अंधे हैं लेकिन पता नहीं अंधे हैं!

भारत की समस्या हिंदू हैं। हिंदू की समस्या बुद्धि है। बुद्धि की समस्या गुलामी से बनी प्रवृत्तियां हैं। हिंदू की प्रवृत्तियां, उसका चेतन-अचेतन-अवचेतन का वह मनोभाव है जिससे बुद्धिबिना स्वतंत्रता के भभके के है, बिना मौलिकता के है।वह न प्रखर है और न निर्भीक। भीरुता, दासता, हीनता और दोयमता हैऔसत हिंदू बुद्धि की पहचान। निर्बुद्धि में जीना हिंदू की नियति और उसका स्वभाव है। ऐसा कैसे हुआ? मूल वजह इतिहास है। चिंरतन गुलामी और हाकिमशाही मेंसदियों जीने का अंतहीन हिंदू अनुभव वह मूल बीज है, जिससे वह आजादी के अवसर में भी स्वतंत्र बुद्धि और बौद्धिकता की मुक्त उड़ान भर नहीं सकता।इतिहास ने हिंदुओं की प्रकृति व स्वभाव को ऐसे पकाया है, जिससे सनातनी हिंदू का यह मूल बीज मंत्र भी भोथरा हो अर्थ खोए हुए है कि ‘पुरुषैर्थ्यते इति पुरुषार्थः’!

हमारी बुद्धि, हमारा पुरुषार्थ बिना इस भान, लक्ष्य-उद्देश्य के है कि हमें करना क्या है? हम भले-बुरे को बूझ नही पाते। बुद्धि और निर्बुद्धि का भेद नहीं कर पाते। क्या मेरी-आपकी बुद्धि ने कभी सोचा कि 1947 से पहले भारत ब्रिटेन का कैसा आर्थिक उपनिवेश था और आज हम चीन पर कैसे आश्रित हैं? जवाहरलाल नेहरू., पीवी नरसिंहराव, नरेंद्र मोदी के तीन अलग-अलग व्यक्तित्वों ने जिन उद्देश्यों में भारत का जो पुरुषार्थ बनाया था तो उससे भारत को कुल जमा क्या प्राप्त हुआ? नेहरू का भी मंत्र आत्मनिर्भरता का था और आज नरेंद्र मोदी भी वहीं सुर लिए हुए हैं। बावजूद इसके हमारा 73 साला सफर कहां पहुंचा? भारत अनजाने-अनचाहे चीन का आज ऐसा आर्थिक गुलाम है कि किसी को समझ नहीं है कि उस पर इतने निर्भर कैसे हो गए? कैसे अब हम अपनी सार्वभौमता, अपनी जमीन बचाएं? उससे कैसे लड़ें?

बुद्धि चकरा जाएगी यदि सोचेंगें कि 1947 से पहले भारत ज्यादा आश्रित था या आज ज्यादा आश्रितहै?हर कोई चिंता में है कि चीन से सप्लाई बंद हुई तो बरबाद होंगे। लोगों को महंगा सामान मिलेगा, आर्थिकी बरबाद होगी! इस बात को दूसरी तरह से समझें कि आज हम पर कौन निर्भर है? डोनाल्ड  ट्रंप ने एक झटके में एच1बीवीजा खत्म किया। उन्हें, उनके प्रशासन और वहां की आईटी कंपनियों ने सोचा तक नहीं कि भारत के आईटी पेशेवर अमेरिका की मजबूरी हैं।जाहिर है अमेरिका न आश्रित है, न भारत से दोस्ती का दिवाना है। सचमुच भारत पर क्या कोई देश (भूटान को छोड़ें) किसी भी तरह निर्भर है? नेपाल, श्रीलंका तक नहीं हैं। अमेरिका, चीन आदि तमाम महाशक्ति देश अपने पर दूसरों की निर्भरता बना कर महाशक्ति हैं जबकि भारत वह देश है, जिस पर न कोई निर्भर है और न वह किसी का सहारा है। ठीक विपरीत हमारी मजबूरियां हैं! हर छोटी-बड़ी चीज के लिए दूसरे पर आश्रित हैं। सोचेंयदि अमेरिकी कंपनियां फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, गूगल आदि की भारत को सेवा देना बंद कर दें तो भारत की अधकचरी बुद्धि के लिए प्लेटफॉर्म ही  नहीं बचेंगे। क्या शर्मनाक बात है जो टिकटॉक पर भारत में लोग ऐसे रोते दिखाई दिए मानो बिना चीनी ऐप के हमारा काम नहीं चल सकता है!

