nayaindia Indian Democracy and Journalism माई-बाप सरकार की पालतू प्रजा
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माई-बाप सरकार की पालतू प्रजा और पत्रकारिता!

Indian Democracy and Journalism

भारत का लोकतंत्र जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा नहीं है, बल्कि शासक के लिए जनता द्वारा अपने हाथों अपने पर शासन बनवाने वाला है। जनता और उसकी आजादी के पंख माई-बाप सरकार के यहां गिरवी हैं। उसके 140 करोड़ लोग बंधुआ व आश्रित हैं। पिंजरे में बंद 80 करोड़ लोग फ्री के दाना-पानी पर वैसे ही निर्भर हैं, जैसे पिंजरे में बंद पक्षी होते हैं। भारत की प्रजा आश्रित है। भूखी है। मोहताज है। असुरक्षित है और दिन-रात पूजा-पाठ-चढ़ावे, भक्ति, कीर्तन में बंध कर यह प्रार्थना करते हुए जीती है कि शासक की कृपा होगी तो मजदूरी मिलेगी, नौकरी मिलेगी, राशन मिलेगा, सुरक्षा मिलेगी और विश्वगुरू हो जाएंगे! Indian Democracy and Journalism

कोई माने या न माने अपना मानना है कि भारत के हम लोग और पंडित नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी का हमारा नेतृत्व बिना इस समझ के था और है कि लिबर्टी, आजादी की आत्मा को भ्रष्ट-कलुषित बनाने का नाम है माई-बाप सरकार। माई-बाप याकि कथित जनकल्याणकारी सरकार रियलिटी में जनता को गुलामी की घुट्टी है। नागरिकों पर शासन का रोलर है। वह जनता को मुफ्तखोर बना उसे पिंजरे का पालतू बनाती है। लोगों को निर्भर, भक्त और गुलाम बनाती है। माई-बाप सरकार मतलब व्यक्ति की आजादी-आत्मसम्मान-पुरुषार्थ के सभी पंखों को बांधना। लोकतंत्र को उस पिंजरे में तब्दील करना, जिससे प्रधानमंत्री, अफसर, हाकिम, व्यवस्था प्रबंधक येन केन प्रकारेण प्रजा को पालतू तोते की तरह बनाए रखे।

इस सत्य को हम गुलामी के डीएनए में बुने दिल-दिमाग के चलते बूझ नहीं पाते हैं। तभी हम अंग्रेजों के राज बनाम 1947 के बाद के 75 साला अनुभव की समानताओं को देख-समझ नहीं पाते। यह सत्य हमारे गुलाम दिमाग को झिंझोड़ता नहीं है कि जनता आज भी वैसे ही शासित (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858, 1935, सीआरपीसी, आईपीसी, भाषा, शिक्षा आदि से) है, जैसे अंग्रेजों के वक्त थी। केवल चेहरे बदले, गोरों की जगह काले अंग्रेज कुर्सियों पर बैठे और विदेशी की जगह देशी नेता-हाकिम सत्ता पर काबिज हुए पर ये प्रजा पर शासन, उसको हांकने की वैसी ही रीति-नीति और आत्मा लिए हुए हैं, जो अंग्रेजों की थी।

कितना त्रासद है यह! तभी भारत का लोकतंत्र जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा नहीं है, बल्कि शासक के लिए जनता द्वारा अपने हाथों अपने पर शासन बनवाने वाला है। जनता और उसकी आजादी के पंख माई-बाप सरकार के यहां गिरवी हैं। 140 करोड़ लोग बंधुआ व आश्रित हैं। पिंजरे में बंद 80 करोड़ लोग फ्री के दाना-पानी पर वैसे ही निर्भर हैं, जैसे पिंजरे में बंद पक्षी होते हैं। भारत की प्रजा पंख लिए आजादी से उड़ते हुए नहीं है। वह आश्रित है। भूखी है। मोहताज है। असुरक्षित है और दिन-रात पूजा-पाठ-चढ़ावे, भक्ति, कीर्तन में बंध कर यह प्रार्थना करते हुए जीती है कि शासक की कृपा होगी तो मजदूरी मिलेगी, नौकरी मिलेगी, राशन मिलेगा, सुरक्षा मिलेगी और विश्वगुरू हो जाएंगे!

