सात्विक से तामसी बुद्धि का सफर - Naya India
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सात्विक से तामसी बुद्धि का सफर

लाख टके का सवाल है हम हिंदुओं की बुद्धि क्या पहले भी वैसी थी जैसी आज है? नहीं। वैदिक काल हिंदूबुद्धि का सात्विक-स्वर्णिम युग था। हिंदुओं को धर्म मिला। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के उद्देश्य में जीवन जीने के लिए कहा गया। पर कैसे? क्या निज स्वतंत्रता मेंया राजा और राज की व्यवस्था से याभाग्य के भरोसे? यह सवाल गहरा है, गंभीर है तो भटकाने वाला भी। पहली बात, हिंदुओं का धर्म में जीना प्रारंभ में खेतिहर-ग्राम्य परिवेश में था। संहिता लिखी जाने के बावजूद जीवन जीने की धर्माज्ञा-राजाज्ञा में हिंदू मजबूर नहीं था। सामाजिक सांचा बना था। बावजूद इसके धर्म, जीवन जीने की पद्धति में स्वतंत्रता थी। सौ फूल खिलने की आबोहवा थी, वैसे खिलने का व्यक्ति में साहस था, चिंतन-दर्शन की परंपरा थी। तभी ऋषि-दर्शन परंपरा में चार्वाक से लेकर जैन, बौद्ध मत की धाराएं निकलीं। आस्तिक-नास्तिक शास्त्रार्थ था तो राजा के ईश्वरीय अवतार घोषित होते हुए भी उसकी पताका स्थायी नहीं थी। पाणिनी और आर्यभट्ट तब हुए तो नाट्यशास्त्र से ले कर अभिज्ञानशाकुन्तलम् जैसी रचनाएं लिखी गईं।

जाहिर है बुद्धि तब धर्म, राजा व राज्य से बंधी हुई नहीं थी। वह स्वतंत्रचेता, निडर, निर्भीक, तपस्वी, सात्विक गुणो से भरपूर थी। उसके बाद बौद्ध काल में राज्याज्ञा में धर्म के बंधने, राज्य द्वारा धर्म के प्रचार-प्रसार का जब सिलसिला शुरू हुआ तब गड़बड़ शुरू हुई। हिंदू परंपरा में ध्यान, साधना, सत्य की आजाद खोज पर बुद्धम शरणम गच्छामि का असर हुआ। चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार वर्ण कुल मिलाकर व्यक्ति विशेष, परिवार विशेष या समाज विशेष का जो मामलाथा वह राज्य का मामला बनने लगा। लेकिन कुल मिलाकर वह अराजक वक्त था। तभी हिंदू के सफर, उसके उद्देश्य में कहीं सामाजिक जबरदस्ती बनी, तो कहीं धिक्क्कार मिला तो कहीं भाग्य भरोसे और कही राजा के रोल ने दम पाया।

मसला दिमाग खपा देने वाला है। बुद्ध के बाद मौर्य साम्राज्य के वैभव व अशोक महान के बुद्धम शरणम् होने व वापिस गुप्त काल के हिंदू वैभव और फिर अचानक दो-तीन सौ साल के अंधकार ने ऐसा भटकाव बनाया कि इस्लाम आया तो उसके आगे हिंदू बुद्धि पूरी तरह लापरवाह व ठस्स। समझ ही नहीं पाए कि अब क्या हो। हिंदू बुद्धि जड़ व तामसी हो गई। सहस्त्राब्दियों के सफरको कुछ शब्दों कीसहज बढ़ईगिरी में बूझना या लिख सकना नामुमकिन सा है। बावजूद इसके मोटे तौर पर समझा जाए कि सभ्यताओं का विकास आदि मानव से मानव के ट्रांजिशनल काल बाद व्यक्ति और स्टेट (राजा, सत्ता) की दो पटरियों का साझा चिरंतन सफर है। लेकिन हम हिंदुओं के साथ कुछ ऐसा हुआ है कि हिंदू का सफर अराजक रहा है। वह ज्यादातर समय एक पटरी पर चला है। व्यक्ति का धर्मानुगत सफर समाज की पटरी पर ज्यादा हुआ और वह राज-राजा-तलवार के आश्रय को तड़पता रहा!

