nayaindia Hindu kaliyug apana kaise भय में भस्म ‘वीर भोग्य वसुंधरा’!
बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया| Hindu kaliyug apana kaise भय में भस्म ‘वीर भोग्य वसुंधरा’!

भय में भस्म ‘वीर भोग्य वसुंधरा’!

मैं हिंदू और भारत का भविष्य वैसा ही बूझता हूं, जैसा वर्तमान है या इतिहास था। क्यों? पहली बात, हम हिंदू वक्त के बंधुआ हैं। वक्त जैसे बहाएगा वैसे बहेंगे। दूसरी बात, वक्त को बदलने का बुद्धि बल नहीं है क्योंकि उसके लिए जरूरी बहादुरी, निर्भयता का हौसला हममें पैदा नहीं हो सकता। और तो और इस जरूरत की सुध कौम, देश को है ही नहीं। तब भला बुजदिली की बुद्धि से कैसे स्वतंत्र उडान संभव है? कहां से, कैसे बनेगी निर्भयता? कैसे कलियुगी चरित्र से पिंड छूट सकता है?

कलियुग अपना कैसे?-2: मसला हिंदू मनोदशा की तंत्रिकाओं का है। ये अचेतन में उन किन अनुभवों से बंधी है, जिसके ऑटोमेटिक रिफ्लेक्स के ट्रॉमा में दिल और दिमाग धड़कता है? अनुभव का सार सदियों की गुलामी और खौफ है। इसी के ट्रॉमा से हिंदू भूख, भक्ति और भाग्य के भरोसे जीने का आचरण बनाए हुए है। कह सकते हैं भय, भूख, भक्ति और भाग्य के चार आम हिंदू के स्वभाव की कलियुगी बुनियाद हैं। यही आधार, आचरण, स्वभाव इतिहास है। वर्तमान है और भविष्य की दशा-दिशा भी। हां, मैं हिंदू और भारत का भविष्य वैसा ही बूझता हूं जैसा वर्तमान है या इतिहास था। क्यों? पहली बात, हम हिंदू वक्त के बंधुआ हैं। वक्त जैसे बहाएगा वैसे बहेंगे। दूसरी बात, वक्त को बदलने का बुद्धि बल नहीं है क्योंकि उसके लिए जरूरी बहादुरी, निर्भयता का हौसला हममें पैदा नहीं हो सकता। और तो और इस जरूरत की कौम, देश को सुध तक नहीं है। तब बुजदिली की बुद्धि की स्वतंत्र उड़ान कैसे संभव? कहां से, कैसे बनेगी निर्भयता?

एक कटु सत्य पर गौर करें। 15 अगस्त 1947 से भारत का नया वक्त शुरू हुआ। तब से अब तक के वक्त में हम हिंदुओं ने याकि भारत ने अपनी जमीन गंवाई या बचाई? पृथ्वी के पहले पचास या सौ देशों में ऐसा कौन सा दूसरा देश है, जिसने आधुनिक काल में अपनी जमीन पर दूसरे देश का कब्जा बनने दिया? केवल अकेला भारत देश। पाकिस्तान और भारत दोनों ने भारत के बड़े भूभाग पर कब्जा बना रखा है। सोचें, हिंदू दिमाग में यह सत्य किस तरह है? मोटा-मोटी मान रखा है कि जो हो गया सो हो गया। उस गंवाई जमीन को भूलो। नतीजतन वापिस चीन नए कब्जे बना रहा है, दादागिरी बनाए हुए है लेकिन हिंदू लीडरशीप बला टालने के मोड में है। जबकि भारत एटमी हथियारों से लैस है। लेकिन न हम दुश्मन को डरा सकने में समर्थ और न एटमी बल पर पैदल सेना को आजाद कश्मीर या तिब्बत की और मार्च कराने की हिम्मत संभव। हिंदू की मनोदशा में भारतीय भूभाग से पाकिस्तान या चीन का कब्जा हटवाने का, इसके लिए लड़ने का आइडिया बनेगा ही नहीं। जाहिर है 1947 से हम लगातार वक्त की गंगा में सहज प्रवाह में महज बहते हुए हैं। वक्त की चुनौतियों में वक्त को अपने जायज हक में भी दुरूस्त नहीं कर सकते।

