बुद्धि नहीं सुधारेंगे तो नहीं बनेंगे!

मैं भारत और हिंदू पर विचारते हुए थका हूं! पर थकावट क्योंकि हर रोज देश-दुनिया की घटनाओं पर गौर करते हुए दिमाग की भन्नाहट में बदलती है तो सोचना-लिखना भला कैसे बंद हो! क्या आप भी यह जान कर विचलित नहीं होते कि वायरस को 21 दिन में जीतने, उस पर काबू के नैरेटिव को सुनते-सुनते हम संक्रमण में दुनिया के नंबर तीन है। बीस हजार से अधिक मौतें हैं लेकिन देश में संवेदनहीनता ऐसी जो लोग कहते मिलेंगे कि बीस हजार ही तो मरे! क्या ऐसे सोचना किसी और सभ्य देश में है? ऐसे ही क्या यह हकीकत दहलाने वाली नहीं कि भारत के अस्सी करोड़ लोग नवंबर तक प्रतिमाह पांच किलो गेहू, एक किलो चने से पेट भरेंगे! लोगों का जीना ऐसे होगा! भला दुनिया के किस सभ्य देश में ऐसी नौबत आई? किस सभ्य देश में लाखों परिवार भयाकुल हो पैदल घरों की और निकले? कहां लाखों-करोड़ों लोगों की वैसी आवाजाही हुई जैसी भारत में हुई है!

भारत के इस रूटिन, रोजमर्रा की खबरों से क्या बुद्धि को विचलित नहीं होना चाहिए? सो, अपना कौतुक है, रहेगा कि हम हैं क्या? भारत, भारत के हिंदू का वह क्या रसायन, क्या डीएनए, क्या बुद्धि, वृत्ति और प्रवृत्ति है, जो हस्ती मिटती नहीं तो बनती भी नहीं! अपना मानना था, है और रहेगा व इसे नोट रखें कि जब तक भारत के हिंदू का, उसके जिंस का, उसके इतिहास का असली पोस्टमार्टम नहीं होगा, उसके डीएनए-उसकी प्रवृत्तियों को जानेंगे नहीं और फिर उस सत्य से बुद्धि को सुधारेंगे नहीं तो न भारत बनेगा और न हिंदू बनेगा। हिंदू वहीं रहेगा जो मध्यकाल में था, जो नेहरू के वक्त में था और जो नरेंद्र मोदी के वक्त में है।

बुद्धी फूटी होने की इकलौती वजह हम हिंदुओं की नादान राज्येंद्रियां, राजनीतिक निर्गुणता, अधिकारहीनता, चेतनहीनता का तमस है। तमस से सत्यता के साथ सोच नहीं पाते कि वक्त की चुनौती का कैसे सामना हो? नहीं समझते कि पुरानी सुक्तियों, मंत्रों, जुमलों से निदान नहीं है, बल्कि गहन-गंभीर-समग्र विचार करना होगा। नया-मौलिक राजनीतिक दर्शन बनाना होगा। फलां-फलां खतरा है या वक्त गुलामी-बरबादी का है तो बुद्धि, पुरुषार्थ में खड़ग उठाना होगा न कि इस सूक्ति से इतिश्री होगी कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। मतलब निराशा-अंधकार का घटाटोप है तो कोई बात नहीं हमारे भगवानजी नया रूप धारण करके अवतरित होंगे और भारत की रक्षा करेंगे। ऐसे सोचना ही तामसीपना है। गुलामी से हुई कुंद बुद्धि का प्रमाण है और देख-समझ नहीं पाना है कि क्या अच्छा है क्या बुरा है और क्या यथार्थ है।

सचमुच हम सतगुणी नहीं हैं। निडरता-निर्भीकता से ज्ञान प्राप्त करके ज्ञान-सत्य को साहस से जी नहीं सकते। पूरी सहस्राब्दि क्योंकि हिंदू अपने आपको (बतौर व्यक्ति, समाज, धर्म के) बचाने की चिंता में रहा तो वह स्वकेंद्रित है। स्वार्थी है। अंधकार-अज्ञान- हुकूमशाही को बरदाश्त करने को मजबूर है। वह राजा, हाकिम के आगे न सच बोल सकता है और न उससे सच बुलवा सकता है। तभी लोकतंत्र वह छलावा बना है, जिसमें तंत्र पहले है लोक बाद में!

