journalism extremely challenging पत्रकारिता खोखली तो देश, आजादी सब खोखली!
बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया| journalism extremely challenging पत्रकारिता खोखली तो देश, आजादी सब खोखली!

पत्रकारिता खोखली तो देश, आजादी सब खोखली!

journalism extremely challenging

आजादी के इतिहास का सर्वोपरि नंबर एक तथ्य है कि लोगों के लिखने से, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, पत्रकारों-संपादकों की कलम से आजादी की जन चेतना बनी। तिलक से लेकर गांधी सबने अखबार-पत्र-पत्रिकाएं निकालीं। तिलक ने लिखा। गांधी ने लिखा। सावरकर ने, वामपंथी क्रांतिकारियों सभी ने लिखा और लोगों ने उसे पढ़ा-सुना। हर भारतीय को याद रखना चाहिए कि भारत की आजादी की लड़ाई के नेतृत्व में 70 प्रतिशत लिक्खाड़-पत्रकार दिवानों का हिस्सा था और बाकी में ज्यादा वकील और उनमें भी कलम लेकर लिखने वाले अधिक!… भारत को आजादी नौकरी करने वाले पेशेवरों, अंग्रेजों की क्लर्की करने वाले आईसीएस-आईएएस-आईपीएस अफसरी जमात या डॉक्टर, इंजीनियर, कारोबारियों, उद्यमियों से नहीं मिली, बल्कि स्वतंत्रचेता कलम के सिपाहियों और वकीलों के कारण मिली। 

पत्रकारिता धंधा नहीं है। न ही संपादकों-एंकरों का देवालय। तब क्या? यह नागरिकों की आजादी, लोकतंत्र की आत्मा और सत्य जानने-खोजने, मनन-मंथन व जन अभिव्यक्ति का यज्ञ-अनुष्ठान है। यदि यज्ञ बिना अग्नि, सत्यता के है तो देश में इंसानी आजादी बुझी हुई। और देश भेड़-बकरियों के बाड़े में कन्वर्ट। नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी इंसान के उड़ने का अधिकार है। देश और नस्ल के सफर का आईना है। वहीं बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान की प्रवृत्तियों का संग्रहण और उनके प्रसारण का लाइव माध्यम। कुल मिलाकर इतिहास की कच्ची खान। वर्तमान का आईना। भविष्य की बुनियाद।

ये बातें भारत में लोगों को बेतुकी लगेंगी। इसलिए कि हमारा सुनना-देखना सोचना कुल मिला कर कुएं की टर्र-टर्र में, गुलामी के आईने में पिंजराबंद है। इसे समझना हो और यदि आप पढ़े-लिखे, हिंदी-अंग्रेजी दोनों को समझते हुए हों तो कभी एक दिन हिंदी की ‘आज तक’ या कोई भी भारतीय चैनल देखें और अगले दिन उतने ही समय ब्रितानी ‘बीबीसी’, जर्मनी का ‘डीडब्ल्यू टीवी’ देखें। या कभी एक साथ ‘इंडिया टुडे’ और लंदन की ‘द इकॉनोमिस्ट’ पत्रिका पढ़ कर तुलना करके सोचें कि दोनों पत्रिकाएं पाठकों की बुद्धि को किधर उड़ा ले जा रही हैं? भारत के मीडिया के आईने में हम लोग कैसे दिखते हैं और ‘बीबीसी’ के आईने से ब्रितानी लोग कैसे दिखते हैं? 

निःसंदेह सोशल मीडिया अब हर जगह है। उससे हर व्यक्ति अभिव्यक्ति की आजादी का माध्यम पाए हुए हैं। लेकिन जैसे सौ-दो सौ साल पहले फर्क था वैसा ही अखबार, टीवी चैनल व सोशल मीडिया के अलग-अलग वक्त के बावजूद गुलाम और आजाद नस्ल के जीने का फर्क जस का तस है। जो लोग पिंजरे में रहने के पहले आदी थे वे आज भी वैसे ही हैं। जो पहले भी भक्ति, गुलामी और मजबूरी में जीते हुए थे वे आज भी वैसे ही जीते हुए हैं। जो पहले असुरक्षित, भयाकुल, चिंताओं में जीते थे वे आज भी वैसे ही जीते हुए हैं। यही स्थिति अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी और पत्रकारिता में भी झलकेगी।