यह सब हम हिंदुओं की इतिहास रचना से है। हिंदू हजार साल की गुलामी में जीने की वह आदत, वह दिल-दिमाग पाए हुए है, जिससे सुध ही नहीं कि आजादी क्या होती है! हमारी बुद्धि आस्थाओं की बंधुआ है। भक्ति से अपहृ्त है। झूठ से सिकुड़ी हुई है और सत्य-साहस की बिना अकुलाहट के है। दिल-दिमाग दोनों डर, भयाकुलता में सिकुड़े और कंपकंपाते हुए हैं। वे पूर्वजों के लिखे दोहों, वाक्यों, सूत्रों की गांठों में बंधे हुए हैं। हमारे दिल-दिमाग यह समझ ही नहीं सकते कि बुद्धि और वक्त की जड़ता में जीना भेड़-बकरी समाज की धड़कन है न कि इंसान की।

 सचमुच सोचें कि भारत के 140 करोड़ लोगों में से कितने लोग आजादी का अर्थ जानते हैं? ये मानव गरिमा का क्या अर्थ समझते हैं? कितने लोग यह फर्क बूझ सकते हैं कि फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन के लोग लिबर्टी, आजादी के पंख ले कर आविष्कारों, विचारों, मौलिक चिंतन-मनन-मंथन, नोबेल पुरस्कार, ओलंपिक गोल्ड मेडल की दास्तां यदि बनाए हुए हैं और ठीक विपरीत हम यदि नकल-जुगाड़ में पिंजरे वाला जीना लिए हुए हैं तो ऐसा होना क्या आजादी और गुलामी के फर्क से नहीं है?

दरअसल हम भारतीय दिल्ली सल्तनत के राजाओं, बादशाहों, विधर्मियों के आगे हजार साल क्योंकि सरेंडर रहे हैं तो वैसे ही अब भी सत्ता की लाठी, उसके अवतारों के आगे सरेंडर रहना आदत के कारण है। सत्ता का मौजूदा रूप भले लोकतंत्र या जनकल्याणकारी सरकार का जुमला है पर वह माई-बाप सरकार की रियलिटी वाला है, जिसमें सब कुछ सरकार आश्रित। इसमें तंत्र पहले है और लोक बाद में। राजा और तंत्र को नागरिकों की बुद्धि और आजादी सब सुपुर्द है। हम हिंदुओं का यह आदि धर्म सूत्र है कि उसका राजा भगवान विष्णु का अवतार है। इसलिए उसे अपनी बुद्धि और आजादी दोनों समर्पित। यह समर्पण आस्था से हो या मजबूरी से लेकिन वह है स्थायी। मतलब कोऊ नृप हो हमें का हानीके भाव में या यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्के सभी भावों में भगवानजी ही हम हिंदुओं के उद्धारक थे, हैं और रहेंगे फिर भले वे नेहरू के अवतार में हों या नरेंद्र मोदी के! 

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तो वंशानुगत राजा हो या विधर्मी का तलवार वाला राज या लोकतंत्र में वोट के जरिए बना प्रधानमंत्री सबके आगे नागरिकों की नियति सुपुर्द! उसको नागरिक की बुद्धि और आजादी समर्पित। तब भला आधुनिक काल में बुद्धि और उसकी आजादी में सत्य जानने-पढ़ने-विचारने-लिखने-खोजने व इसके लिए जरूरी हिम्मत या लड़ने का संस्कार कैसे बन सकता है? हमें जरूरत ही नहीं है बुद्धि और सत्य की।

गौर करें अपने इस पूर्वजी सारसूत्र पर कि पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। अब मैं इसका यदि यह अर्थ निकालूं तो गलत नहीं होगा कि हमारा बुद्धि और पोथी से भला क्या सधना है? आजादी से पंख फड़फड़ा कर सत्य के लिए बुद्धि को उड़ने की भला क्या जरूरत? सोचने-लिखने की जरूरत ही क्या? भक्ति करो, प्रेम करो और भगवान, अवतार, बादशाह, प्रधानमंत्री, मंत्री, हाकिम, अफसर, शहर कोतवाल, डीएम-कलेक्टर सभी 32 करोड़ अवतारों को प्रजा भक्ति भाव से चढावा चढ़ाती जाए तो माई-बाप सरकार की कृपा बनेगी, जुगाड़ बनेगा। विकास होगा। मंदिर बनेंगे। शौचालय बनेंगे। चंद्रयान बनेंगे। बुलेट ट्रेन चलेगी। महामारी में टीका लगेगा। फ्री अनाज मिलेगा।… और यहीं सब परम विकास। उपलब्धियों का अमृत कलश! 

सोचें, आजाद भारत के इस आधुनिक सत्व-तत्व पर!

इसलिए भारत में बुद्धि, ज्ञान-विज्ञान, अकादमिक श्रेष्ठता, विचार-मंथन-चिंतन-रिसर्च याकि सत्यखोज की उड़ान, अभिव्यक्ति की आजादी, सृजनात्मकता, प्रेस और मीडिया का आजादी से उड़ना संभव ही नहीं। इसके नाम पर जो है वह छल है, नकल है, जुगाड़ है। हम भारतीयों में व उसके शासन में इन जरूरतों की अकुलाहट है ही नहीं। हो भी कैसे? जब पंख पिंजरे के आदि हैं, भेड़-बकरी वाला स्वभाव है तो पिंजरे के दरवाजे भले खुले रहें, पशु-पक्षी बाड़े से बाहर निकल दिन भर घूमते भी रहें लेकिन ले देकर सभी सरकार माई-बाप के दरवाजे, अवतारी राजा की आरती उतारने के लिए सुबह-शाम जमा होंगे ही। ठीया-ठिकाना-पिंजरा जब शासक का है तो 140 करोड़ लोगों की भीड़ में कैसे यह अकुलाहट, यह साहस बन सकता है कि राजा और शासक की ऐसी-तैसी, हम उस पर क्यों निर्भर, हम उसके लिए क्यों ताली बजाएं, उसकी क्यों पूजा करें, उसे क्यों भेट चढ़ाएं, क्यों उसकी बातों में आएं। हम तो आजाद, हम इंसान!  

