freedom of the press आजाद होते ही फोकस बाहर आजादी!
हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया| freedom of the press आजाद होते ही फोकस बाहर आजादी!

आजाद होते ही फोकस बाहर आजादी!

freedom of the press

हैरानी होती है सोच कर कि पंडित नेहरू, डॉ. अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों ने आजादी का संघर्ष करने के बाद संविधान से जनता की आजादी, गरिमा बनवाने के बजाय जनता को माई-बाप सरकार के पिंजरे में बांधने वाले जतन क्यों किए? लोगों को गुलामी के संस्कारों से बाहर निकलवा निर्भय, निडर, बुद्धिमान बनाने की बजाय वे काम किए, जिससे 75 साल बाद भी जनता सरकार की खैरात पर जीती हुई है। बुद्धि जहां सत्ता की बंधक और प्रधानमंत्री की आरती उतारते हुए वही अभिव्यक्ति की आजादी सत्ता के आगे थिरकती हुई। freedom of the press

भारत वह देश है, जिसने लोकतंत्र तो अपनाया लेकिन लोगोंके नाम पर संविधान बना कर लोगों को ही सत्ता के दरवाजे पर बंधुआ बना बैठा दिया। सत्तातंत्र सर्वोच्च! प्रधानमंत्री अवतार! मंत्री, दरबार, कारिंदे जनता के माई-बाप! ये लोक सेवक नहीं, बल्कि लोक पितामह! हैरानी होती है सोच कर कि पंडित नेहरू, डॉ. अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों ने आजादी का संघर्ष करने के बाद संविधान से जनता की आजादी, गरिमा बनवाने के बजाय जनता को माई-बाप सरकार के पिंजरे में बांधने वाले जतन क्यों किए? लोगों को गुलामी के संस्कारों से बाहर निकलवा निर्भय, निडर, बुद्धिमान बनाने की बजाय वे काम किए, जिससे 75 साल बाद भी जनता सरकार की खैरात पर जीती हुई है। बुद्धि जहां सत्ता की बंधक और प्रधानमंत्री की आरती उतारते हुए वही अभिव्यक्ति की आजादी सत्ता के आगे थिरकती हुई।

तथ्य है संविधान सभा में प्रेस की फ्रीडम के स्पेशिफिक जिक्र की जब बात आई तो डॉ. बीआर अंबेडकर और बीएन राव ने यह कहते हुए उसे गैरजरूरी बताया कि संविधान में जब अभिव्यक्ति की आजादी है तो उसमें अपने आप प्रेस की आजादी निहित है। वह गोलमोल अंदाज था। संविधान बनाने वालों को सोचना चाहिए था कि जब अमेरिकी संविधान में प्रेस की आजादी पूर्णता से उल्लेखित है तो वहां ऐसा क्यों किया गया? वहां संविधान में प्रेस का जिक्र एब्सोल्यूट स्वतंत्रता देते हुए है। फ्री स्पीच, अभिव्यक्ति की आजादी में क्या शामिल है और क्या नहीं इसकी भी अमेरिकी संविधान में दो टूक व्याख्या है तो भारत में आजादी को क्यों गोलमोल बना रहे हैं? अमेरिका में संविधान के पहले संशोधन से अभिव्यक्ति की आजादी गारंटीशुदा है। वहां कोई भी व्यक्ति अपने विचार की आजादी में वह आइडिया भी जाहिर कर सकता है, जो धर्म, नस्ल को आहत करने वाला या आक्रामक लगे। सोचें, ऐसा क्यों कि अमेरिका में, फ्रांस में अभिव्यक्ति की आजादी के पंख लगा कर नागरिक को उड़ने की पूर्ण स्वतंत्रता में पोप या पैगंबर पर कार्टून बनाने तक की स्वतंत्रता है तो ऐसा वहां क्या सोच हुआ? ठीक विपरीत यदि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में शर्तों के साथ बंधी हुई है तो भला क्यों? और क्या ऐसा होना अंग्रेजों की याकि गुलाम-दास व्यवस्था में व्यक्ति को बांधने की चली आ रही व्यवस्था से नहीं है