क्या यह यर्थाथ भारत की सामूहिक चेतना में, हिंदुओं की बुद्धि में विचार बनाता है? कैसा हिंदू मानस है, कैसी बुद्धि है जो ख्याल तक नहीं कि हमने बनाया क्या है, जिससे हम अपने बूते दुनिया को प्रभावित करें। हमारी धुरी पर भी दुनिया कभी घूमे! पर ऐसा तब सोच सकते हैं जब बुद्धि में उड़ने का, बेबाकी से विचार का और विचार के लिए लक्ष्य-उद्देश्य,पुरुषार्थ का भभका बना हुआ हो।

मैं भटक रहा हूं। मूल सवाल हिंदू की बुद्धि का है।इतिहासमेंगुलामी के अनुभव ने हमारी बुद्धि को दस तरहसे कुंद बनाया है। उसी के चलते आज भी हाकिमशाही तंत्र, उसके आगे नागरिक कीभीरुता, दासता, हीनता व दोयमता के स्वभाव ने हमें उस दीन-हीन अवस्था में पहुंचायाहै, जिसमें हमारी दुनिया को जरूरत नहीं है लेकिन हमें उनका सहारा चाहिए। हमें उनसे काम चाहिए। रोजगार-पूंजी चाहिए। सुरक्षा चाहिए, ल़ड़ाकू विमान चाहिए, गोला-बारूद चाहिए। और सबसे ज्यादा अमेरिका, यूरोप, आसियान आदि से वह हौसला चाहिए कि चीन से लड़ो, हम तुम्हारे साथ है!

क्या नाम दें ऐसी दीन-हीन अवस्था को? कैसेहै यह अवस्था?वजह इतिहास और गुलामी है तो आजाद भारत का अपराध है जो उसने 73 सालों में अपने नागरिकों को और खासकर हिंदुओं को निर्भीक, बुद्धिमान, स्वतंत्र बनाने के लिए कुछ नहीं किया! हिंदुओं की बुद्धि को वैसे ही दास बनाए रखा जैसे अंग्रेज, मुगल बनाते थे। मतलब हुकूमत, पॉवर की बेड़ियों में जकड़े रखना। तंत्र पहले गण बाद में। तंत्र और तंत्र का राजा तय करेगा कि लोगों को कैसे जीवन जीना है। तंत्र माईबाप और प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री, अफसर पॉवर-सत्ता का वह मंदिर, जिसमें प्रजा को सिर्फ भक्ति-याचना करनी है और प्रसाद ले कर, सत्ता पर निर्भर हो कर अपने को बचाना है, अपने को चलाना है या अपने-आपको बनाना है।

उस नातेलगता है 1947 की आजादीव लोकतंत्र दोनों भारत के हिंदुओं के लिए वह शॉर्टकट हैं, जिसनेचार्वाक ऋषि के अर्थ और काम के लक्ष्य कीसिर्फ लालसाहै तो इनके पीछे हिंदुओं को भगाए रखने का जुगाड़ भी है। आदि वेद और मनु दर्शन के बताए पुरुषार्थ याकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें अर्थ और काम में दो लक्ष्योंमें ही हिंदू जीवन असलियत में धड़कता है। विद्या-बुद्धि का मतलब नहीं। वह महज अर्थ-काम का कामचलाऊ साधन है तो धर्म लक्ष्यऐसी रूढ़ि में तब्दील है कि गंगा में डुबकी लगाओ, मंदिर बनाओ, भगवा पहनो, कर्मकांड करो और सिद्धि हुई मोक्ष व धर्म की!

जब कोई नस्लबुद्धिहीनता, खौफ-भीरूता में जीती है तो शॉर्टकट तलाशती है। हजार साल की गुलामी ने हिंदुओं के कई शॉर्टकट बनाए। ब्राह्मण ने भले समाज रचना के जतन से धर्म को बचाने का अनहोना काम किया मगर वह पर्याप्त नहीं था। एक शंकराचार्य को छोड़कर कोई दूसरा हुआ ही नहीं, जिसने धर्म चेतना पैदा कर धर्मावलंबियों में जान फूंकी हो। उलटा हुआ। सत्ता की चाकरी को नियति मान लिया गया। अपने को बचाते हुए, शुतुरमुर्ग बन कर या भक्ति मार्ग से जीवन जीने की प्रवृत्ति बनी। यह राजनीतिक दर्शन घर-घर जा पैठा कि -‘कोउ नृप होहि हमे का हानी, चेरी छोड़ न होइब रानी’!