बतौर कौम, बतौर राष्ट्र के हमें सात्विक-राजसी गुणों के मिक्स से इच्छा और कार्यसिद्धि में जीना चाहिए। पर जीएं तब जब जुनून, जज्बा बना हो।  जब मिजाज में जिंदादिली हो। यह तब संभव है जब इंसान की आबोहवा में ताली-थाली-कथा जैसे अंधविश्वास और अज्ञान का कार्बनडाईआक्साइड नहीं हो। पर हम इसी से विश्व गुरू अपने को मानते हैं। तभी अपनी बुद्धि को तामसी वायरस का संकट सभ्यतागत संकट है!

भारत और हिंदू का बनना याकि किसी भी इंसान व देश का बनना-बिगड़ना सचमुच बुद्धि की वृत्ति से होता है। एक बुद्धि सत्य बूझते हुए सत्य में जीने के सात्विक गुण लिए होती है। दूसरी राजसी बुद्धि के लक्षण में अहंकार, अहमन्यता, भूख और बहेलियापन दिखेगा। तीसरी फिर तामसी बुद्धि है, जिसमें झूठ, उचित व अनुचित में फर्क नहीं कर पाने व आलस्य, जुगाड़ में जीने का स्वभाव बना होता है।

बुद्धि की तीन प्रवृत्तियों में भारत किसमें रमा हुआ कहै? सवाल पर आज के चश्मे में देखें या इतिहास के चश्मे से तो लगेगा हिंदू का ज्यादा वक्त तामसी वृत्ति के अनुभव-इतिहास में कटा है। क्या उचित है, क्या अनुचित है, क्या सत्य है क्या झूठ है, कौन रावण है और कौन राम, इसकी बोधकथाएं पढ़ कर भी हम हिंदू उसे जीवन व्यवहार में नहीं उतारते। हमारी बुद्धि सत्य नहीं तलाशती। सत्य विचार नही सकते। क्यों? इसलिए कि इसके लिए जो निर्भीकता, निडरता चाहिए वह नहीं है। आखिर कौम का पूरा जीवन गुलामी की बुद्धि में पका है। हम क्यों तब दीन-हीन-गरीब थे और आज भी हैं तो  इस पर निडरता से बुद्धि का विचार सकना तामसी बुद्धि में संभव नहीं है। जिन्होने विचारा वे अकेले, जुगून की तरह अंधकार में टिमटिमाए, लेकिन जनमानस, सत्तामानस ने उनसे समझने, अंधकार मिटाने की नहीं सोची। भारत में निज मनन से जो भी बौद्धिक प्रयास हुआ वह कौम का उजियारा नहीं बना बल्कि नेकी कर भांग के कुँए में डालने माफिक था।

इतिहास से वर्तमान है तो दुनिया के नजरिए में मोटे तौर पर भारत, भारत के हिंदू आज भी वहीं हैं जो कल थे। लेकिन इसका हमें अहसास नहीं होता। यह नहीं बूझते कि भीड़ और संख्या से भले हम अपने आपको महाशक्ति समझें लेकिन दुश्मन ऐसा नहीं मानता। वह हमें छकाता रहेगा और हम दूसरों पर आश्रित रह कर जीवन जीने को शापित हैं। ईमानदारी से विचार करें क्या 1962 में चीन के हमले में हमने पश्चिम से उम्मीद नहीं बनाई थी और आज फिर चीन के आगे पश्चिम से, अमेरिका से उम्मीद में क्या हम नहीं हैं?

