कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर! - Naya India
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कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

कोरोना देवी की पूजा, नरेंद्र मोदी की पूजा कर इन्हें अपना अभिष्ट बना कर सुरक्षा की कामना करना कुल मिला कर कलियुगी अंधकार है, बुद्धि पर ताला है। ऐसा सदियों-सहस्त्राब्दी से है। सो, 21वीं सदी भी हिंदू का ठहरा वक्त है। उसके पास नया कुछ नहीं है। वह अपने पुराने टेंपलेटों में ही भगवान बनाएगा, भक्त होगा, कीर्तन करेगा, प्रसाद बांटेगा और जयकारा लगवाएगा कि बोलो माता कोरोना की.. जय! बोलो भगवान नरेंद्र मोदी की.. जय!

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

कलियुगी भारत-13 : इसे आध्यात्मिकता, धर्म, आस्था, भक्ति क्या मानें कि वक्त जो नाम बनाता है, उसकी मूर्ति, उसका मंदिर बना कर हम हिंदू उसे पूजने लगते हैं? यह खास-स्थायी खूबी है कलियुगी हिंदू की! ऐसा दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगा। यूपी के प्रतापगढ़ जिले में कोरोना माता मंदिर और तमिलनाडु में कोरोना देवी या नरेंद्र मोदी (राजकोट में भी मोदी मंदिर) की पूजा जैसी घटनाएं, खबरें कुल मिला कर सड़े समाज का दलदली दिमाग में धंसा हुआ होना है। सवाल है कोरोना वायरस यदि मार रहा है तो उससे बचने के उपाय में देवी मान कर उसकी पूजा कर निजात पाने का ख्याल दिमाग में कैसे?  इसलिए कि हम हिंदू पहले भी ऐसे ही करते हुए थे। सो, दूसरा उपाय नहीं है। न बदले वक्त, विज्ञान-चिकित्सा का मतलब है और न बचाव के पौरूष का सामर्थ्य।

हम हिंदुओं की सभ्यता भले प्राचीन हैं लेकिन कलियुग के अनुभव में रचे-पके जीवन ने हमें अफ्रीकी जंगलों के ठेठ कबीलाई समाज से गया गुजरा बना रखा है। गंगा और उसके किनारे नदी सभ्यता की भले हम मानवीय धरोहर हैं लेकिन कोरोना, स्पेनिश फ्लू या उससे पहले की तमाम महामारियों में गंगा शववाहिनी का अनुभव यह साबित करने में पर्याप्त है कि बुद्धि-चेतना में कलियुगी हिंदू सचमुच अफ्रीकी कबीलों से अधिक सुषुप्त, असभ्य व जंगली है। कोरोना देवी और नरेंद्र मोदी के मंदिर और पूजा दिमाग की बेसुधी, तालाबंदी और पराश्रित-भयाकुल-अंध भक्ति के कबीलाई मनोविश्व का प्रमाण है।

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

अफ्रीका के महाजंगली कबीलों में भी वह व्यवहार यदि नहीं है, जो भारत में है तो मसला केवल लोक समझ, लोक चेतना, लोक मान्यता का नहीं है, बल्कि डीएनए का है। कलियुगी काल ने डीएनए बदल डाला है। सत्ता-शासन-नियंताओं, धर्मगुरूओं, बुद्धिजीवियों सहित 140 करोड़ लोगों की सामूहिक चेतना इतनी अंधी हो गई है कि वक्त को हम लगातार काले धागे के टोटके से जीते हैं। यह अंतर करना ठीक होगा कि हिंदू के सतयुगी गौरव और कलियुगी पतन का प्रतीक फर्क है जो सनातनी वक्त को हम बेफिक्री, बिना काले धागे के जिंदादिली से जीते हुए थे, जबकि कलियुगी हिंदू डरते-डरते-काले धागे का टोटका बनाए टाइमपास और भक्ति में वक्त काटता हुआ है।