इसलिए कि बुद्धि बार-बार मध्यमार्ग को पकड़ेगी। भेड़िया आया का शोर होगा लेकिन अचानक बस में बैठ लाहौर पहुंचेंगे। नवाज शरीफ के यहां पकौड़े खाने जाएंगे। चीन के साथ भाई-भाई करते हुए झूला झूलेंगे। भारत का प्रधानमंत्री कोई भी हो वह हिंदुओं को बहलाने की निरूद्देश्य कूटनीति करता है। एटम बम बनाता है और भेड़िया आया का शोर बनवाता है मगर देश की जमीन गंवाते और घायल बनवाते हुए। तभी जीत कर भी हम हारते हैं। दरअसल ऊपर से नीचे तक, भारत के प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक सब भय और भयाकुलता में जीते हुए हैं, भेड़िया आया के राग के आदी हैं तो और कुछ हो भी नहीं सकता। ले-देकर भयाकुल-मध्यमार्गी देश कभी संयुक्त राष्ट्र के आगे, कभी रूस, कभी अमेरिका के आगे स्यापा करेगा या उन्हें पंच बनाएगा। क्या यह सब, 75 वर्षों के भारत अनुभव का स्वभावगत खुलासा नहीं है?  

दरअसल बुद्धि यह बूझने में असमर्थ है कि मनुष्य (देश) स्वतंत्रता का असली अर्थ भयरहित और आत्मनिर्भर जीना है। यदि हम चीन के सत्य को झुठलाते हुए हैं, उसकी आर्थिक पराधीनता को फील नहीं करते हुए हैं तो ऐसा बुद्धि की असमर्थता व इस दुविधा के चलते है कि करें तो क्या करें? हम कर क्या सकते हैं? ऐसा आचरण सदियों के भयाकुल ट्रॉमा की लाचारगी से है। बुद्धि-दिमाग में बनी विकलांगता से है। वह विकलंगता, जो हम हिंदुओं के सनातन मूल्यों, उपलब्धियों, सत्य विचारों-मान्यताओं, सनातन धर्म-आस्था के कीर्तिस्तभों पर सत्ता के बार-बार हमलों से निर्मित है। विलेन है सत्ता। तलवार का भय। उसी के चलते न साहस, न मुक्ति और न इलाज है। निर्विवाद सत्य है कि बादशाहों के वक्त से हाकिम-कोतवाल व्यवस्था चली आ रही है। उसी की सिक्वेंस में अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाए रखने का आधुनिक सत्तामॉडल बनाया। वहीं फिर आजाद भारत में माई-बाप सरकार में परिवर्तित लोकतंत्र है। उसी पर आश्रित हिंदू जीवन है तो सत्ताका यह सिस्टम भला कैसे पिंजरे के मानसिक विकारों का इलाज निकाल लोगों (देश) की स्वतंत्र, साहसी, आत्मनिर्भर उड़ान बनवा सकता है? पिंजरे में भला हिम्मती, निर्भयी संस्कारों के डीएनए इंजेक्ट करने वाले इंजेक्शन कैसे बनेंगे?

यही गंभीर पेंच है। भयाकुल, असुरक्षित जीवन न अपने बूते अपनी बुद्धि को जगा सकता है, न निर्भीकता पा सकता है और न अपने को बना सकता है। वह चिंता में ही रहेगा। वह जुगाड़ों में खोया रहेगा। सुरक्षा  याकि पॉवर-सत्ता की भूख में हाथ-पांव मारेगा। ईश्वर की भक्ति करेगा या भाग्य का रोना रोते हुए वक्त बदलने के इंतजार में टाइम पास करेगा। ख्याली पुलाव बनाएगा कि हमारे भी अच्छेदिन आएंगे। यदि किसी प्रधानमंत्री, नेता ने कहा कि मैं अच्छे दिन लिवा लाऊंगा तो हिंदू उसके दिवाने बनेंगे। उसकी भक्ति करेंगे। उसे अवतार मानेंगे। कुल मिलाकर कोई ला दे अच्छे दिन, कोई बनवा दे सुरक्षा, कोई दिला दे राशन-पानी, कोई दिलवा दे नौकरी और धर्मादे में छोटी-छोटी चीजें पा जाए तो वह हिंदू मनोदशा में जीवन धन्य। प्रभु की कृपा। मालिक-हुकुम की कृपा।

