बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार

खोखा शरीर, मरघट पर अटका!

जब पृथ्वी कुल मिला कर वस्त्र बदलने का, 84 लाख योनियों में जन्म-मरण का प्लेटफॉर्म है।..तब भला हम हिंदुओं का पृथ्वी पर शरीर-जीवन का क्या मोल? … जन्म के प्लेटफॉर्म नंबर एक और मरघट के प्लेटफॉर्म नंबर दो के मध्य की सीढ़ी से आना-जाना जब ईश्वर प्रदत्त नियति है तो क्यों तो हमें दवा चाहिए, क्यों वैक्सीन चाहिए, क्यों आजादी चाहिए, क्यों हमें विश्वगुरू बनना है?

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भारत कलियुगी-5: हिंदुओं को नंबर एक श्राप धर्म का कलियुगी अध्यात्म है, उसमें जीवन का रचा-पका होना है। मैं अपनी धारणा में इसका प्रारंभ महावीर-बुद्ध काल के आसपास मानता हूं। जाग्रत इतिहास की सुविधा में ईसा बाद के सन् एक की तारीख को चाहे तो विभाजक रेखा मान सकते हैं। उससे पहले सनातनी हिंदू का शरीर-जीव जीना सहज-सामान्य कर्मवाद में था। सनातनी लोग मौलिक, सच्चे बुद्धिमना थे और जीवन के अनुष्ठानों में जीते हुए थे। लेकिन….न जाने कौन सी घड़ी, कौन सा संक्रमण काल था….जो सनातनी, सत्यवादी जीवन ठिठका। जीवन-शरीर और सांसारिकता पर दुख-कष्ट हावी हो गए।…तब शरीर-जीवन बेकार, निस्सार लगने लगा। शरीर के सुख, विकास और पौरूष-आनंद में जीना निरर्थक, भोगवादी माना जाने लगा।…आत्मा और परलोक के ख्यालों में खोने लगे।… निर्वाण, बुद्धम शरण गच्छामि का सिलसिला शुरू हुआ तो बाद की उथल-पुथल, विदेशियों के हमले और हजार साल की गुलामी, भय-लाचारगी-भक्ति के कड़ाव में उबलते गए। भरतवंशी सनातनियों का जीवन दर्शनपरलोक की चिंता करता हुआ हो गया!

नतीजतन कलियुगी हिंदू जीवन इस अध्यात्म पर जा टंगा कि ‘सुख-दुख, लाभ-हानि, विजय-पराजय सब ईश्वर की माया है। मनुष्य ना तो मरता है और ना जन्म लेता है। आत्मा अमर है। शरीर जन्मता है, मरता है। सांसारिक लोभ-माया छोड़ो, शरीर की चिंता छोड़ो आत्मा के दर्शन करो तो ईश्वर के दर्शन होंगे। शाश्वत तत्व आत्मा है। जैसे पुराने कपड़े की जगह नए कपड़े पहनना होता है वैसे आत्मा एक शरीर की मौत के बाद दूसरे शरीर में जन्म पाती है।’

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इस प्रवचन को अब इक्कीसवीं सदी में सन् 2021 की महामारी में हिंदुओं की मौत पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कहे में देखें-…. ‘जो चले गए वो एक तरह से मुक्त हो गए,….ये जीवन मरण का चक्र चलता रहता है, जैसे मनु्ष्य मैले और पुराने कपड़े त्याग कर नए कपड़े बदलता है, वैसे पुराना शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करके आता है।’ तब भला हम हिंदुओं का पृथ्वी पर शरीर-जीवन का क्या मोल? कुछ नहीं।

जब पृथ्वी कुल मिला कर वस्त्र बदलने का, 84 लाख योनियों में जन्म-मरण का प्लेटफॉर्म है। जन्म के प्लेटफॉर्म नंबर एक और मरघट के प्लेटफॉर्म नंबर दो के मध्य की सीढ़ी से आना-जाना जब ईश्वर प्रदत्त नियति है तो क्यों तो हमें दवा चाहिए, क्यों वैक्सीन चाहिए, क्यों आजादी चाहिए, क्यों हमें विश्वगुरू बनना है? और क्यों मुसलमान, गोरों आदि की चिंताएं करनी चाहिए? जब देववाणी है कि हमारा स्थायी-चिरंतन-सनातनी अस्तित्व है तो हिंदू क्यों मुसलमान को ले कर फिक्र करे कि उनकी संख्या बढ़ रही है…. उनसे कैसे मुक्ति पानी है?…हम मुसलमानों से, दूसरी सभ्यताओं से तब क्यों खतरा महसूस करते हैं, जब यह गारंटी प्राप्त है कि हिंदू आत्मा से अजर-अमर है और बार-बार शरीर-जीव रूप पाते रहेंगे?