तभी हिंदू की राज्येंद्रियां सर्वाधिक कमजोर, अतार्किक रहीं। तामसी बुद्धि में ढलीं। इसे इस तरह समझें कि दुनिया में दूसरी कोई कौम नहीं है, जिसमें कभी यह जनधारणा बनी हो कि राजा कोई हो क्या फर्क पड़ता है। कोऊ नृप हो हमें का हानी। या फिर ठीक विपरीत यह जनधारणा कि राजा तो भगवान विष्णु के अवतार हैं। जैसे वो रखेंगे वैसे रहेंगे।तभी निष्कर्षहै कि हिंदू बिखरा, असंगठित सफर का मारा है। भारत में राजा और प्रजा का टिकाऊ साझा संकल्प बिरला ही कभी बना हो। धर्म के साथ बल का, सत्य के साथ ताकत का जो महाप्रताप बनना चाहिए वह नहीं बना। धर्म में राजा था, राजा के हाथ में धर्म पताका थी, लेकिन फिर भी रक्षक और संवर्धक नहीं।

सोच सकते हैं अपने धर्म, अपने चाणक्य की चूक थी, जो धर्म की पताका को विश्व में फैलाने का सूत्र नहीं दिया। हमने एलेक्जेंडर को विश्व विजय के मिशन में निकला देखा, भारत आया देखा लेकिन चंद्रगुप्त को बोध नहीं हुआ, सोच नहीं मिली कि तुम्हें भी ग्रीस जा कर भगवा झंडा फहराना है। विदेशियों को हमला करते देखा, विधर्मियों को धर्म की तलवार लिए आते देखा लेकिन हममें यह चाहना नहीं बनी कि हम भी कभी विश्व विजय पर निकलें!

तभी हिंदुओं में धर्मानुगत जीवन का अलग मसला है तो राजा का मामला अलग। तय कर सकना मुश्किल है कि हिंदू को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ के आदेश पहले मिले या पहले उसे राजा प्राप्त हुआ? पहले क्या तय हुआ? वेद और आदि ग्रंथों पर गौर करें तो धर्म याकि जीवन जीने के आइडिया, उसके उद्देश्य, पुरुषार्थ पहले बने और राज्य व राजा की व्यवस्था बाद में। लेकिन पुराण कथाएं पढ़ेंगे तो लगेगा कि हमारे ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने जम्बूद्वीप बनाते ही मनु महाराज को पहला राजा बनाया।सर्वप्रथम राजा मनु फिर इंद्र, वरूण, यम से लेकर राजा राम, कौरव-पांडव आदि के पुराण, रामायण, महाभारत सबसेलगातार हिंदुओं को बताया गया कि राजा सर्वोपरि। मतलब वे हैं विष्णु के अवतार।

यदि पहले दिन से राजा ही साक्षात् ईश्वेरअवतार है तो जाहिर है तब इंसान, हिंदू मानव, हिंदू प्रजा को उसी की अकेली पटरी पर चलना है। वह क्यों बुद्धि खपाए?वह उचित-अनुचित क्यों-क्या सोचे? राजा-धर्म की कैसे चिंता करें? तभी दुनिया से सामना याकि आक्रमणों का सिलसिला शुरू हुआ, सांसारिकता से पाला पड़ा तो राजा जाने, राजा का काम जाने। हिंदू निज धर्म-कर्म की पटरी पर वक्त काटने लगा। खोल में बंद हो, हाईबरनेशन में जा कर रेडिमेड जीवन जीने लगा। कई बारधर्म और हिंदू व्यवहार के क्रमिक विकास पर गौर करते हुए लगता है हम हिंदुओं को प्रारंभ में जो रेडिमेड मिला है उसी की सिंगल पटरी पर हम चलते रहे हैं। जब विदेशी और खास कर दूसरे धर्म की पताका लिए आक्रामक आए तो बुद्धि अपनी राजा-वक्त निरपेक्ष हो गई। सात्विक बुद्धि तब तामसी में बदली। हिंदू जीवन पूर्वनिर्धारित, सुनियोजित जीवन पद्धति अनुसार गंगा के बहाव माफिक बहने लगा।

