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हम हिंदुओं के पोर-पोर में ‘भयाकुलता’!

यह याद रखना, बताना जरूरी है कि हम हिंदू हजार साल गुलाम रहे हैं। इसका बुद्धि बोध रहेगा तभी हम फिर सदियों से चले आ रहे विकारों का इलाज सोच सकेंगे। हर काल, हर परिस्थिति और देशी या विधर्मी हर शासन के आगे ‘भय’ में समर्पित रहने या पूजा करने का सदियों का हिंदू स्वभाव यों ही खत्म नहीं हो जाना है। ….हमारे पोर-पोर में कैसे सरेंडर होने के डीएनए हैं। इसे सार-संक्षेप में 1857 से 1947 की घटनाओं के सत्य में भी समझें।

‘भय’ हमारा डीएनए तब कैसे आजाद पत्रकारिता? -1: यदि हिंदुओं का इतिहास व सत्य जब ‘गुलामी’ और ‘भय’ में जीने का है तो वर्तमान कैसे अलग होगा? इतिहास से ही लोगों के रोम-रोम में भयाकुलता है तभी मीडिया भी सत्य बोलता और दिखाता हुआ नहीं है। हम भय और झूठ में लगातार जीते आए हैं। सोचें, हमारा सम-सामयिक इतिहास क्या सत्यता से लिखा जा रहा है? क्या 1947 की आजादी ने और लोकतंत्र ने हिंदुओं के दिलोदिमाग में अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकारों की जिद्द बनवाई है? यदि वह नहीं है तो वजह क्या सत्ता के आगे भयाकुलता नहीं? पिछले 75 वर्षों का इतिहास सत्यता से लिखा गया या प्रधानमंत्री और सत्ता से प्रभावित हो कर? ऐसे ही स्वतंत्रता पूर्व के आजादी के संघर्ष का इतिहास क्या सत्यता-वस्तुपरकता से है? उससे पहले का हजार साला इतिहास कैसा लिखा हुआ है? हम हिंदुओं में क्या हिम्मत है जो अंधे को अंधा, काने को काना, मूर्ख को मूर्ख, गुलामी को गुलामी, झूठ को झूठ, तानाशाह को तानाशाह, ध्वंस को ध्वंस लिखें और बताएं? हजार साला गुलामी में हिंदुओं की याद्दाश्त, आचरण, बोलने-लिखने में कभी वह हुआ, जिसके वीर रस में सच्चाई को सत्यता से स्वीकारा हो? दो-चार अपवादों, दो-चार राणा प्रतापों, सिख गुरूओं के बहादुर बंदों, चंद कलम के धनियों को छोड़ें तो इतिहास से हमारा साक्षात्कार क्या भय की भीरूता से नहीं? क्या चारण और भक्ति वंदना से नहीं?

यह बार-बार बताना जरूरी है कि हम हिंदू हजार साल गुलाम रहे हैं। इसको याद रखने का बुद्धि बोध रहेगा तभी हम फिर सदियों से चले आ रहे विकारों का इलाज सोच सकेंगे। हर काल, हर परिस्थिति और देशी या विधर्मी हर शासन के आगे ‘भय’ में समर्पित रहने या पूजा करने का सदियों का स्वभाव यों ही खत्म नहीं हो जाना है। हमें ‘भय’ के श्राप से मुक्त होने के उपाय, समाधान सोचने-निकालने होंगे तभी सभ्यताओं के भावी संघर्षों का जिंदादिली से सामना कर सकेंगे। तय मानें कि सत्ता पर आत्मघाती भरोसे से नस्ल, कौम लड़ नहीं सकती। आखिर जैसी प्रजा वैसी सत्ता। हमारी भयाकुलता में ही सत्ता की बुनावट है। तभी वह अपनी प्रजा से प्रपंची, झूठा, फरेबी व्यवहार करती है। गुंजाइश ही नहीं जो लोग स्वत्व, स्वतंत्रता से बेखौफ जीवन जी सकें और वैश्विक गौरव पाएं। 

भारत की पत्रकारिता हिंदू मिजाज का आईना है। कौम का गौरव नहीं कलंक है। हमें आजाद हुए, लोकतंत्र अपनाए 75 वर्ष हुए। बावजूद इसके इतिहासजन्य भयाकुलता से जीने की रियलिटी को लिए हुए पत्रकारिता है। सवेरे-शाम-दोपहर जब भी भारत के टीवी चैनल मालिक, एंकर, पत्रकार खबर बुलेटिन बनाते हैं, लेख-खबर लिखते या बोलते हैं तो भय की इस सांस में कि कहीं नरेंद्र मोदी और उनका प्रधानमंत्री दफ्तर नाराज नहीं हो जाए। कहीं वे ट्रोल न हो जाएं। कहीं उन्हें हिंदूद्रोही, देशद्रोही, गद्दार न माना जाए। यह ‘भय’ कम-ज्यादा अनुपात में आजाद भारत के सफर में लगातार है। फिर भले प्रधानमंत्री के प्रति मुग्धता से मौन या भक्ति या रेंगने के रूप में हो। अपवाद में दो-चार रामनाथ गोयनका जैसे मालिक, भामाशाह हुए भी तो वैसा होना घर फूंक तमाशा देखने के बिरले जन्म संस्कारों से था।

क्या मैं गलत हूं? 