गौर करें भारत की 75 वर्षीय पत्रकारिता पर। सन् 1947 से पहले पत्रकारिता भारत की आजादी की लड़ाई का औजार थी। वह पत्रकारों-संपादकों का जुनून था। अपना मानना है कि अंग्रेजों के संसर्ग, उनकी शिक्षा-दीक्षा से भारत के हिंदू मानस का ब्रितानी आजादी से साक्षात्कार हुआ। उसके जेहन में भी हजार साला गुलामी का ख्याल आया। एक विचार (आजादी का) और उसकी कुलबुलाहट बनी। और यह सभी जानते हैं कि यह कुलबुलाहट कैसे फैली और इससे अंग्रेजों भारत छोड़ो का उद्देश्य कैसे पका? आजादी के इतिहास का सर्वोपरि नंबर एक तथ्य है कि लोगों के लिखने से, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, पत्रकारों-संपादकों की कलम से आजादी की जन चेतना बनी। तिलक से लेकर गांधी सबने अखबार-पत्र-पत्रिकाएं निकालीं। क्रांतिकारी हों या हिंदुत्ववादी सावरकर या मुस्लिम जिन्ना सबने पर्चे, पैम्फलेट, किताब, लेख, पत्र-पत्रिका निकाल कर, अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करके लोगों को जगाया। आजादी के मतवालों-दिवानों का तब न लक्ष्य (मैं मंत्री बनूंगा, पीएम, सीएम या नेता बनूंगा) था न यह फिक्र कि वे सफल होंगे या नहीं! वे सोचते, नारे बनाते, पर्चे लिखते, पोस्टर-बैनर बनाते और अखबार निकाल सामर्थ्य अनुसार पत्रकारिता करते। तिलक ने लिखा। गांधी ने लिखा। सावरकर ने, वामपंथी क्रांतिकारियों सभी ने लिखा और लोगों ने उसे पढ़ा-सुना। हर भारतीय को याद रखना चाहिए कि भारत की आजादी की लड़ाई के नेतृत्व में 70 प्रतिशत लिक्खाड़-पत्रकार दिवानों का हिस्सा था और बाकी में ज्यादा वकील और उनमें भी कलम लेकर लिखने वाले अधिक!

सो, भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष, दो वर्गों पत्रकारों-वकीलों की कमान से। जाहिर है ये वर्ग ही बुद्धि-सत्य की चेतना से कुलबुलाए हुए थे। इन्हीं की बदौलत भारत को आजादी मिली। तथ्य नोट रखें कि भारत को आजादी नौकरी करने वाले पेशेवरों, अंग्रेजों की क्लर्की करने वाले आईसीएस-आईएएस-आईपीएस अफसरी जमात या डॉक्टर, इंजीनियर, कारोबारियों, उद्यमियों से नहीं मिली, बल्कि स्वतंत्रचेता कलम के सिपाहियों और वकीलों के कारण मिली। ऐसा ही इतिहास बाकी देशों की आजादी के संघर्ष का भी है। तभी जान लें दिल-दिमाग की फ्री-थिंकिंग, कुलबुलाहट की धुन में पंख फड़फड़ा कर उड़ना मानव समाज का वह इकलौता कर्म है, जिसके बूते इंसान उड़ते-उड़ते अंतरिक्ष पहुंचा है।

सो, कलम के सिपाही और ब्रितानी लोकतंत्र-संविधान-आजादी के विचारों में पके हुए तब के वकील। क्या इनकी बदौलत पाई गई आजादी का उल्लेख लिखे गए आजादी के भारतीय इतिहास में रेखांकित है? शायद नहीं! क्यों? इसलिए कि 15 अगस्त 1947 को शपथ लेते ही पंडित नेहरू ने अपने को नियति का नियंता और माई-बाप सरकार का अवतार समझा और वापिस हिंदुओं के इतिहास में नए सिरे से सत्तावान-हाकिम महत्व पाते गए। आजादी को माई-बाप सरकार और उसे चलाने वाले आईसीएस अफसरों ने अपहृत कर लिया। कलम के सिपाही, निर्भय योद्धा गांधी साबरमती के संत के नाते उल्लेखित हुए और ऐसे ही बतौर अवतारी राजा नेहरू के आगे बाकी सब याकि बुद्धि-कलम-पत्रकारिता को भुला दिया गया! उसे गौण बना दिया गया। 

तभी भारत की 140 करोड़ लोगों की भीड़ को भान नहीं है कि सन् 1947 से पहले भारत में पत्र-पत्रिकाओं के कौन संपादक-प्रकाशक-मालिक-पत्रकार-संपादक-लेखक थे? और जो थे वे क्यों 1947 से पहले ब्रितानी हुकूमत को हटवाने का आंदोलन करने वाले थे? क्या वह किसी किस्म की नौकरी थी? क्या वह प्रोफेशन था?