बहता व्यक्ति बुद्धि पर ताला लगाए हुए होता है। धर्म ने रेडिमेड अंदाज में घुट्टी पिला रखी थी कि व्यक्ति को पुरुषार्थ के लिए अर्थ-काम में जो करना है वह संयम, संतोष, अनुशासन के धर्म व्यवहार में बंधा हुआ हो। यदि अपना राजा है तो उसे राज धर्म की मर्यादा, संयम, सतोष जैसे सतगुणों में जीना है। मतलब प्रजा और राजा दोनों पहले से आक्रामकता के मामले में पाबंद, मर्यादित। यहीं नहीं सबके लक्ष्य में, उनके मकसद में दीर्घायु, यश-कीर्ति, धन-धान्य-ऐश्वर्य, काम भोग, स्त्री, संतति, बल, परोपकार-त्याग-व्यवहार, अनिष्ठ निवारण, मोक्ष की वे कामनाएं भी सर्वज्ञात, जिसके आगे हिंदू को फिर कुछ और सोचने की जरूरत ही नहीं। तभी सब कुछ राम भरोसे रहा। वक्त और काल के अनुसार जो अवतार, जो राजा हुए और जो व्यवस्था बनी वहीं ठीक। तभी लोगों में, प्रजा में ढाई हजार साल सीधा सपाट एक भाव था- होइहे सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ या कोई नृप हो हमें का हानी!

इसलिए मानवता के इतिहास में, मानव व्यवस्था, स्वतंत्रता, अधिकार, राज्य व्यवस्था के मामले में हमारा मामला विचित्र और निराला है। जीवन जीने की पद्धति और धर्म-कर्म, समाज-परिवार व्यवस्था सबके लिए आइडिया, निर्देश, व्यवस्थाएं पूर्वनिर्धारित हैं। हिंदू के पुरुषार्थ में, धर्म की उपधाराओं में सामान्य धर्म, राज धर्म, स्त्री धर्म, दांपत्य धर्म, वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, आपाद धर्म के अलग-अलग कर्तव्यों में राज धर्म में जहां राजा के कर्तव्य हैं तो निश्चिंतता के साथ यह भी समझाया हुआ है कि राजा सार्वभौम व ईश्वरीय अवतार है इसलिए उस पर सवाल न हो। उससे अधिकार न मांगा जाए। उसके साथ जीना-मरना है। वह अवतार, सर्वशक्तिमान और मन का मालिक। राजा जैसे हांकेगा, उसके गड़रिए जैसे चलाएंगे वैसे जनता भेड़-बकरी में अनुशासित होगी। ध्यान रहे पश्चिमी सभ्यता में भी कई राजा अपने आपको भगवान अवतार बताते थे। लेकिन ऐसा वहां राजनीति, पोप की सत्ता को काटने या तानाशाही के औजार के मकसद में होता था, जिससे फिर समाज में नागरिक बनाम राजा के अधिकार की बहस, संघर्ष बनता था। जबकि हिंदू राजा और हिंदू प्रजा के बीच ऐसा कुछ था ही नहीं।

सो, हिंदू की जीवन पद्धति में सब रेडिमेड और पूर्वप्रदत्त घुट्टी है। कर्म, कर्तव्य, राजा, संपत्ति की रक्षा, दंडनीति, मंत्रि परिषद्, ब्राह्मण सलाह, वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, अश्वमेध यज्ञ, सभा-समिति आदि तमाम बंदोबस्त एक तरह से अपनी सीमा के, अपने वक्त के, अपने कुंए की रचना में बने हुए थे। वह अच्छा था तो घातक इसलिए कि वह कुंए से बाहर की दुनिया के भान के बिना जीवन था। नतीजतन जब विधर्मियों के हमले शुरू हुए तो सूझ नहीं पड़ा कि कैसे आक्रमणों को रोका जाए? बदले वक्त की चुनौतियों का कैसे सामना हो?

बात क्योंकि तीन हजार साल के जाग्रत इतिहास की है इसलिए दो-चार अपवाद  वाले राजाओं से हमेंपूरे इतिहास को नहीं झूठलाना चाहिए। हिंदू इतिहास में कितने ऐसे राजा हुए हैं, जिन्होंने अपनी सीमाओं से बाहर निकल, अपने कुएं से बाहर निकल अपना साम्राज्य बनाया? तामसी बुद्धि ने कभी वक्त की अग्रिम तैयारी होने ही नहीं दी। वक्त की चुनौती आई तो धर्म की रेडिमेड व्यवस्थाएं भरभरा कर खत्म और औसत हिंदू विदेशी आक्रामक की ताबेदारी करता मिला। अकबर दीने इलाही का अवतार हो गया। बहू-बेटी का रिश्तेदार हो गया! जैसा बालकृष्ण भट्ट ने सवा सौ साल पहले लिखा– हिंदू धर्मवृक्ष के मूल को सींचना भूल गए व डाली और पत्तों को सींचने लगे।..स्वेत्वप रक्षा, स्वहत्वाेभिमान आदि मूल तत्वों को छोड़ बैठे।

इस सबमें किस पर ठीकरा फोड़ें? बुद्धी का क्या हो? कल और विचारेंगे। (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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