवाल का चरित्र सदियों पुरानी उस सत्ता का प्रतिनिधि है, जिससे विदेशी-विधर्मियों ने हिंदू दिल-दिमाग में भय बनाकर राज किया। उसी को आजाद भारत ने अपना रखा है। सत्ताके उस सिस्टम को हमनें इक्कीसवीं सदी में भी इस सुक्ति से सही-जरूरी माना है कि भय बिनु होइ न प्रीति। सोचें, जिल्ले इलाही के वक्त का चांदनी चौक कोतवाल, गोरे अंग्रेज के वक्त का सुपरिंटेडेंट कोतवाल और आजाद भारत में नरेंद्र मोदी के मौजूदा मुकाम के सीबीआई थानेदार के तीनों सत्ता रूप क्या पॉवर से हिंदुओं को डराने, उन्हें गुलाम-पिंजरे में रखने की प्रवृत्ति से नहीं थे, या नहीं हैं? यदि हैं तो इससे हिंदू चरित्र और उस अनुसार भारत चरित्र का क्या खुलासा होता है? औरंगजेब से कर्जन और कर्जन से नेहरू व नेहरू से नरेंद्र मोदी के इतिहास में यदि कोतवाल व्यवस्था में लोगों को भयाकुल-जकड़े रख कर ही राजकरने वाली सत्ता-व्यवस्था हिंदुओं की नियति है तो हिंदुओं का अपनी गरिमा, स्वतंत्रता में स्वनिर्मित, मौलिक जीना कैसे संभव? वे हमेशा सेवादार ही बने रहेंगे। लोकतंत्र जहां सत्तातंत्र बना होगा वहीं जनप्रतिनिधि भी जनता पर राज करते हुए। माई-बाप! तभी हिंदुओं का आधुनिक जनप्रतिनिधि भी जनता की ओर से जिम्मेवार संसद में लॉ मेकर नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री याकि हाकिमों-नौकरशाहों-सत्ता खुद की चाहना में बने कानूनों पर महज ठप्पा लगाने वाला आज्ञाकारी है। मतलब जैसे अंग्रेज कानून बनाया करते हैं, लंदन से आइडिया आते थे उसी अंदाज में आज भी दिल्ली में राजकरने के कानून बनते हैं। किसानों, मजदूरों, सेठों सबके लिए ऊपर से कानून। इस सत्य को केवल मोदी सरकार से संदर्भ में न सोचें। पंडित नेहरू ने अपने आइडिया ऑफ इंडिया में समाजवाद के जितने कानून बनवाए थे वे भी उनके और उनके अफसरों के आइडिया, ड्राफ्टिंग में थे, जिनमें न आम जनता की जुबान थी और न भावना। 

भारत में 1947 से पहले और बाद सत्ता द्वारा जनता पर राजकी एप्रोच का फर्क इतना भर है कि हिंदू तब मुगलों, गोरों को विधर्मी-विदेशी बूझता था वहीं आजादी के बाद राजकी सत्ता को वह अपनी होने के बोध में बूझता है इसलिए उसके आगे स्वाभाविक समर्पित है तो उससे छीना-झपटी, भूख, भ्रष्टाचार, लूट का ध्येय अलग बना बैठा है। सत्तावान नेहरू, मोदी यदि हिंदू के लिए देवतुल्य हुए हैं तो जन-जन के मनोभाव में सत्ता साध्य और साधन भी बनी है और उसे साधने की भूख सर्वत्र व्याप्त।

सो, भारत में 1947 के बाद राजकरने, ‘मेरा क्याकी भूख मिटाने का सत्तासाधन व लालसा का रूप भी है। जाहिर है 1947 से पहले की सत्ता प्रकृति का नया विस्तार, उसमें नए आयामों का जुड़ना। भारत की सत्ताका प्राथमिक गुण हाकिम का मजे से, बिना जवाबदेही के राजकर सकना है और यह भयाकुल-असुरक्षित हिंदू बुनावट के चलते है।

