nayaindia Fear is DNA journalism ‘सत्ता’ संग ही 47 में ‘भय’ भी ट्रांसफर!
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‘सत्ता’ संग ही 47 में ‘भय’ भी ट्रांसफर!

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तथ्य गांठ बांधें कि सत्ता के आगे समर्पण, उसकी भक्ति हिंदुओं के मिजाज का गंभीरतम विकार है। हम सत्ता के आगे स्वत्व और स्वतंत्रता, आत्मसम्मान सब भूल जाते हैं। हिंदू मनोदशा के दो एक्सट्रीम है। सत्ता पर बैठे, उसके गुलाम मनसबदार होने का यदि मौका बना तो निडर-निर्भय, बहादुर सैनिक, छप्पन इंची छाती वाले हिंदू अन्यथा सत्ता से दूर तो जीवन भय और भक्ति में जीते हुए। पलायनवादी और समर्पणवादी! .. तभी जानना चाहिए कि 1947 से पहले क्या तो हमारी निडरता थी और 1947 में कैसा था ‘सत्ता’ ट्रांसफर? Fear is DNA journalism

‘भय’ हमारा डीएनए तब कैसे आजाद पत्रकारिता? -2: आजादी पूर्व का भारत कैनवास राजनीतिक था। मतलब भारत में वह लड़ाई, वह संघर्ष, वह क्रांतिकारिता नहीं थी जैसी जारशाही को उखाड़ फेंकने वाली रूसी क्रांति या माओ के ‘लांग मार्च’ या जैसे अमेरिकी आजादी के संघर्ष की लड़ाइयां थीं। दरअसल अंग्रेज ‘भयाकुल’ हिंदुओं की तासीर में राजनीति से राज करते हुए थे। तभी 1917-1947 का वक्त मोटे तौर पर अंग्रेज-कांग्रेस-मुस्लिम लीग के त्रिकोण की उस राजनीति का था, जिसके अंत में जहां विभाजन था वहीं मालिक से गुलाम को बिना व्यवस्था परिवर्तन के ‘सत्ता’ ट्रांसफर थी। आश्चर्य नहीं जो भारत वह बिरला देश है जो आजादी के बाद भी ‘भयाकुल’ नागरिक लिए हुए है। इसे देश और नागरिक बिना बूझे-समझे हुए हैं। भारत उन तमाम कानूनों को अपनाए हुए है, जो अंग्रेजों ने गुलामों के लिए, भारतीयों में भय बनवाए रखने के लिए बनाए थे (प्रेस नियंत्रण से राजद्रोह तक)।

अपना मानना है कि उप महाद्वीप में 14-15 अगस्त 1947 का दिन अंग्रेजों से सत्ता ट्रांसफर का था। वह हस्तांतरण सत्ता के बने-बनाए खांचों का था। उस सत्ता ट्रांसफर में लोगों को भयमुक्त बनाने वाली स्वतंत्रता, जन अधिकारों की नई व्यवस्था थी ही नहीं। वे पूरक लक्ष्य थे, कहने की वे बातें थीं, जिन्हें संविधान में लिख दिया गया। ऐसा क्यों? वजह हिंदू स्वभाव और उसकी साइकी है। हिंदुओं के सोचने में दीनता-हीनता में इस समझ का नहीं होना है कि बिना निज मानव स्वतंत्रता याकि पिंजरे बाहर के जीवन के इंसान स्वतंत्र नहीं, बल्कि बंधा, गुलाम-दीन-हीन-भयाकुल और आश्रित होता है।

1947 से पूर्व की राजनीति में महात्मा गांधी महानायक थे तो उसका आधार हिंदू मर्म में बनी हिंदू संगत थी। उसी से कांग्रेस की राजनीति थी और यह हल्ला भी कि जातियों में बंटे हिंदुओं के सागर की लहरों ने अंग्रेजी जहाज को हिला दिया है। असलियत में वह हल्ला बेमतलब था। उलटे सत्य यह था कि 1942 से 1947 में अंग्रेज बनाम कांग्रेस बनाम मुस्लिम लीग की परस्पर राजनीति में लड़ने-भिड़ने का खूंखार डायरेक्ट एक्शन वाला उत्पात या तो मुसलमानों का था या फिर बाहरी परिस्थितियों व आकस्मिक घटनाओं का! 