गौर करें हजार साला हिंदू इतिहास पर। याद करें कि कितने निडर-निर्भीक मर्द हुए, जिन्होंने बादशाहों, सत्ता, तलवार, तानाशाही और जुल्म के आगे खड़े हो कर जनता को ललकारने का साहस दिखाया हो? हक और आजादी का संघर्ष किया हो? सत्ता को झुकाया हो? क्रांति हुई हो?

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कोई कह सकता है कि हमने 1947 में आजादी तो लड़ कर प्राप्त की। हमने महाबली ब्रितानी साम्राज्य को आजादी देने के लिए मजबूर किया। आजादी के संघर्ष ने हिंदुओं को निर्भय-निडर बनाया। आजादी साहस, निडरता का अर्जित पुरुषार्थ है न कि अनर्जित वरदान!

क्या सचमुच? यदि ऐसा होता तो आजाद भारत क्यों कर अंग्रेजों की ही बनाई व्यवस्था, अफसर-कोतवाल-कानून-कायदों की गोंद से चिपक कर पैदा होता? जनता पंडित नेहरू की माई-बाप सरकार के पालने में क्यों होती? लोग प्रधानमंत्री नेहरू की सत्ता के आगे भक्ति भाव में अपना पुरुर्षाथ, साहस, खुद्दारी क्यों कर सरेंडर किए हुए होते? क्यों स्वत्व, निज स्वतंत्रता माई-बाप सरकार के भरोसे थी?

विषयांतर हो रहा है। लेकिन बूझना जरूरी है कि हमारे पोर-पोर में कैसे सरेंडर होने के डीएनए हैं। जरा सार-संक्षेप में 1857 से 1947 की घटनाओं का सत्य समझें। सर्वप्रथम यह नोट करें कि अंग्रेजों के संसर्ग, उनकी संगत, पश्चिमी शिक्षा से हिंदुओं में आजादी की, समाज सुधारों की चेतना बनी। उनसे हुए बुद्धि बोध में गुलामी चुभने लगी। आजादी का वह भान हुआ, जिसमें धर्म में भी खदबदाहट बनी। ऐसा मुसलमान और हिंदू दोनों धर्मों में हुआ। कारतूस में सुअर और गाय की चर्बी के इस्तेमाल की अंग्रेज बलंडर से जहां मुसलमान भड़के तो हिंदू सैनिक भी। अचानक दीन-हीन मुगल बादशाह के झंडे में मुस्लिम-हिंदू प्रजा के धर्मनिष्ट सैनिकों ने बगावत की। जाहिर है वह धर्मजनित सियासी कुलबुलाहट थी, जिसमें झंडा मुगल था। उस सबक को अंग्रेजों ने गंभीरता से लिया। तब अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व को उकेरा। आगे की सियासी रणनीति सोची। कांग्रेस का गठन किया।

उस कांग्रेस में जब गांधी का प्रवेश हुआ तो धर्म के साथ। गांधी ने सूट-बूट छोड़ लंगोट, धोती और लाठी को जैसे ही धारण किया तो हिंदुओं की धर्मदृष्टि में वे संत के रूप में पैठने लगे। उन्होंने हिंदू के मर्म को छुआ। अहिंसा-सत्याग्रह-रामधुन जैसी बातों से हिंदुओं में गांधी ‘संत’ बने। संत से भक्तों की केमिस्ट्री बनी। गांधी की सियासत हिंदुओं की संगत हो गई। उसे चाहें तो धर्म के उपयोग से चेतना पैदा करना मानें। वह आम आदमी की मनोदशा में धर्म के जरिए आजादी की चेतना पैदा करने का जुगाड़ था। गांधी की सहज ‘महात्मा’ ख्याति हिंदुओं के घर-घर विचार बनवाने वाली थी कि कोई संत है जो गोरों, लाट साहेब लोगों के साथ धोती पहन बैठता है। व्रत रखता है, प्रातः सभा और संध्या वंदन करता है। बकरी का दूध पीता है आदि-आदि! मतलब भक्ति भाव वाला नैरेटिव! 