सचमुच अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर आदि ने अंग्रेजों की इस चिंता को ही अपनाया कि उन्हें प्रजा पर शासन करना है। मतलब पूर्ण स्वतंत्रता सही नहीं। तभी संविधान निर्माताओं ने अभिव्यक्ति की आजादी देते हुए भी उसके दायरे, स्कोप को संकुचित बना बांधा। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का दिमाग 1951 के पहले संशोधन के वक्त यह सोचते हुए था कि सिविल लिबर्टी के बेशुमार जुमलों का सत्य अपनी जगह है लेकिन उन्हें बतौर सिद्धांत अपनाना दूसरी बात (discovered that mouthing platitudes to civil liberties was one thing, and upholding them as principles was quite another)! दरअसल पंडित नेहरू और उनकी सरकार अंग्रेजों से प्राप्त औपनिवेशिक पुलिस और क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को भी क्योंकि अपनाए हुई थी तो तब से सरकार में लगातार माना जाता रहा है कि मानवाधिकारों से बाधाएं हैं और उनकी रक्षा करना, उन्हें सुनिश्चित करना कानून व सरकार का सेकेंडरी कर्तव्य। 

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सवाल है पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर क्यों कर प्रेस की आजादी, नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी को सर्वोपरि और पूर्ण बनाने के लिए प्रो-एक्टिव नहीं थे? उन्होंने क्यों अंग्रेजों वाली व्यवस्था रखी? क्यों प्रेस को अंग्रेजों के कानून, डीएम और सरकारी दफ्तरों की मंजूरी में बांधे रखा? इसलिए कि वे अपने आपको, अपनी सरकार को पूरे देश का, पूरी जनता का पालनहार समझे हुए थे। सब कुछ सरकार से होना चाहिए। इसलिए अपना मानना है कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात से शुरू आजादी लोगों को स्वतंत्रता से पंख फड़फड़ा कर उड़ाने वाली नहीं थी, बल्कि लोगों को माई-बाप सरकार के आश्रय में बांधने वाली थी। भले पीछे मंशा याकि गलतफहमी लोगों के भले की रही हो। कितना दुर्भाग्य है कि आजादी से पहले पंडित नेहरू ने भारत को डिस्कवर करते हुए भारत के लोगों की दुर्दशा पर विचार किया लेकिन जब वे उन्हीं लोगों के नियंता, पहले प्रधानमंत्री बने तो सोचा नहीं कि पहली प्राथमिकता लोगों को माई-बाप गुलामी से मुक्त बनाने की होनी चाहिए। उन्हें सरकार के नियंत्रणों से मुक्त कर उड़ने दिया जाए। लोगों की बुद्धि, पुरुषार्थ को पंख लगने का आजाद परिवेश बने।

सोचें, हम 1947 में आजाद किससे हुए? गुलामी से। गुलामी किसकी? दिल्ली की सत्ता से जो तब अंग्रेजों की थी। उससे पहले मुगलों की या राजे-रजवाड़ों की। मतलब सत्ता के कंट्रोल, शोषण और लूट से आजादी। जाहिर है कोर सत्य गुलामी का है उसके बाद गरीबी का मसला! तभी क्या हिसाब से लोगों को आजादख्याल बनाने, उन्हें पुरुषार्थी, हिम्मती बनाना नंबर एक प्राथमिकता बनती है या नहीं? लेकिन भारत के संविधान निर्माताओं ने क्या प्राथमिकता बनाई? अपनी सरकार, माई-बाप सरकार बनाना। गरीबी मिटाएंगे, जन कल्याण करेंगे। कैसी बेहूदा बात थी जो एक तरफ अंग्रेजों से प्राप्त, दिल्ली सल्तनत के बादशाह-कोतवाल चरित्र वाली हाकिमी सत्ता और उसी के बूते संविधान-व्यवस्था से गरीबी मिटने और विकास का ख्याल! सरकार जनता का लालन-पालन करेगी, अनाज बांटेगी, कोटा-परमिट-कानून से पैसे-धन-पूंजी की समानता बनवाएगी। मतलब जो काम जनता को आजाद कर, पिंजरों से बाहर निकलवा, पंख फड़फड़ा पुरुषार्थ, बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान से करना था वह पिंजरे के मालिक करने लगे और जनता पिंजरे में ही!

इसलिए शासन जब माई-बाप है और उसी ने जनता को पालने, दाना-पानी देने का जिम्मा संभाला हुआ है तो उस व्यवस्था में भला अभिव्यक्ति, मानवाधिकार, प्रेस आजादी की क्या जरूरत? तोतों को बोलने का अधिकार है पर माई-बाप पिंजरे की सोच, उसके सिखाए जुमलों के अनुशासन में।