फिलहाल बात हिंदू साइकी की है तो सवाल है कि 25-30 करोड़ की आबादी में स्वतंत्रता सेनानी कार्यकर्ता व नेता कितने थे? कांग्रेस के आंदोलन पर गौर करें। 1930 से 1942 के दांडी मार्च से ले कर भारत छोड़ो आंदोलन का मध्य जन आंदोलन का पीक था। उस दौरान का आंकड़ा है कि दांडी मार्च के दौरान कोई साठ हजार और भारत छोड़ो आंदोलन की अवधि में एक लाख लोगों ने गिरफ्तारी दी। ठीक विपरीत भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दूसरे महायुद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले भारतीय सैनिकों की संख्या 25 लाख थी। इनमें 47,746 भारतीय सैनिक मरे और 65 हजार घायल हुए थे। ऐसे ही प्रथम महायुद्ध में 15 लाख भारतीयों ने अंग्रेजों के लिए लड़ाई लड़ी थी।

सो, अंग्रेज हों या मुगल, हम हिंदुओं के लिए सत्ता के आगे समर्पित हो कर उसके लिए लड़ना हमेशा सहज रहा है। फिर भले अफगानिस्तान में अकबर के बतौर सेनापति मानसिंह की लड़ाई को याद करें या पहले और दूसरे महायुद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़ने वाले हिंदुस्तानी सैनिकों को। तभी वापिस यह तथ्य गांठ बांधे कि सत्ता के आगे समर्पण, उसकी भक्ति हिंदुओं के मिजाज का गंभीरतम विकार है। हम सत्ता के आगे स्वत्व और स्वतंत्रता, आत्मसम्मान सब भूल जाते हैं। हिंदू मनोदशा के दो एक्सट्रीम हैं। सत्ता पर बैठे, उसके मनसबदार होने का यदि मौका बना तो निडर-निर्भय, बहादुर सैनिक, छप्पन इंची छाती वाले हिंदू अन्यथा सत्ता से दूर तो जीवन भय और भक्ति में जीते हुए। पलायनवादी और समर्पणवादी!

तो सत्व-तत्व का अकेला बिंदु क्या? ‘सत्ता’! क्यों? इसलिए कि सत्ता की मार में ही हिंदू सदियों गुलामी और भय दोनों की मनोदशा में जीया है और जीते हुए है!

1947 से पहले के वक्त की पहचान हिंदुस्तान की विजेता बनाम गुलाम कौम के व्यवहार के फर्क से भी झलकेगी। सोचें, हिंदुओं पर शताब्दियों राज करने वाले मुसलमानों ने हिंसक डायरेक्ट एक्शन से डरा कर कितनी जल्दी पाकिस्तान पाया? यही नहीं पाकिस्तान लेकर निडरता से उसे इस्लामी देश भी तुरंत करार दिया। कश्मीर की नई लड़ाई छेड़ दी। ठीक विपरीत भयाकुलता में जीने वाले हिंदू तब दुविधाओं में थे। हम-अपने को हिंदू कहें या नहीं? आबादी की अदला-बदली हो या नहीं? कहीं इससे हम बदनाम तो नहीं होंगे? मुसलमान यदि रूक रहे हैं तो इन्हें कैसे निकालें? वे अब जब रह रहे हैं तो हमारे लिए सेकुलर-धर्मनिरपेक्ष बन कर जीना सुरक्षित होगा! 

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तथ्य है कि ज्योंहि जिन्ना-लियाकत अली ने पाकिस्तान मिशन में डायरेक्ट एक्शन किया तो गांधी-नेहरू, कांग्रेस, हिंदू ऐसे डरे कि अंग्रेज फटाफट पाकिस्तान के लिए राजी हुए। न गांधी विभाजन मेरी लाश के प्रण पर टिके रहे और न नेहरू-पटेल-कांग्रेस में यह स्वीकारने की हिम्मत थी कि विभाजन रोकना है तो मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री मान लेते हैं! सोचें, उस वक्त हिंदू निडरता-निर्भयता का क्या कलेजा था? हिंदू नेतृत्व के आंदोलनों/ विद्रोह/ घटनाओं की क्या प्रकृति थी तो मुस्लिम लीग के आंदोलन की कैसी?

भयावह अंतर मिलेगा। इसलिए क्योंकि हिंदू मर्म के भक्ति, श्रद्धा में हुए अहिंसक/ असहयोगात्मक आंदोलन कुल मिला कर प्रतीकात्मक प्रकृति के थे और उसमें जन भागीदारी करोड़ों या लाखों में नहीं, बल्कि हजारों की थी तो वह राजनीति भला हिंसात्मक डायरेक्ट एक्शन के आगे कैसे टिकती? सत्य-तथ्य है कि 1942 से पहले महात्मा गांधी के जिन छह आंदोलनों-  चंपारण आंदोलन 1917, खेड़ा आंदोलन 1918, खिलाफत आंदोलन 1919, असहयोग आंदोलन 1920, दांडी मार्च 1930 और आखिर में भारत छोड़ो आंदोलन 1942 से कथित संघर्ष, चमत्कारी ऊर्जा का जो रूतबा व हल्ला बना था वह त्योंहि पंचर था जब लाहौर में 1940 में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम होमलैंड का हुंकारा मारा और जिन्ना ने पाकिस्तान की ठानी। हां, 1942 के क्रिप्स मिशन से मुस्लिम लीग का धमाल शुरू हुआ तो पांच सालों में उसकी आक्रामकता से भारत का विभाजन था। और विजेता मुस्लिम लीग के आगे हिंदू हतप्रभ, लाचार!