ऐसे ही गांधी ने मुसलमानों से भी केमिस्ट्री के लिए धार्मिक आह्वान बनाया। उन्होंने कांग्रेस की कमान संभालते ही मुसलमानों से आह्वान किया जागो, उठो और तुर्की के खलीफा के साथ अंग्रेज जो अन्याय कर रहे हैं उसके खिलाफ हमें खिलाफत आंदोलन करना है। अपने खलीफा राज को बचाना है।

पूरी एप्रोच धर्म के मर्म पर भक्ति, श्रद्धा में संगत बनवाने की थी। उसी के बूते धीरे-धीरे गांधी की संगत के आभामंडल में कांग्रेस उनके अधीन वह सियासी शाखा बनी, जिसमें होगा वहीं जो बापू चाहेंगे। स्वराज, पूर्ण स्वराज, समाजवाद, स्वदेशी, राष्ट्रवाद, पूंजीवाद, नेतृत्व के तमाम मसले, आइडिया, चेहरे (नेहरू-पटेल-सुभाष-राजगोपालाचारी-आचार्य नरेंद्र) गांधी की प्रार्थना सभा के मंच पर बापू की इच्छा को समर्पित! क्यों कर यह सब संभव हुआ तो अपना मानना है कि वह भक्ति काल से चले आ रहे हिंदू आचरण की सहज वृत्तियों से था। संत, बापू, महात्मा और उनकी संगत, सत्संग और सेवादारों की सेवा के साथ अहिंसा, सत्याग्रह, रामराज्य के विभिन्न प्रयोगों और प्रवचनों में ही सदियों से हिंदू इहलोक-परलोक विचारता हुआ रहा है तो भक्ति व आस्था क्यों नहीं बनेगी?

गांधी की एप्रोच में हिंदुओं की भक्ति बनी वहीं मुसलमान बिदके। मुस्लिम लीग-मोहम्मद अली जिन्ना ने अपना अलग विकल्प और रास्ता बनाया। उनका रास्ता विजेता कौम की तासीर में था। मतलब लड़ाई से लेंगे पाकिस्तान। गांधी को आघात लगा लेकिन उन्हें चिंता इसलिए नहीं थी क्योंकि 30 करोड़ की आबादी में वे उन बहुसंख्यक हिंदुओं के ‘गांधी बाबा’ थे, जिनकी प्रकृति और तासीर में गांधी के प्रयोग लाजवाब थे, जिनसे दुनिया में गांधी की ख्याति और हिंदुओं को ले कर कौतुकता बनी। ख्याति ऐसी कि 1930 में ही गांधी वैश्विक पत्रिका टाइम के ‘वर्ष पुरूष’ थे।

जाहिर है हिंदू की भक्ति-भयाकुल मनोदशा को बूझ-समझ कर गांधी ने अपना जो हिंदू सत्संग बनाया वैसा कोई दूसरा नेता नहीं बना सका। तभी सन् 1917 से 1947 के बीच हिंदुओं में अन्य कोई नैरेटिव, वैचारिक आंदोलन, संघर्ष का तरीका क्लिक नहीं हुआ। वह स्थिति अंग्रेजों के लिए सोने में सुहागा थी। बीसवीं सदी की अंग्रेज भद्रता में गांधी का ‘रघुपति राघव राजा राम’ वाला आंदोलन इसलिए उपयोगी था क्योंकि प्रतीकात्मक अहिंसक सत्याग्रहों से भला साम्राज्य का क्या-कितना बिगड़ता हुआ था! उलटे गांधी के महात्मा होने की आभा के आगे निडर, जुनूनी, करो-मरो वाले स्वत्ववादी-स्वतंत्रावादी-गरमपंथी खुदीराम बोस, सावरकर, भगत सिंह, सुभाष बोस जैसे तमाम हिंदू सेनानी या तो हाशिए में जाते हुए थे या बदनाम होते हुए। इन निर्भयी, निडर, जूझारू सेनानियों को भटके हुए, अमान्य बनाने, उनकी फांसी तक के औचित्य में तब अंग्रेज हुक्मरान गांधी दर्शन का सहारा लेते थे।

सोचें 30 करोड़ की आबादी में तब बनारस के पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे हिंदू महासभाई हिंदुओं में मान्य नहीं हुए। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का आह्वान करने वाले सुभाष बोस महानायक नहीं बने लेकिन गांधी राष्ट्रपिता हुए तो वह क्या हिंदू की भक्ति परंपरा के जादू का सहज परिणाम नहीं था? मानस यदि ‘भक्त-भयाकुलता’ के डीएनए लिए हुए है तो उसे ‘रघुपति राघव राजा राम’ वाली संतई रूचेगी या भगत सिंह की शूरवीरता? तभी 1917 से 1947 का वक्त बुनियादी तौर पर साबरमती के संत, उनकी भक्ति-संगत की सेवादारी, सत्याग्रहों का था। तब के वक्त में लड़ कर लेंगे आजादी के निर्भयी, निडर मतवाले, क्रांतिकारी या तो चंद भगत सिंह थे या वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुसलमान थे, जिन्होंने भक्त हिंदुओं का भय में समर्पण करा अपना पाकिस्तान बनाया। याद करें जिन्ना ने कितनी आसानी से हिंदुओं को डरा कर पाकिस्तान पाया था।

क्या आप नहीं मानते? तो कल और खुलासा।…

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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