फिलहाल भारत के सामने चार चुनौतियां हैं। एक महामारी की, दूसरी भूख-दिवालिया आर्थिकी की, तीसरी चीन से सुरक्षा की और उस पर से निर्भरता खत्म करने की। चौथा मसला हिंदू-मुस्लिम का।

ये चार मामले। मानों हिंदुओं की स्थायी समस्या। इन पर सामूहिक चेतना में भारत की सरकार, भारत के हिंदुओं के आचार-विचार पर गौर करें तो क्या निकलेगा? क्या यह साबित नहीं होगा कि हर मामले में या तो राम भरोसे हैं या दूसरों पर निर्भर हैं। हमारी बुद्धि को यह नहीं कौंधा कि महामारी सामान्य बीमारी नहीं है। इसका टोटकों, झूठ से नहीं, बल्कि टेस्ट, ट्रेस व रिस्पांस से सामना करना होगा। वैज्ञानिकता, रिसर्च, अनुसंधान, मेडिकल सत्य और वैक्सीन से इलाज निकलेगा। ऐसे ही आर्थिकी जिस कारण से बरबाद है, वह यदि राजा की नोटबंदी और तंत्र की भ्रष्टाचार-लूट प्रवृत्ति से पैंदे में है तो मूल कारणों के रहते कैसे आत्मनिर्भर बन सकते हैं? ऐसे ही चीन को हमने सांप नहीं माना और बीन बजा कर उसे साधने की गलती की है और अब जब वह डस रहा है तो उससे धंधा बंद करके दूध पिलाना बंद करना चाहिए या नहीं? लेकिन होगा क्या, आगे भी हम उसकी लल्लोचप्पो करेंगे, उसे दूध पिलाएंगे और उसका बाजार बने रहेंगे।

ये छोटी-बेसिक बातें हैं लेकिन इनमें जैसा व्यवहार है, वह हिंदुओं की गुलाम वृत्ति में बनी तामसी बुद्धि का स्थायी व्यवहार है। तय मानें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके तमाम सलाहकार, प्रधानमंत्री दफ्तर इधर-उधर की बातों से चीन के सांप को वैसे ही पाले रखेंगे जैसे वुहान स्पिरिट की बीन बजा कर पाले रहे थे। इसलिए क्योंकि मिजाज की मजबूरी है व व्यवहार जुगाड़ का है तो बस जैसे भी हो बला टले! यहीं सेकुलर भारत की कर्म गति थी तो हिंदू राष्ट्र की कर्म गति है और औसत हिंदू का सदा-हजार साला नागरिक व्यवहार भी है।

इंसान के डीएनए से देश का डीएनए गुंथा होता है। डीएनए के सत्व-तत्व को प्रभावित करती जैविक-भौगोलिक परिस्थितियों का मामला अलग है तो उसके सात्विकी, राजसी, तामसी प्रवृत्तियों व संस्कारों का मसला वह है, जिनसे क्षेत्र विशेष की कौम, नस्ल, धर्म, देश और सभ्यता अपनी अलग-अलग पहचान पाती है। जिसके जैसे कर्म उसके वैसे परिणाम। जिसकी जैसी बुद्धि उसके वैसे नतीजे।

यहां निर्णायक बिंदु है बुद्धि। धर्म और इतिहास के अनुभव ने दक्षिण एशिया में हिंदुओं की जो बुद्धि बनाई है उसी में भारत के 138 करोड़ लोगों का जीवन कैद है। हिंदू की बुद्धि खोटी है, वह तामसी है और जब तक उसे ठीक नहीं किया जाएगा तब तक न भारत बनेगा और न हिंदू। हिंदू किसी भी सूरत में विश्व की सिरमौर सभ्यता, विश्व गुरू नहीं हो सकता और न ही वह इस्लाम, चीन जैसी चुनौतियों के आगे विजयी हो सकता है।

इस दो टूक निष्कर्ष को स्थायी तौर पर नोट करके रखें कि कोई राष्ट्र तभी बनता है जब वह सात्विक-राजसी बुद्धि का मिक्स लिए हुए हो। बुद्धि सत्य का और महत्वकांक्षा का मौलिक-स्वतंत्र जुनून बनाए हुए हो। जैसे आज अमेरिका-पश्चिमी सभ्यता है। इनसे अलग चीन अहंकार, महत्वकांक्षा की राजसी बुद्धि लिए हुए हैं, जिसमें आक्रामकता, महत्वाकांक्षा, गुस्सा, अहमन्यता है लेकिन मौलिकता, सत्यता-सात्विकता नहीं। इसलिए चीन या इस्लाम का मसला अलग बुद्धि (मूलतः राजसी वृत्ति) का है।