कड़वा सत्य! मगर घटनाओं-सुर्खियों से साबित है कि मुस्लिम लीग के आगे हिंदू नेता कायदे से सियासी शतरंज भी नहीं खेल पाए। गांधी ने महायुद्ध के बीच भारत छोड़ो का आह्वान किया। अंग्रेजों द्वारा बुरा मानना स्वभाविक था। उन्होंने काग्रेस नेताओं को जेल में डाला। जिन्ना ने फायदा उठाया। तभी 1942 से 15 अगस्त 1947 से पहले अंग्रेजों के यहां रूतबा लीगी नेताओं का था। नाजुक वक्त में माउंटबेटन के यहां गांधी-नेहरू अपनी पहुंच के बावजूद विभाजन रूकवाने में नाकाम थे, अप्रासंगिक थे या मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन से घबराए और किंकर्तव्यविमूढ़!

सो, जिन्ना ने पांच साल में पाकिस्तान बनवा लिया। वहीं गांधी-नेहरू और हिंदू पचास सालों की सक्रियता, दोनों धर्मों की कथित साझा कांग्रेस रहनुमाई के दावों के बावजूद हिंदुस्तान की सत्ता को हिंदुस्तान के रूप में अपने नाम ट्रांसफर कराने में असफल थी। क्या दोषी अंग्रेज और मुसलमान थे या हमारी प्रकृति व संघर्ष में कोई खोट?

घटनाओं से मुस्लिम लीग की बेखौफ दादागिरी का अंग्रेजों के अकस्मात (आजादी देने) फैसले में भी रोल दिखता हैं। यदि चर्चिल प्रधानमंत्री बने रहते तो आजादी का फैसला टला रहता। पर चुनावों में उनकी हार और लेबर पार्टी की अप्रत्याशित जीत व एटली के प्रधानमंत्री बनने से आजादी का अचानक फैसला हुआ। तब लंदन के सत्तारूढ़ लेबर थिंक टैंक में गांधी-जिन्ना-नेहरू की राजनीति से परे की कुछ घटनाओं से चिंता पैदा हुई थी। मुंबई में नौसैनिकों के विद्रोह, सुभाष बोस की आजाद हिंद सेना के तीस हजार बंदी सैनिकों की आपदा ने प्रधानमंत्री एटली और उनके मंत्रियों को सोचने के लिए मजबूर किया। नतीजतन आपाधापी में भारत को बांट नेहरू और जिन्ना को सत्ता ट्रांसफर करने की राय बनी।

सो, 1947 से पहले हिंदुओं की निडरता-निर्भिकता की बात भयाकुलता के महासागर में फेंके गए पत्थरों की हलचल माफिक है। पच्चीस-तीस करोड़ की आबादी में अंग्रेजों के खिलाफ मुश्किल से आधे प्रतिशत लोग सियासी तौर पर सक्रिय थे। वे लड़ाई लड़ते हुए नहीं, बल्कि राजनीति करते हुए। मानस व्यवस्था को समर्पित था न कि उसको उखाड़ फेंकने का इरादा लिए। सन् 1972 में इंदिरा गांधी के राज में स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन देने की योजना बनी थी तब सिर्फ पौने दो लाख लोग बतौर स्वतंत्रता सेनानी चिन्हित हुए थे। सोचें, अंग्रेजों के लिए महायुद्ध लड़ने वाले चालीस लाख भारतीय सैनिक तो आजादी के लिए लड़ने वाले हिंदू स्वतंत्रता सेनानी कितने? और हां, यह भी ध्यान रहे कि 25-30 करोड़ की आबादी याकि भारतीयों पर राज करने वाले गोरे अंग्रेज सैनिकों की संख्या सिर्फ 11 हजार!

इस आईने में 1947 से पहले क्या तो निडरता थी और जो ‘सत्ता’ ट्रांसफर हुआ उसमें वह सब क्या नहीं था, जिससे गुलामी बनवाने वाली भयाकुलता बनती है? तभी डीएनए में भयाकुल कलेजे की तस्वीर क्या जाहिर नहीं? क्या कलियुग में हिंदू कभी भी या तब और अब की महादशा में स्वत्व, निज स्वतंत्रता को समझते, बूझते और चाहते हुए था या है? (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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