Journalism meaning of freedom पत्रकारिता और आजादी का अर्थ!
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पत्रकारिता और आजादी का अर्थ!

Journalism meaning of freedom

बुनियादी सवाल है कि भारत के लोगों ने, भारत के संविधान ने इंसानी आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी और पत्रकारिता को सचमुच सशक्त बनाया या उसका फरेब बना कर 75 साल काटे? क्या भारत के लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को पत्रकारिता से सच्चाई, निर्भयता, बुद्धि के संस्कार मिले या नागरिक उलटे झूठ, अंधविश्वास, अंधकार, अचेतन, गुमराह और गुलाम हुए? …यह  तथ्य गांठ बांधें कि पृथ्वी के हर सभ्य-विकसित-इंसानी देश, नस्ल, धर्म, कौम की समृद्धि, उनके विकास की कुंजी सचमुच सत्य की खोज में उड़ने, पढ़ने-विचारने-लिखने की स्वतंत्रता से है। Journalism meaning of freedom

सवाल है कि आजाद भारत के 75वें साल याकी अमृत महोत्सव को यदि पत्रकारिता की आजादी के तराजू में तौलें तो क्या तस्वीर बनेगी? भारत के लोग क्या आजाद समझ आएंगे या अर्ध गुलाम?

पूछ सकते है पत्रकारिता से क्या इतना बड़ा अर्थ निकाला जा सकता है? हां, क्योंकि पत्रकारिता नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी का वह इकलौता, आधुनिक माध्यम है, जिसके पंखों से देश की बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान और सत्य की मंजिल बनती है। कोई माने या न माने अपना मानना है कि इतिहास का पहला सर्वोपरि अनुभव है कि अभिव्यक्ति की आजादी से मानव विकास को पंख मिले। इन्हीं पंखों का आधुनिक माध्यम पत्रकारिता है, जिसके दम से साहस और सत्य का, लिबर्टी का सफर हुआ। इंसान की मंजिल बनी। तभी सोचें, इंसान, कौम, देश बिना सत्य और साहस की पत्रकारिता के यदि है तो वह क्या आजाद कहने लायक है? तब वह इंसानी समाज है या भेड़-बकरी का बाड़ा?

जाहिर है मैं संपादक चेहरों में अपनी जिंदगी के अनुभवों पर लिखते हुए पत्रकारिता की अहमियत में देश का चेहरा तलाश रहा हूं।… उसके मायने बूझ रहा हूं। तभी जिंदगीनामा पर विराम लगा कर फिलहाल आजाद भारत की 75 साला पत्रकारिता के विचार प्रवाह में हूं।

सो लोकतंत्र के चौथे खंभे के नाते भारत में पत्रकारिता खिली या नहीं? वह 140 करोड़ लोगों के लिए ढोंग थी या रियल? वह समाज-देश के लिए अमृतदायी हुई या विषदायी? कैसी है अभिव्यक्ति की आजादी और पत्रकारिता की भारत तस्वीर? इसी में फिर बुनियादी सवाल है कि भारत के लोगों ने, भारत के संविधान ने इंसानी आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी और पत्रकारिता को सचमुच सशक्त बनाया या उसका फरेब बना कर 75 साल काटे? इसी में फिर विचार यह भी होना चाहिए कि अंग्रेजों के संसर्ग में, उनकी गुलामी के वक्त में भारतीयों को प्रेस-मीडिया आजादी की हवा देने वाला था या आजाद भारत की पत्रकारिता? पत्रकारिता की कसौटी में भारत के प्रभु, श्रेष्ठि, एलिट वर्ग की अंग्रेजी पत्रकारिता खरी व बेबाक थी या हिंदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता? क्या भारत के लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को पत्रकारिता से सच्चाई, निर्भयता, बुद्धि के संस्कार मिले या नागरिक उलटे झूठ, अंधविश्वास, अंधकार, अचेतन, गुमराह और गुलाम हुए?