हिंदू के लिए राजा कोई हो (कोउ नृप हो हमें का हानी), उसके आगे वह सहजता से समर्पित। दरबार-सरकार कोई हो, वह मंत्रियों-कारिंदों-कोतवालों को नजराना, शुक्राना, जबराना दे कर काम करवाते हुए वक्त गुजार लेगा। सदियों से चला आ रहा यह आचरण उसकी जीवन पद्धति का सरल शिष्टाचार है। यह 75वें अमृत वर्ष की भी रियलिटी है और सेंचुरी वर्ष में भी होगी। क्यों? हम चले आ रहे आचरण-स्वभाव में बंधे रहने हैं। आखिर बंधुआ मनोदशा में नए ढंग से सोचने, नई उम्मीद करने, उसके लिए लड़ने, आंख दिखाने की हिम्मत कैसे बन सकती है? मालिकों के साये में, उनके संग का बंधुआ इतना भर सोच सकता है, उसकी यह अकुलाहट बन सकती है कि काश! मैं राजा का खास होता। मुझे राजा नौकरी पर रख ले। या यह भूख कि काश! मैं सरकार में होता। काश! मेरा परिवार, कुनबा और मेरी जाति सत्ता में होती। मैं अकबर बादशाह का मनसबदार बन जाऊं। तभी आम हिंदू आजादी के बाद जबरदस्त भूख के साथ सत्ता का हिस्सा बनने, सत्ता में आरक्षण पाने, सरकारी नौकरी पाने याकि हाथ में पॉवर की लाठी लेने की लगातार हर संभव कोशिश करते हुए है। ताकि वह भी दूसरों को डराने, हुकुम चलाने का पॉवर पा कर सत्ता सुख भोगे। 

सत्ता की भूख वह एक वजह है, जिसके चलते पराधीनता की सुनामी में भी हिंदू राजे-रजावाड़ों, जमींदारों, जातियों की भूख ने समाज, धर्म और जीवन में बिखराव बनाया। भयाकुलता बनवाई। वैसा ही मामला इक्कीसवीं सदी के भारत अनुभव में भी है। चौतरफा सत्ता के विषका चुंबकीय आकर्षण सत्ता की भूख बनवता हुआ है। सबको चाहिए रूतबा। हर कोई इस जुगाड़ में है कि किसी तरह वह चाकरी, वह आश्रय, लाठी-सुरक्षा मिले, जिससे घर-परिवार-कुनबा-जाति पॉवर इन्जॉय करें। नौकरी करो, अफसर बनो। कलियुगी हिंदू चरित्र में दरबारीपना, मनसबदारी, नौकरी, चाकरी के रूतबे, सेवादारी, बैकऑफिस जैसी नौकरियों से जीवन की धन्यता का जो भाव है वह दरअसल बंधुआगिरी का आधुनिक संस्करण है। सबका नंबर एक लक्ष्य सत्ता में नौकरी-चाकरी-सेवादारी पाने का मकसद बंधुआ मनोदशा से है। भूल जाएं कि कभी हम हिंदू अपने सतयुग में मानते थे कि उत्तम खेती, मध्यम व्यापार। अब तो चाकरी ही परम सिद्धि है।