हां, 1947 के वैश्विक वक्त में फैबियन समाजवाद, साम्यवाद में सरकार ही माई-बाप, वहीं समझदार और उसी के प्रयोगों में इंसान-देश को गढ़ने की वैचारिक फितरत ने भी पंडित नेहरू और उनकी सरकार में वे संस्कार पैठाए, जिससे पहले दिन से माना गया कि प्रजा बिना बुद्धि की है। सो, जनता के पुरुषार्थ, उसकी कल्पनाओं, उड़ान, धुन का ठेका जनहित के तकाजे में सरकार ने अपना माना। उस वक्त की वैचारिक वैश्विक आबोहवा में भारत के पढ़े-लिखे लोग, संपादक, बुद्धिजीवी भी समाजवाद-साम्यवाद के रूमानी ख्यालों में ज्यादा थे। फिर अंग्रेजों से आजाद हो जाना क्योंकि अकल्पनीय बात थी तो गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर याकि संविधान निर्माता महामानवों को भगवान समान समझे जाना स्वभाविक था। इस बहस की गुंजाइश ही नहीं थी कि पूरी पृथ्वी पर हिंदू अकेली वह नस्ल है, जो लगातार सैकड़ों साल दासता, बुद्धिहीनता, बिना पौरूष जीती रही है इसलिए पहली जरूरत लोगों में निर्भयता के पंख लगाने की है।

सो, 15 अगस्त 1947 से पूर्व आजादी के लिए लड़ने वाले जिंदादिल, संघर्षशील, खुद्दार नेता भी आजादी के तुरंत बाद, जहां सत्ता के हाकिमों में कन्वर्ट हुए वहीं आजादी पूर्व की जिंदादिल, संघर्षशील, खुद्दार पत्रकारिता भी बदली। आजादी की लड़ाई के 75 प्रतिशत विचारवान, आजादीपरस्त लोग या तो सत्तावान बने या अपनी पत्रकारिता को नौकरी में कन्वर्ट करके जो नेहरू कहते थे उसकी मुग्धता में यह पत्रकारिता करने लगे कि एज मिस्टर नेहरू राइटली सेड…

मोटे तौर पर तब माना गया कि बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की आजाद उड़ान समाजवाद की वे नौकरियां हैं, जिसमें किताब, रिसर्च, अकादमिक धुन, साहित्य, कला, पत्र-पत्रकारिता सब निहित है। ये वे प्रोफेशन है जो बिना सत्तावान, बिना हाकिमी कृपा के सुचारू रूप से फल-फूल नहीं सकते। तभी धीरे-धीरे लेखन, क्रिएटिव, अखबार, रेडियो, दूरदर्शन सब माई-बाप सरकार की पहल, उनकी संस्थाओं के आसरे।…..

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हां, आजादी के बाद भी भारत में रेडियो वैसे ही चला जैसे अंग्रेजों के वक्त था। सरकार के स्वामित्व में सरकार की बात करते हुए। दूरदर्शन आया तो वह भी वैसे ही चला। ऐसे ही अखबार वैसे ही चले जैसे अंग्रेजों के वक्त चलते हुए थे। पहले सरकार में नाम पंजीकरण, फिर डीएम के आगे घोषणापत्र, सरकार के आगे हर साल जवाबदेही। यहीं नहीं सरकार ने माई-बाप रोल में विज्ञापन देने, जमीन देने की वह रीति-नीति बनाई, जो खबरपालिका के हक से नहीं, बल्कि कृपा से मिलती हुई। ऐसा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि में कहीं नहीं है। हिसाब से लोकतंत्र के तकाजे में माई-बाप सरकार के विचार में भी सोचें तो खबरपालिका को, संपादकों-मालिकों-पत्रकारों को अधिकार से साथ सुविधाएं, पैसा और बजट वैसे ही दिया जाना चाहिए था जैसे न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका जैसे तीन खंभों को बनाने के लिए मिला या मिलता है। जब मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है तो उसे सरकार से क्यों न सालाना बजट मिले? फिर बुनियादी बात कि भारत के लोगों को अफसर, सत्तावान याकि मुगल-अंग्रेजों वाले हाकिम-कोतवालों की जरूरत अधिक है या गुलामी से बाहर निकाल प्रजा में बुद्धि-निर्भय-पुरुषार्थी बनाने के बीज डालने वाले बुद्धिमानों, इंटलिजेंसिया, संपादकों, पत्रकारों की अधिक जरूरत

कितनी बड़ी बात! पर गुलाम नस्ल में ऐसे सोचे कौन? नतीजा सामने है। सन् 2021-22 में यदि भारत भयाकुल पत्रकारिता की वैश्विक शर्म है तो 140 करोड़ लोग की भीड़ भी हर वैश्विक इंडेक्स में बुरी तरह गिरी हुई। (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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