दिलचस्प बात है। अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशों में लोगों के मिजाज और चरित्र को समझ अलग-अलग तरह की पुलिस व्यवस्था बनाई। हिंदुस्तानियों, खासकर हिंदुओं के भयाकुल चरित्र में उन्हें मुगलों की कोतवाल व्यवस्था जंची तो उसे अपना कर अंग्रेजों ने सन् 1860-61 में नए कानून बना उसे बारीकी से और पुख्ता बनाया। कोतवाल केंद्रित इंडियन पुलिसको अंग्रेजों ने ऐसे पक्का बनाया, जिससे जहां उनका राज पुख्ता हुआ वहीं प्रजा की गुलाम साईकी में यह धारणा भी बनी कि पुलिस नहीं तो वह सुरक्षित नहीं। अंग्रेजों ने गुलाम हिंदुओं की असुरक्षा, भय और उनके जातीय बिखराव को भुना कर पुलिस की वर्दी को स्वंयभू सत्ता बनाया। तभी औसत हिंदू मनोविज्ञान में वंशानुगत खौफ की हकीकत में सत्ता द्वारा जहां पुलिस का क्रूर उपयोग बना वहीं पुलिस भी स्वंयभू राजा व न्यायकर्ता, मनमानी करते हुए। तभी हिंदू साईकी को दुहने के लिए सत्ताका पुलिस रूप और उसका भारत में ऐसा उपयोग है, जो ब्रितानी उपनिवेशों में कनाडा से लेकर न्यूजीलैंड में कहीं नहीं मिलेगा। उससे भारत में दुश्मन को मरवाया जा सकता है। उसके जरिए जातीय लड़ाई लड़ी जा सकती है। उससे एनकाउंटर कराया जा सकता है। उससे राजनीति की जा सकती है, उससे सरकार बनवाने से ले कर, बहुमत और पैसा जुटाने, वसूलने जैसे काम होते है। भगोड़ों को गोली मरवा जनता की वाहवाही पाई जा सकती है। ड्रग आदि के अवैध धंधे किए जा सकते हैं। रंगदारी बनवाई जा सकती है। इस सबके लिए सिर्फ मालिक की मंशा और पैसे की ताकत भर की जरूरत है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का बस एक फोन हो जाए। सोचे कितना आसान और सस्ता सत्ता सूत्र, औजार। और कोई प्रधानमंत्री, हिंदू राजा याकि नरेंद्र मोदी को न भान और न हिंदू नागरिक याकि भयाकुल, गुलाम नस्ल को यह समझ और सुध है कि इस सबसे तो समाज में भयाकुलता बढ़ती जा रही है। इसी से हिंदू बन नहीं रहे हैं, बल्कि खोखले, भयाकुल और भ्रष्ट होते जा रहे हैं।

सोचे, नरेंद्र मोदी-अमित शाह अपनी हिंदूशाही में जिस तरह सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों और पुलिस के कमिश्नरों, थानेदारों से भयाकुलता बनवाने का काम लेते हुए है उसका हिंदू चरित्र पर क्या असर हो रहा होगा? मैं मोदी सरकार का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों खुद सत्ता के कोतवाल चरित्र से भयाकुलता में गुजरे हैं। इसके बावजूद इन्होंने भी यदि राजकरने का आसान-सस्ता तरीका कोतवालों से भय बनवाने का माना है तो समझ सकते हैं मुगलों और अंग्रेजों ने कितने पहले हिंदुओं के चरित्र की भयाकुलता को पकड़ा और उसके सूत्र से कैसे सदियों राज किया। सो, भारत पर राज करना और उसके सत्ता संचालन या हिंदूओं पर दबिस सबकुछ इसलिए आसान क्योंकि सत्ता स्वयंभू भगवान और नागरिक भयाकुलता से उसको समर्पित। सत्व भय का और तत्व सत्ता का। गांठ भय की और जहर सत्ता का। यही हिंदू जीवन के कैंसर की वह गांठ है, जिससे समाज, धर्म, शरीर खोखला जीवन जीता हुआ है। (जारी)

Tags :

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
मकर संक्रांति से एक दिन पहले राजस्थान में फिर फूटा कोरोना बम, नए मामलों के साथ मौतों का भी बढ़ा आंकड़ा
मकर संक्रांति से एक दिन पहले राजस्थान में फिर फूटा कोरोना बम, नए मामलों के साथ मौतों का भी बढ़ा आंकड़ा