इसमें भी बीज है भय। सदियों की गुलामी से बनी असुरक्षा और भूख ने हमारे कई विकार बनाएं हैं। एक विकार भक्ति मार्ग से पलायान का है। सदियों हारते-हारते हिंदुओं में नियति की धारणा बनी और जीवन को भाग्य व भगवान के भरोसे छोड़ा। अकबर के दरबार में मनसबदार, जमींदार, दरबारी, हाकिम, कोतवाल, सिपाही बन गए तो भाग्य की बड़ी मेहरबानी और नहीं बने तो सब कुछ निर्गुण, निस्सार, बेमतलब। हम हिंदू इहलोक की हकीकत से पलायन कर परलोक की चिंता करने लगे। अपना सर्वस्व भक्ति (मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तेरा) को समर्पित। और बंधुआई दुर्दिन की रिएलिटी में छटपटाहट है तो यह सोच कर उसे छोड़ो कि सब माया (कबीर माया डाकनी, सब काहुको को खाए)। यदि चिंता-तकलीफ ज्यादा ही बढ़ गई तो फिर यह फलसफा कि जो है वह भाग्य के कारण। मतलब हम सब की किस्मत (जन्मपत्री-भाग्य-अंकोरे) में विधाता ने जो लिखा है वह राई-तिल भर मिट नहीं सकता (सैना संपत्ति विपत्ति को, जो धिक्के सो कूर। राई घटे न तिल बढ़े, विधि लिख्यो अंकूर॥)।

उफ! सोचें, हम हिंदुओं ने कैसे-कैसे फलसफे बना कर दासता का वक्त काटा! हम कैसे जीये हैं! कितनी तरह के भय, भूख व याचनाओं, प्रार्थनाओं के साथ जीवन को निर्गुणी बना दिया गया! तभी मनोदशा में भय और असुरक्षा, भूख-भक्ति-भाग्य के डीएनए बहुत हौले-हौले और गहरे पके हैं।

इसका अर्थ है अपनी मुर्दनगी स्वनिर्मित भी। तथ्य है हिंदू जीवन ने रूस और चीन के लोगों के अनुभव जैसे निरंकुश, अनुशासित जीवन के कोड़े कम खाए। भारत जारशाही-माओशाही-स्टालिनशाही जैसे शासन अनुभव लिए हुए नहीं रहा। तब हम इतने समर्पणवादी और भयाकुल कैसे? दरअसल हम हिंदुओं ने खुद अपने फलसफों में ऐसा चक्रव्यूह बनाया कि भय, असुरक्षा, भूख, भक्ति, भाग्य व अकर्मण्यता, अचेतनता के घेरे-दर-घेरे में हम जकड़ते गए। गोरी-गजनी, नादिरशाह की तलवार के आंतक का सत्य अपनी जगह है लेकिन मोटे तौर पर हिंदुओं की गुलामी के इतिहास में तुर्क, खिलजी, तुगलक, लोदी से ले कर मुगलों और अंग्रेजों की व्यवस्था में लोगों पर चाबुक चलाती तानाशाही नहीं थी। भारत के विशाल क्षेत्रफल और आबादी से संभव भी नहीं था। विदेशियों ने मोटा-मोटी आबादी को भयाकुल बनाकर शासन की शैली विकसित की। इसी में खैबर के दर्रे से हजार घुड़सवार आ कर दिल्ली का तख्त कब्जाते थे और हिंदुओं की भयाकुलता से ठसके में राज करते। अंग्रेजों ने कोई दौ सौ साल राज किया तो वह राज सिर्फ 11  से 22 हजार अंग्रेज सिपाहियों की ताकत से था। सोचें, इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी आबादी और इतनी कम अंग्रेज फोर्स के बावजूद मजे से अंग्रेजों का शासन हुआ तो वजह हिंदू मनोदशा का क्या अपना चक्रव्यूह नहीं था? क्या दीन-हीन, समर्पणवादी-भक्तिवादी सहज-नेचुरल प्रवृत्तियां जिम्मेवार नहीं?

देश के वर्तमान मुकाम पर सोचें। 140 करोड़ लोग क्या दो-चार चंद सत्तावानों से भयाकुल नहीं हैं? लोगों की आम धारणाओं में कितनी तरह के भय बने हुए हैं?