आगे बढ़ें उससे पहले तथ्य गांठ बांधें कि पृथ्वी के हर सभ्य-विकसित-इंसानी देश, नस्ल, धर्म, कौम की समृद्धि, उनके विकास की कुंजी सचमुच सत्य की खोज में उड़ने, पढ़ने-विचारने-लिखने की स्वतंत्रता से है। जो देश इसकी स्वतंत्रता लिए हुए नहीं है वह पिंजरा होगा। वहां लोग बंधुआ होंगे। तोता रटंत, नकल और जुगाड़ में जीते हुए होंगे। इस बीज मंत्र का उगना तभी संभव है जब विचारने, खोजने, लिखने याकि अभिव्यक्ति की आजादी की अकुलाहट व परिवेश का खाद-पानी मिले। इसके बिना देश और कौम दोनों बंजर भूमि। जाहिर है आजाद देश में नागरिक और उनकी व्यवस्था लगातार सत्यगामी रहे, आधुनिक-स्वतंत्रचेता हो तभी सच्ची आजादी है। लोग निर्भयता और सत्यता से जीते हुए हिम्मती व साहसी जिंदादिल हों। जनता में मनमानी-गुलामी-भय को बरदाश्त नहीं करने की चेतना बनी हुई हो। जनता के नाम पर सत्ता पर काबिज हुई सरकार को देश के नागरिक अपनी अभिव्यक्ति की आजादी से सतत जवाबदेह बनाए रखे। उससे सवाल पूछे और सरकार को कटघरे में खड़ा करे।

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Journalism meaning of freedom

ऐसा कहां है? जवाब है हर उस विकसित लोकतंत्र में, जहां मनुष्य की दिमागी फितरत में नागरिकों ने ज्ञान-विज्ञान में आविष्कार-विकास के मौलिक झंडे गाड़े हैं। नोबेल पुरस्कार बटोरे हैं। जिन्होंने बुद्धि बल से मानव को अंतरिक्ष में बस्ती बसा सकने वाला देवता बनाया है।

हां, अमेरिका में, फ्रांस की आधुनिक रचना में, लोकतंत्र की आधुनिक व्यवस्था व उपलब्धियों में पहली जिद्द लिबर्टी की है। फ्रांस की आत्मा का पहला शब्द लिबर्टी है तो अमेरिकी संविधान का पहला संशोधन फ्रीडम ऑफ प्रेस के लिए है!

मतलब इन सभ्य देशों में नागरिक की अभिव्यक्ति में लिबर्टी और फ्रीडम ऑफ प्रेस पूर्णता, एबसोल्यूट टर्म में हैं। तभी गौर करें इससे प्राप्त हुई, इन दोनों देशों की तीन सौ साल की अभूतपूर्व उपलब्धियों पर। सोचें, इन्हें क्यों विचार-ज्ञान-विज्ञान के आविष्कारों का इतना वरदान मिला? इन देशों ने बुद्धि-विचार याकि सत्य की खोज करते हुए मानवता को क्या-क्या दिया? जाहिर है इसकी बैकग्राउंड में पोप की धर्मसत्ता के खिलाफ विद्रोह, अंधविश्वास की जकड़नों से आजादी और यूरोपीय पुनर्जागरण से पांच सौ सालों में बुद्धि के पंख लगा कर उड़ने का सफर है और वहीं मानव की आधुनिक उपलब्धियों की सच्चाई है। यह एक वह दास्तां है, जो आजादी से उड़ने वाले, नई दुनिया खोजने (अमेरिका व पृथ्वी का चप्पा-चप्पा और अब अंतरिक्ष) वाले दिवानों-मतवालों-मेहनतियों-सत्यखोजियों की बदौलत है। इन्हीं का पृथ्वी पर मानवता की आधुनिक उपलब्धियों में 99 प्रतिशत हिस्सा बनता है। यहीं स्वतंत्र-आजादचेता पक्षियों (इंसानों) के मौलिक साहसी सफर का निचोड़ है। 