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मैं वर्तमान के कुतर्कों में भटक रहा हूं। मूल बात है कलियुगी हिंदू धर्म, दर्शन, प्रवचनों में शरीर खारिज है। अपने सनातनी चिंतन में चार्वाक ऋषि, स्वामी विवेकानंद, आचार्य रजनीश जैसे गिने-चुने चंद ही विचारक हैं, जिन्होंने मनुष्य जीवन, पुरुषार्थ, कर्म, शरीर की चिंता का अलग-अलग तरह से आग्रह किया। जैसे विवेकानंद ने कहा कि शरीर रूपी मंदिर में आत्मा है तो शरीर को स्वस्थ रखना है। लेकिन इन छुटपुट विचारों से न तो गंगोत्री बनी और न लोक व्यवहार।

आगे बढ़ें उससे पहले सार संक्षेप में जानें कि सनातनी लोगों का सतयुग मनुष्य की बुद्धि खुलने, मानसिक चेतना के विन्यास से था। विचार, कविता व दर्शन से भरतवंशियों ने जीवन जीने की पद्धति याकि धर्म बनाना शुरू किया। पृथ्वी पर भरतवंशियों के पूर्वजों ने ही सर्वप्रथम शरीर, जीवन व उसके प्रकृति-ईश्वर से रिश्ते बूझे। बाकी सभ्यताओं में यह काम बहुत बाद में हुआ। ऋषियों ने वेद रचे। स्मृतियां बनीं। पहला वेद ऋग्वेद था, जिसमें न मूर्तिपूजा का उल्लेख है और न ब्रह्म का अर्थ आत्मा के रूप में है। ब्रह्म शब्द यज्ञ का अर्थ लिए हुए था। मतलब मनुष्य और ऋषि-मुनि-ज्ञानी यज्ञ (कर्म, संकल्प) आह्वान से देवताओं को, प्रकृति की शक्तियों को साधते थे। ऋषि भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर उतार लाए (या ऐसे अन्य आह्वान, खोज) तो ऐसे संकल्पों का मकसद शरीर, जीवन को सुखमय, सार्थक बनाना था।

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नोट रखें सनातनी धर्म में बौद्धिक विचार का मूल वेद है। वेद मतलब बीज, जिसे आगे अंकुरित कराने में यज्ञ आदि के लिए ‘ब्राह्मण’ ग्रंथों का तना फूटा। लेकिन उसमें पंडितों के बनाए विधि-विधान, कर्मकांडों की बहुलता थी तो वटवृक्ष का फैलाव कांटे लिए हुए था। शायद तभी आगे उपनिषदों की रचना हुई और पेड़ पल्लवित हुआ लेकिन कांटों को रोकने के लिए शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि आदि पर विचार होते हुए भी इन उपनिषदों में ब्रह्म के आत्मा रूप पर विचार बढ़ा और जीवन में संन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि का महत्व प्रारंभ हुआ। तब यह बहस गहरी थी कि आत्मा और शरीर एक है या अलग-अलग? ध्यान रहे मूल ऋग्वेद में आत्मा, पुनर्जन्म नहीं है और न ही कर्म को भाग्य-नियति में बंधा बताया गया है। उसमें आदमी बेफिक्री, मुक्तता, सत्यता से कर्म का कर्ता है।

वह सत्य आगे के ग्रंथों में कमजोर हुआ। धर्म-दर्शन का वह वक्त जीवंतता, बहस, शास्त्रार्थ, अलग-अलग विचारों का था। एक-एक बिंदु पर बारीक बहस और मतभेद थे। तभी पश्चिमी विचारकों-विद्धानों ने वेद-उपनिषद काल पर कम हैरानी-आश्चर्य नहीं जताया है। इसके एक प्रतिनिधि वाक्य में टीएस एलियट के इस कहे पर विचार करें- भारतीय दार्शनिकों की विचारों में बारीकियों को देखें तो यूरोप के अधिकांश दार्शनिक स्कूली बच्चे लगेंगे। (Indian philosophers subtleties make most of the great European philosophers look like school boys.)

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जाहिर है जितने सनातनी ऋषि-मुनि-विचारक-भगवान (आखिर गंगा की महत्ता समझने वाले ऋषि भगीरथ को भगवान से कम क्यों मानें!) थे वे सब खुली आजादी के साथ बुद्धि और ज्ञान की सत्य गंगा में बहते हुए थे। वह विस्मयजनक था। (तभी टीएस एलियट की कविताओं The waste land, Four Quartets आदि में जानकारों ने सनातनी विचारों की छाप बूझी है।)

मैं भटक गया हूं। पते की बात है कि ऋग्वेद काल से उपनिषद् काल के मध्य के सनातनी विचार मंथन में शरीर से आत्मा के अलग अस्तित्व और भाग्य के अधीन कर्म-जीवन होने का मसला बहस का मुद्दा था। ईश्वरप्रदत व्यवस्था-आदेश नहीं। बहस में भाग्य को नकारने वाले चार्वाक ऋषि ने आत्मा और शरीर को एक-दूसरे का पर्याय बताया है। जो शरीर वहीं आत्मा। इसलिए परलोक, मौत बाद की चिंत का मतलब नहीं। हां, इस विचारधारा अनुसार यदि कोई मनुष्य, शरीर ज्ञान-कर्म से कुछ खास कमाता-पाता है तो शरीर विशेष की खूबी मतलब मनस, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय में बना वह योगदान उसकी आत्मा है। जो शरीर के साथ खत्म हो जाती है। आत्मा के अमरत्व की बात फालतू है। मगर बाकी ऋषियों (विशेष कर कर्मकांडी-ब्राह्मण व गुरूता बनाने वाले) ने इस व्याख्या को बहुसंख्या से नास्तिक करार दिया। नतीजतन चिंतन की यह धारा न केवल सूखी, बल्कि इसके बाद आत्मा का विचार ही सनातनी धर्म, जीवन, शरीर की धुरी बनती गई।