वक्त सच्चाई है जो चुनौतियों, समस्याओं-खुशियों याकि सुख-दुख के ज्वार भाटा से चलता हुआ होता है लेकिन हिंदू जीवन कलियुगी भंवर के पुराने उपाय, टोटकों के झूठ में थमा हुआ है। वह ज्वार और भाटे, समस्याओं और उपलब्धियों में सिर्फ अवतार शरण में रहता है। महामारी है तो कोरोना देवी का अवतार, अच्छे दिनों और मुसलमान से सुरक्षा का ख्याल है तो मोदी भगवान और उनका मन-मंदिर। … कोई गारंटी नहीं कि दोनों से बेड़ा पार लगे लेकिन तब यह पुराना बहाना कि क्या करें भगवानजी की ऐसी ही इच्छा! जैसे रामजी रखेंगे वैसे रहेंगे। जैसे कोरोना देवी रखेगी वैसे जी लेंगे। जैसे मोदीजी रखेंगे वैसे रहेंगे।… वे हमारा भाग्य हैं तो क्यों हम सोचें कि हम जो अवतार मान रहे हैं उससे अकाल मृत्यु संभव है।….सोचना ही नहीं…क्योंकि सोचने का डीएनए कहां है? और यदि वे होते तो क्या सदियों से गुलामी, सेवादारी, कुलीगिरी, भक्ति से जीवन काटते होते!

तभी कोरोना देवी की पूजा, नरेंद्र मोदी की पूजा व  इन्हें अपना अभिष्ट बना सुरक्षा की कामना कुल मिला कर कलियुगी अंधकार है, बुद्धि पर ताला है। ऐसा सदियों-सहस्त्राब्दी से है। सो, 21वीं सदी भी हिंदू का ठहरा वक्त है। उसके पास नया कुछ नहीं है। वह अपने पुराने टेंपलेटों में ही भगवान बनाएगा, भक्त होगा, कीर्तन करेगा, प्रसाद बांटेगा और जयकारा लगवाएगा कि बोलो माता कोरोना की.. जय! बोलो भगवान नरेंद्र मोदी की.. जय!.. या तो रोना या जयकारा।…. स्वभाविक तौर पर जयकारे में पॉजिटिविटी है तो भक्त और जीवित भगवान दोनों चाहते रहते है कि जयकारा बना रहे।… कलियुगी हिंदू के इस अनुभव का सिलसिला अनवरत है। कभी गांधी, कभी नेहरू, कभी नरेंद्र मोदी सब परम पूजनीय! सब अवतारी!

कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

याद करें सन् 2020-21 के उन सभी क्षणों, उन तस्वीरों को, जिनमें भगवान नरेंद्र मोदी राजा दशरथ जैसे प्रजा पालक रूप में कोरोना भगाते हुए हैं। कभी वैक्सीन प्रयोगशाला में अपनी आभा बिखरते हुए….कभी कोरोना खत्म का उद्घोष करते हुए या टीकाकरण महाअभियान के शंखनाद में अवतारी भाव-भंगिमा में श्रीकृष्ण समान उंगली में सुदर्शन चक्र धारे दुश्मन का संहार करते हुए!…. सोचें एक तरफ देवी कोरोना माता और दूसरी तरफ सुदर्शन चक्र लिए नरेंद्र मोदी!… दोनों को लोक छवि, लोक मान्यता में आप चाहे जैसे रखें, चाहे जैसे सोचें लेकिन यह ध्यान जरूर रखें कि महामारी के आगे शेष पृथ्वी पर कहीं भी लोग अंधविश्वासों को मुख्यधारा, गंगा बना कर वैसे बहते हुए नहीं हैं, जैसे भारत में बहते हुए हैं।