उस नाते हर कसौटी में इंसान और जानवर में फर्क बनाने वाला नंबर एक जिम्मेवार कारण क्या? कौन सा निर्णायक कारण? एक लाइन का जवाब है व्यक्ति का बुद्धि बल से आजादी के साथ उड़ना और नया-नया खोजना। हम भारतीयों और खासकर हिंदुओं को नोट रखना चाहिए कि खोजना सरकार से, संस्थाओं से, अफसरों से, जजों से, अवतारी राजा से नहीं होता, बल्कि समाज में व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना में सत्य को सतत खोजते रहने की निजी धुन, हिम्मत से होता है। अमेरिकी राष्ट्रपति या सरकार से नहीं हुआ जो नासा और दुनिया आज अंतरिक्ष में बस्ती बसाने, सैर-सपाटे के कगार पर है, बल्कि वैज्ञानिक, कल्पनाशील चिंतकों, दार्शनिकों, तकनीशियनों से हुआ जो संविधान से बने परिवेश की आजादी से लगातार दिवानगी से खोजते-उड़ते रहे। अंतरिक्ष का सत्य जानने के लिए मनुष्य की बुद्धि का आजादी-हिम्मत से उड़ना वैसे ही था जैसे पांच सौ साल पहले यूरोप के खोजी नई दुनिया को खोजने के लिए महासागर पार करते थे।

आप पूछ सकते हैं इस सबमें अभिव्यक्ति की आजादी, पत्रकारिता की कहां तुक? जवाब में यह सत्य जानें कि गैलीलियो ने पंद्रहवीं सदी में अभिव्यक्ति की अपनी आजादी के साहस में सत्य खोजते हुए पोप और ईसाईयों की मान्यताओं को ध्वस्त करने का काम बुद्धि बल से लिख कर जहां करके दिखाया वहीं नई दुनिया याकि अमेरिका का पहली बार अनुमान लगाने वाले अमेरिगो वेसपुकी ने पर्चा (Mundus Novus) लिख आगे के खोजियों का रास्ता बनाया। ये सब पिंजरे से मुक्त, पंख फड़फड़ा कर सत्य के लक्ष्य में उड़ने, सोचने, लिखने और अभिव्यक्ति की सृजनात्मकता से (लेख, अकादमिक जर्नल, किताब, पत्र-पत्रिकाओं और भाषण-संवाद जैसे सृजनात्मक जरियों से) नई दुनिया खोजने-बनाने वाले महामानव थे। मतलब पोप से दुनिया आधुनिक नहीं हुई और न ही बादशाह, राजा या राष्ट्रपति की सत्ता और सत्ता की संस्थाओं से! 

जाहिर है ये गूढ़ बातें हैं, जो हम भारतीयों के पल्ले नहीं पड़तीं। भला भारत में इन बातों का क्या अर्थ! हम इतना भर ही समझ लें तो बड़ी बात कि आजादी के 75 साला सफर में अभिव्यक्ति की आजादी के नागरिक हक और उसके एक माध्यम पत्रकारिता से क्या हम अपने पंख भी फड़फड़ाते हुए थे? क्या ऐसा परिवेश मिला, जिससे आजादी से उड़ कर अंधविश्वासों-झूठ के अंधकार से बाहर निकलने का मौका बना? उजियारों में भीड़ को इंसानी बनने का मौका! 

पूछ सकते है मैं इस तरह समझाते हुए क्यों लिख रहा हूं?

इसलिए कि हम हिंदू सैकड़ों सालों की गुलामी में जीते हुए बने हैं। दिमाग पूरी तरह गुलामी में पका हुआ है। इसलिए सीमाबद्ध यह सोचते हुए भी है कि आजादी में जीना कैसे जीना होता है! इंसान होने की गरिमा क्या है! सत्य क्या है और लोकतंत्र क्या?

हां, हिंदू यदि आज भी प्रधानमंत्री को अवतार, भगवान समझता है, उसके झूठ को पूजता है और उसके दरबार-कलेक्टर-कोतवाल याकि नौकरशाही को नजराना, जुर्माना, शुक्राना अदा करता है तो वह न केवल बिना इंसानी गरिमा के है, बल्कि वह और उसकी बुद्धि बिना आजादी और बिना सत्य को समझे हुए है। वह गुलामी, अंधविश्वास, झूठ, बुद्धिहीनता के उस बाड़े का प्राणी है जो अभिव्यक्ति की आजादी के पंखों से, पत्रकारिता से उड़ नहीं सकता। नतीजतन सत्य को खोज, जान और पा नहीं सकता। (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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