नहीं। वह कौम-नस्ल और देश की आजादी के आइडिया में खदबदाई स्वतंत्रता, आजादी से उड़ने की चेतना थी। वह एक विचार (आजादी का), कुलबुलाहट, धुन थी। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और ‘गांधी बनाम लेनिन’ पर्चा लिखने वाले कम्युनिस्ट एसए डांगे, या एमएन राय से लेकर दर्जनों लेख-किताबें लिखने वाले सावरकर या पाकिस्तान के आइडिया का पर्चा लिखने वाले रहमत अली सभी तो लिक्खाड़ थे। ऐसे ही मौलाना अबुल कलाम आजाद का उर्दू फर्रा हो या गणेश शंकर विद्यार्थी, महाशय कृष्ण सहित सैकड़ों आर्य समाजी पत्र-पत्रिकाओं, क्रांतिकारियों के पर्चों ने 1947 से पहले जो किया वह सब आजादी की दिमागी चाहना की कुलबुलाहट से था।

तो सोचना-लिखना क्या हुआ? अभिव्यक्ति की आजादी। और इसका नंबर एक क्या जरिया? पत्रकारिता। वह फिर किसी भी फॉरमेट में हो। 

तिलक और गांधी, सावरकर को भले नेता और विचारक माना जाए लेकिन जान लें उनका वैसा होना तो संपादक-पत्रकार-अभिव्यक्ति की आजादी से था। तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की जरूरत का महत्व निर्णायक है या नहीं?

दुर्भाग्य से इस महत्व, इस रोल की 1947 में आजादी के तुरंत बाद से अनदेखी शुरू हुई। आजादी के ऊपर माई-बाप सरकार, पंडित नेहरू बैठे। और पंडित नेहरू व डॉ. आंबेडकर ने एक ऐसा संविधान बनाया, जिसमें प्रेस की आजादी के जिक्र, उसके स्पेशिफिक अधिकार जनता को देने, उसके सशक्तिकरण में राज्य के दायित्व के निर्धारण को जरूरी नहीं माना। समाचार पत्रों के उसी एक्ट में बाधित-बंधक बनाए रखा, जिसे अंग्रेजों ने भारत के लोगों को गुलाम बनाए रखने, उनकी प्रेस स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था। यहीं नहीं पंडित नेहरू ने उलटे अखबारों के लिए न्यूज प्रिंट के कोटे, सरकारी मान्यता याकि पत्रकारिता को एक पेशा बनाने के वे तमाम जतन किए जैसे पत्रकारिता मानों कारखाना हो और पत्रकार मजदूर। 

attacks journalists in india

Read also यह कैसा भारत बन रहा है?

जाहिर है 1780 में जेम्स अगस्ते हिकी ने बंगाल गजेट के नाम से भारत का जो पहला अखबार चालू किया था वह पत्रकारिता की दिवानगी में एक प्रयास था तो उसके बाद 1947 में भारत की आजादी तक चंद अंग्रेजी एलिट के अखबारों को छोड़ें तो भारतीय भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का अधिकांश प्रकाशन अभिव्यक्ति की छटपटाहट, साहित्यिक भड़भड़ाहट, लिखने-पढ़ने की सात्विक चाहना में था। उसी से अपने आप आजादी की लड़ाई का संघर्ष बना।

यहीं वजह है कि 1947 से पहले देशी भारतीय मीडिया यह कलंक लिए हुए नहीं था कि वह गोरों का मीडिया है जैसे इन दिनों गोदी मीडिया का जुमला चला है। जीडी बिड़ला का ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ हो या गोयनका का ‘इंडियन एक्सप्रेस’ वह अंग्रेजों का पिट्ठू नहीं था, बल्कि स्वतंत्रमिजाजी था। आज या 15 अगस्त 1947 के बाद पंडित नेहरू के वक्त में अखबार और संपादक जिस मुदित अंदाज में प्रधानमंत्री नेहरू के भक्त थे वैसी गोरे लाट साहेब के प्रति भक्ति नहीं थी। 1947 से पहले का भारत मीडिया आर्यन खान या रिया चक्रवर्ती जैसों पर गिद्ध की तरह मंडराने वाली आज जैसी बदनामी लिए हुए नहीं था। तब देश का गरीब, आम आदमी या किसान यह कल्पना नहीं कर सकता था कि गांधी का अखबार उनकी आवाज उठाता हुआ नहीं होगा! या किसान मीडिया पर अविश्वास व नफरत में सोच बैठे कि हमें अपना अखबार निकालना है क्योंकि मीडिया सरकार को बिका हुआ है!

सोचें, सन् 1947 में ऐसा नहीं था और सन् 2021-22 में है तो वजह क्या? इस पर कल। (जारी)

 

Tags :

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
पंजाब विधानसभा चुनाव: अरविंद केजरीवाल मंगलवार को करेंगे आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा, बताई अपनी पहली पसंद
पंजाब विधानसभा चुनाव: अरविंद केजरीवाल मंगलवार को करेंगे आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा, बताई अपनी पहली पसंद