हिंदी के एक लेखक थे बालकृष्ण भट्ट। उन्होंने 1899 में हिंदुओं की तात्कालिक दशा-दिशा पर विचारते हुए एक लेख ‘हिंदू जाति का स्वाभाविक गुण’ के शीर्षक से लिखा।उन्होंने हिंदुओं की बुद्धि में तमोगुण आने की बात के साथ लिखा कि वे धर्मवृक्ष के मूल को सींचना भूल गए व डाली और पत्तों को सींचने लगे।..स्वहत्वल रक्षा, स्व्त्वाेभिमान (जिन्हें स्वतंत्रता की चेतना से ही साधा जा सकता है) आदि मूल तत्वों को न जाने कब से छोड़ बैठे।..यवनानुयायी याकि मुस्लिम अनुगामी हो गए। पौरुषेय गुण विहीन हो गए। जरा-सी बातों के लिए दूसरे का मुंह जोहते हैं। विष-लता के समान अकर्मण्यगता सब ओर ऐसी छाई कि उद्यम, साहस, आत्म गौरव, जातीयताभिमान, उत्तेजना आदि पौरुषेय गुणों के बीज को अब बोने का कहीं समय, सुध ही नहीं। दो ही प्रबल कामना हैकामवासना और रसना।.. मुसलमानों के संपर्क से उनकी सी भोग लिप्साा हमारे में बढ़ गई।न जाने कितने हिंदू यवनी के प्रेम में आसक्तू हो अपने बाप दादा को छोड़ खुलाखुली मुसलमान हो गए। मेरे मन में ऐसा आता है कि तीन-चौथाई मुसलमान जो अपने मत को बदल हिंदू से मुसलमान हुए हैं ऐसे ही हैं।..यावनिक आचरण, बोलचाल, रहन-सहन, अरबी-फारसी के पढ़ने से हम इन्हेंं अर्द्ध यवन कहें तो अनुचित न होगा।…थोड़े उपकार को भी बहुत कर मानने वाले हमारे जैसे लोग दूसरे नहीं हैं। अकबर जैसे मुसलमान बादशाहों ने इस बात को जान लिया था और वैसा बरताव किया तो फल यह हुआ कि हिंदू प्राणपन के साथ इनकी फरमाबरदारी से नहीं चूके।…सच है स्वांर्थ का लोभ ऐसा ही प्रबल होता है, जिसकी प्रेरणा से मनुष्यर स्वादर्थान्धे हो उचित को अनुचित, अनुचित को उचित मानने लगता है।…राजा को साक्षात् ईश्वयर का अंग मानना हमारे यहां के धर्मग्रंथों में लिखा है लेकिन अबतो मानों साधारण रीति पर यह हमारा एक धर्म सा हो गया। आचार-विचार में इस बात को अपना लिया है।…अत्यारचारी से अत्यारचारी मुसलमान बादशाहों की इबादत करते ही आए।…अब वह स्वारर्थ दृष्टि अंतिम छोर को पहुंच गई है।.. भविष्य  जैसा हिंदुस्तान के रहने वालों का धुंधला देख पड़ता है वैसा किसी देश के रहनेवालों का न। … ठीक है-”प्रकृति यांति भूतानि निग्रह: किं करिष्यहति”-जिसका जो स्व.भाव है नहीं छूटता, कोई कितना ही उसके रोकने का उपाय करे कृतकार्यता नहीं होती। अथवा-”विवेकभ्रष्टा नां भवति विनिपात: शतमुख:”….जिनको अपने भले बुरे का ज्ञान नहीं है वे बराबर नीचे ही को गिरते जाते हैं। पता नहीं आगे इस निर्बुद्धि, अंधे समाज का और क्याह होने वाला है।

सोचें, सवा सौ साल पहले के हिंदू समाज की अवस्था के परिप्रेक्ष्य मेंबालकृष्ण भट्ट ने दिसंबर 1899 में जोलिखा था वह क्या आज का सत्य नहीं है? उनके इस लिखे में मुसलमान के बाद अंग्रेजों के वक्त, अंग्रेजी और अंग्रेजियत के असर में रहे हिंदुओं पर विचार करें, काले अंग्रेजों का ख्याल बनाएं या नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी के अवतारी राजा की लोगों द्वारा प्राणप्रण से फरमाबरदारीपर सोचें तो 19वीं सदी, 20वी सदी और 21वीं सदी के हिंदू में मौलिक फर्क क्या कुछ मिलेगा? क्या लगेगा नहीं कि मुगलों के वक्त जो था वहीं अंग्रेजों के वक्त था और वहीं आजाद भारत में है।

उफ! सत्ता का, तंत्र का मुंह जोहते हुए जीवन जीना, राजा को साक्षात् ईश्वंर का अंग मानना, स्वार्थ में अंधा हो कर उचित को अनुचित, अनुचित को उचित मानना और जीवन को कामवासना (याकि धन, यश आदि) में भोगना औरसत्ता की चाटुकारिता के साथ बुद्धिहीनता वाला व्यवहार क्या दुनिया की किसी और नस्ल का है? फिर सबसे बड़ा त्रासद पहलू जोहम लोगों की बुद्धि का यह बूझ नहीं पाना कि वह कैसा अंधापन लिए हुए हैं! (जारी)

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