जाहिर है हिंदुओ की अपनी ही करनियों में भय का वह स्वभाव, वे संस्कार घर-परिवारों में जड़ जमा बैठे हैं, जिससे अपने आप पर विश्वास नहीं रहा। घर परिवार, समाज, धर्म सबमें सब डरते और डराते रहे। बच्चों को भी डरा-डरा कर बड़ा किया। ईश्वर के आगे याचक बन जीवन गुजारने के जीवन संस्कार दिए। प्रार्थना पहले मेहनत बाद में। तभी हमारी भक्ति भौतिकजरूरतों से भरी पड़ी है। हम हिंदू ईश्वर से प्रार्थना स्वार्थ और कामनाओं में करते हैं। मतलब हे भगवान मुझे फलां-फलां दो। मुझे बचाओ। मेरी रक्षा करो! यह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण समझना चाहिए कि खुदा से इबादत में मुसलमान क्या मांगता है? वह अल्लाह की महानता का गान करता है, उसकी महानता के प्रसार का संकल्प लेता है या हम हिंदुओं की तरह वह ईश्वर के आगे याचक होता है, उससे मांगता हुआ होता है? ऐसे ही ईसाई लोग प्रभु यशु की पूजा करते हुए क्या धारे हुए होते हैं? वे याचक होते हैं या वह अपने होने की कृतज्ञता के लिए ईश्वर का धन्यवाद, आमीन करते हुए होते हैं?

लगता है मुसलमान, ईसाई, यहूदी बनाम हिंदू की ईश्वर से प्रार्थना का फर्क भी इतिहास के अनुभव में बनी अलग-अलग मनोवृत्तियों का फर्क है। भय और असुरक्षा में आम हिंदू यदि भक्ति से अपने आपको समर्पित करता है तो वह ईश्वर से याचना के साथ होती है। आम हिंदू अपना जीवन या तो माई-बाप सत्ता पर आश्रित समझता है या ईश्वर के भरोसे। सत्ता और ईश्वर एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। राजा यदि भगवान विष्णु के अवतार है और जब-जब संकट तब-तब ईश्वर के अवतार की मान्यता की गांठ बांधे हुए है तो हिंदू के लिए हर प्रधानमंत्री उसका भगवान और हमारे सगुण और निर्गुण प्रारब्ध में बतौर मनुष्य स्वत्व-पुरुषार्थ का बूता किसी भी तरह से नहीं! तभी कलियुग सचमुच हिंदू का स्वनिर्मित है! यह हमारे कर्महीन होने से है। इसलिए नोट रखें हमारा सतयुग तब था जब हम कर्मवादी थे। तब कर्म, उपलब्धि, पुरुषार्थ-साहस-निडरता के यज्ञ में हम ईश्वर को आह्वान करते थे। वह आह्वान याचकता लिए नहीं होता था, बल्कि धन्यवाद हुआ करता था।

वर्तमान का हिंदू कलियुग उस अंधकार से है, जिसमें सब कुछ भक्ति, भाग्य और माई-बाप सरकार के भरोसे है! तभी हिंदू के होने, निज अस्तित्व के पुरुषार्थ, उसकी स्वतंत्र-निर्भयी उड़ान का मतलब ही नहीं। इसकी गुंजाइश ही नहीं। वह जब अपने आराध्य 32 करोड़ देवी-देवताओं की आस्थाओं से जीवन की धड़कन बनाए हुए है। अपना सर्वस्व व्यवस्था के कायदे-कानूनों के आगे समर्पित है और खैरात के राशन-पानी का बंधुआ जीवन उसको अहोभाग्य है तो अंधकार में, कलियुग में तो लगातार जीना है।

इसलिए सभ्यता-संस्कृतियों के वैश्विक अनुभवों में हिंदुओं के कलियुगी स्वभाव पर जितना सोचा जाए वह कम है। कलियुगी चरित्र वक्त को फेल करता हुआ है। वह स्वतंत्रता को बुझाता हुआ है। जब वह स्वतंत्र घोषित हुआ तब भी वह माई-बाप सरकार का पिंजरा बना बैठा। लोग आजादी के पीछे नहीं, बल्कि सत्ता के पीछे भागे। स्वतंत्रता की भूख नहीं, बल्कि सत्ता-पॉवर की भूख बनी। वह बेमौत मरते हुए भी भाग्य को कोसता है। नियति का रोना रो फटाक आंसू सूखा लेता है। अवतार के भरोसे सतत बरबाद होता हुआ है मगर मनुष्यगत यह चिंगारी तनिक, कभी नहीं कि पिंजरों से बाहर निकल उड़ो स्वतंत्रता से संभावनाओं के अनंत आकाश में! (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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