सोचें, यदि लोग भारत में ऐसा सच्चा सोचने लगें तो क्या होगा? तब अभिव्यक्ति की आजादी सचमुच पूजा-पाठ-कीर्तन-भक्ति से मुक्त होगी। गालियां देना, ट्रोलिंग और झूठ के पशुगत गंदे नाले सूखने लगेंगे और आजाद पत्रकारिता खिलेगी। जनता हिम्मती बनेगी। सत्यगामी बनेगी। अंधविश्वासों से बाहर निकलेगी। अपने आप पत्रकारिता इंसान के उड़ने की कुलबुलाहट, बुद्धि और सत्य की खोज का ठिकाना-माध्यम, बहस बनेगी। लोगों को स्वांत सुखाय-आत्माभिव्यकि का परमधाम प्राप्त होगा। देश की बौद्धिकता निखरेगी और तब होगा विचारों का असली अमृत मंथन।

पूछ सकते हैं क्या पत्रकारिता याकि अभिव्यक्ति की आजादी सचमुच इंसान को बनाने का ऐसा सत्व-तत्व, ऐसा सार है? हां, है और ऐसा कई देशों के उदाहरण से प्रमाणित है।

उन देशों की सूची में भारत नहीं है। तभी आजादी का 75वां साल या अमृत महोत्सव महज एक नगाड़ा है।  यह आजादी पर कुंडली मारे बैठी माई-बाप सरकार का ढोल है। भारत पंखविहीन अभिव्यक्ति की आजादी लिए हुए वह देश है, जो बिना सच्ची पत्रकारिता के है। बिना निर्भयता, निडरता और सत्यता के है! भारत का तंत्र और तंत्र के तंत्राधिपति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजादी का चाहे जितना नगाड़ा, ढोल बजाएं मगर उस ढोल की पोल दुनिया में यह सच्चाई गुंजाती हुई है कि झूठ, असत्य, अंधविश्वास, गुलामी, भक्ति में हम 140 करोड़ लोग वैसे ही जी रहे हैं, जैसे 1947 से पहले की बेड़ियों में जीते थे। उलटे अब अधिक बुद्धिहीनता और दासता इसलिए है कि  75 साल के परिवेश ने उन पंखों को, उन पत्र-पत्रिकाओं, वैसे संपादक-पत्रकार, मनीषियों को पैदा करना ही बंद कर दिया है जैसे 1947 से पहले पैदा होते थे। 1947 की आजादी के बाद के वक्त ने आजादी के संघर्ष के वक्त की उस पत्रकारिता को भी खत्म कर डाला है, जिसमें तिलक, गांधी, सावरकर, डांगे हिम्मत और साहस से अपने विचार जगजाहिर किया करते थे, लोगों को जागरूक और हिम्मती बनाते थे।

तभी आजाद भारत ने सचमुच अभिव्यक्ति की आजादी को पंख नहीं दिए, बल्कि उलटे उसे बांधने के ऐसे-ऐसे जतन किए, लोगों की बुद्धि को ऐसा छोटा, भ्रष्ट, संकुचित बनाया कि किताब में स्वंतत्र विचार की अभिव्यक्त दो-चार लाइन भी बरदाश्त नहीं! न ही दो लाइन का ट्विट बरदाश्त। न व्यंग्य-मजाक बरदाश्त और न कविता-कार्टून और शेरो-शायरी बरदाश्त! सत्य बोलना-सत्य बताना-सत्य देखना सब भारतीयों को आज बरदाश्त नहीं। यदि कोई गहन रिसर्च करे तो तथ्य जाहिर होगा कि अंग्रेजों ने अभिव्यक्ति की, प्रेस की आजादी, संघर्ष-आंदोलन की आजादी में भारतीयों को उतनी संख्या में जेलों में नहीं डाला, उतने देशद्रोह-राजद्रोह के मुकद्दमे नहीं ठोके, जितने पिछले दस सालों में माई-बाप सरकार ने लड़के-लड़कियों-बुजुर्गों को जेल में डाल कर ठोके हैं। तभी पत्रकारिता के हवाले यह सवाल गंभीर है कि पिछले 75 वर्षों में भारत के लोगों ने आजादी और बुद्धि पाई या गंवाई? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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