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सवाल है इतना सब कुछ लिखने, इतनी गहराई में जाने की जरूरत क्यों है? इसलिए कि मसला 140 करोड़ लोगों के देश और हिंदुओं के जीवन, उनके शरीर की गरिमा, मान-सम्मान का है। हम शरीर को, जीवन को पृथ्वी के सुखी-सभ्य-विकसित जीवन जैसा जीने मतलब पूर्णता से जीवन जीने के अधिकारी हैं या नहीं? क्या हम 84 लाख योनियों में जानवरों के विभिन्न जन्म की भाग्य और नियति की सोच में लगातार नियति में ही बंधे रहें या यह विश्वास बनाएं कि शरीर उस वैभव, अनुभव का मौका है, जिसे दिमाग, दिमाग की चेतनता में जीना ही असल स्वर्ग है!

इसलिए आज और दो हजार साल से हम सनातनियों का (जो बाद में हिंदू कहलाए) नंबर एक विचारणीय मसला यही होना चाहिए कि जीवन पर सोचें तो कैसे सोचें, समझें तो कैसे समझें? हिंदू का शरीर, दिमाग-बुद्धि सब इस झूठे कलियुगी प्रवचन से कुंद-मंद-विकलांग है कि सोचो नहीं क्योंकि सोचने का काम अमूर्त आत्मा और ईश्वर का है और शरीर की जरूरत, बुनावट, जीवन जीने के सत्य, ऑक्सीजन, सांस, भूख, भोजन, सेक्स की मोह-माया-भोग में फंसना नहीं है। सचमुच आज हम पूरी तरह धर्म-धर्मगुरूओं के प्रवचनों से माया-प्रवंचनाओं में मुक्ति पाने या कि मोक्ष याकि जीवन बाद के परलोक की चिंता याकि मरघट ओरिएंटेट हुए पड़े हैं। प्रवृत्ति, निवृत्ति, नियति सबमें भाग्य, राम भरोसे हैं और मौत का मामला कपड़े बदलना!

ऐसा सदियों से हुआ चला आ रहा है! जैसा मैंने पहले लिखा कि कलियुग में गंगा का शववाहिनी बोझ स्थायी है तभी मामला असामान्य है। सतयुग का जिंदादिल शरीर और जिंदा कौम यदि मुर्दा जीवन और मौत-मरघट के खूंटे में लटक वर्तमान, आज पर सोचने-समझने तक को तैयार नहीं है तो मनुष्य होने का भला अर्थ ही क्या है! इसलिए कल फिर बूझूंगा कि इतिहास के किस मोड़ में हमारा मुर्दा जीवन बनना शुरू हुआ! (जारी)

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ममता ने मोदी पर किया हमला

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जम्मू कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला किया है। जिस समय राज्य की पार्टियों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक चल रही थी उसी बीच उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध किया और कहा कि इसे हटाने से दुनिया में भारत की बदनामी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अनुच्छेद को हटाना कश्मीरियों की आजादी छीनने के बराबर है।

केंद्र सरकार पर हमला करते हुए ममता बनर्जी ने कहा- जिस तरह से वैक्सीन के लिए देश की बदनामी हुई, उसी तरह अनुच्छेद 370 हटाने पर भी देश की बदनामी हुई है। प्रधानमंत्री की मीटिंग के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा- क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू कश्मीर के लोगों को बुला कर कश्मीर पर मीटिंग कर रहे हैं। राज्य का दर्जा वापस लिए जाने की क्या जरूरत थी। लोगों को पहले आजादी चाहिए। आपने आजादी छीन ली। ये फैसला देश के किसी काम नहीं आया और दो साल तक जम्मू कश्मीर में कोई टूरिस्ट भी नहीं जा पाया है। देश की बहुत बदनामी हुई है।

ममता बनर्जी केंद्र सरकार और भारतीय जनत पार्टी पर हमला जारी रखते हुए कहा- भाजपा हर किसी को एंटी नेशनल बोलती है और खुद को ही नेशनलिस्ट बताती है। जो भी आवाज उठाने की कोशिश करता है, उसे एंटी नेशनल और टेररिस्ट घोषित कर देती है। जो लोग देश के लोगों को एक वैक्सीन भी नहीं दे सकते हैं। लाशें गंगा में बहती रहती हैं, उनका रिकॉर्ड भी मिटा देते हैं, वो इतनी बड़ी-बड़ी बातें कैसे करते हैं?

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