मैं भटक गया हूं। अपनी बात पर लौटें तो आज का आधुनिक हिंदू, भारत राष्ट्र-राज्य इस गलतफहमी में हैं कि हम हिंदू बहुत पढ़े-लिखे हो गए हैं। बहुत साक्षर हो गए हैं। शिक्षा सर्व जन में व्याप्त है। हकीकत में उलटा है। हम आजादी से पहले ज्यादा बेहतर थे। अब निरक्षर हैं। हमारी प्राप्ति-उपलब्धि सिर्फ अक्षर ज्ञान बनवाने की है। रट्टा मार पढ़ाई है। पढ़ाई हमारा सिर्फ एक जुगाड़ है, जिसमें कुंजियों और कोचिंग की या तो शॉर्टकट पढ़ाई है या प्रोफेशन विशेष के रोबो बन कमाई करना उद्देश्य है। इस पढ़ाई में न मौलिकता है, न मनन है और न ध्यान-तपस्या के साथ अनुसंधान याकि सत्य की खोज है। 73 सालों की आजादी में भारत ने लोगों की शिक्षा का जुगाड़ तो बनवा दिया लेकिन तामसी बुद्धि के इस विस्तार-फैलाव के साथ कि व्यक्ति, कौम, राष्ट्र सभी भेद नहीं कर सकते हैं कि क्या उचित है और क्या अनुचित? क्या सत्य है और क्या झूठ? हमारा सत्य-निर्भीक व्यवहार संभव ही नहीं है। आजाद भारत ने सत्यवादी नागरिक नहीं बनाए, सत्यवादी अफसर, उद्यमी नहीं बनाए जो बना है वह कुंजी, कोचिंग, क्रोनीवाद, तामसी वृत्ति का वह जुगाड़ और वह छीनझपटी है, जिससे भले खरबपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, डॉक्टर-इंजीनियर और अफसर बने हो लेकिन वैश्विक पैमाने पर जब मुकाबले का वक्त आता है तो सबकी औकात लल्लोचप्पो की, कंपीटिशन से भागने की और विदेशी प्रोजेक्ट लीडर के महज आईटी कुली बने हुए होने की प्रकट होती है।

क्या नहीं? क्या मैं गलत हूं? तब अपने खाते कितने नोबल पुरस्कार है, कितने ओलंपिक मेडल हैं, कितनी वैश्विक कंपनियां हैं, कितने बिल गेट्स, जुकरबर्ग हैं, कितने सृजक-साहित्यकार-संगीतकार-डायरेक्टर हैं, जिनका ब्रांड हॉलीवुड़ से लेकर लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में डुगडुगी बनाए हुए है।

कुछ नहीं। जीरो!

और सबसे बड़ा सत्य! क्या तब 73 साल बाद भारत के 80 करोड़ लोग 2020-21 के साल में पांच किलों गेहूं-एक किलो चने के फांके मार रहे होते? क्या भारत ताली-थाली-दीये से वायरस को भगा रहा होता? क्या चीन की बला टालने के लिए उसकी मिन्नत करनी पड़ रही होती? क्या हिंदू सत्तावान ही हिंदू-मुस्लिम पर चुनाव को गृहयुद्ध में बदल रहे होते?

इसलिए जो है वह तामसी-गुलाम बुद्धि का परिणाम है। इसके बाहर निकलने की निर्भीकता, निडरता, साहस जब तक हिंदू नहीं पाएगा तब तक वह अंधकार-अंधविश्वास-झूठ-गुलामी से बाहर नहीं निकलेगा और वहीं होना है जो 73 वर्षों से चला आ रहा है! मामला नेतृत्व का नहीं है, बल्कि हिंदुओं की सामूहिक बुद्धि का है।

इससे ज्यादा क्या लिखा जाए। सो, बुद्धि पर विचार यहीं समाप्त।

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