क्यों? इसलिए कि बाकी सभ्यताएं उजियारे में, वर्तमान में, ज्ञान-विज्ञान-सत्य और तकनीक में जीती हुई हैं। वे महामारी को पहले दिन से महामारी माने हुए हैं। वे सच्चाई, यथार्थ, रियलिटी में जीते हुए जब नया कोई संकट आता है तो उसके सामने नए अंदाज, नए उपाय खोजते हैं। उनके पास ज्ञान-विज्ञान-सत्य और आधुनिकता है जबकि हमारे पास या तो उसकी नकल है या उसके साथ अंधविश्वास के घोल का जुगाड़ है। वे लोग विज्ञान-सत्य पर विश्वास करते हैं और हम अवतारी राजा के भरोसे रहते हैं। अकेला राजा सर्वज्ञ, वहीं सेनापति, वहीं वैज्ञानिक, वहीं डॉक्टर, वहीं वैक्सीन निर्माता और वहीं विश्व गुरू!

उफ! वक्त और इतिहास की कैसी त्रासदी, जो जिन बातों से कलियुगी हिंदू हजारों साल से पतन, गुलामी के मौत के कुंए में घूमता हुआ है वहीं 21वीं सदी की भी नियति! क्लोज माइंड, बंद दिमाग वाला कुंआ। जिसकी टर्र-टर्र आस्था में चुटकियों में, इक्कीस दिन में महामारी खत्म होने जैसे ख्याल वहीं मौतों के प्रति ठूंठ भाव।

कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

सबके लिए जिम्मेवार कलियुगी मानस का चित्त, वृत्ति और प्रवृत्ति। भारत की चिंतना में सचमुच वर्तमान का मामला मायावी है! वह पूरी तरह अवतार, भक्ति-शक्ति की पुराण कथाओं में जीता हुआ है न कि 21वीं सदी की चेतनता और विज्ञान में। हम जादू-टोनों, ताली-थाली-दीये की ऊर्जा से 21 दिनों में महामारी को भगाने से लेकर, गोमूत्र, काढ़े और गोबर के साथ वैक्सीन के कॉकटेल में ऐसे-ऐसे जुगाड़ बनाते हैं, मानों 21वीं सदी का भान नहीं है और अंत परिणाम रामभरोसे!

मुश्किल है यह विश्लेषण लेकिन सचमुच किसी को करना चाहिए कि बारह महीनों में 140 करोड़ भारतीयों के दिल-दिमाग में, चित्त में विज्ञान-चिकित्सा-वैक्सीन के प्रति पॉजिटिविटी अधिक थी या अवतारी नरेंद्र मोदी के जादू-मंतर, रामदेव की दवाई, काढ़े, गोमूत्र-गोबर उपाय में आस्था अधिक? अपना मानना है कलियुगी हिंदू महामारी के वक्त सम्मोहित, हिप्नोटाइज था और है अपने अवतारी प्रधानमंत्री और अनुभव के पुराने उपायों पर! लोक मान्यता का यह विश्वास गजब है कि हम हिंदू दुनिया के बिरले हैं, जिनके खान-पान से इम्यूनिटी सिस्टम ऐसा तगड़ा है, जो कोरोना का बाप आ जाए तब भी कुछ नहीं बिगड़ेगा!

सो, एक तरफ वर्तमान, सच्चाई, रियलिटी, हाल-फिलहाल के जीवन का यथार्थ वायरस व दूसरी और पुराण काल में जीता माइंड! सोचने का ढंग वह जो पहले था। आचरण धूल में लट्ठ चलाते हुए तो उसके पीछे के विचार में केवल अंधविश्वास व अवैज्ञानिकता।

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

ऐसा नहीं कि दुनिया में दूसरी जगह अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता नहीं है। पश्चिमी सभ्यता के अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी है। बहुत लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी भक्त खासे पुरातनपंथी हैं। बावजूद इसके ज्ञान-विज्ञान-सत्य-तकनीक की वहां क्योंकि लोक समझदारी वाली गंगा है तो बतौर राष्ट्रपति ट्रंप ने भी खरबों डॉलर वैक्सीन रिसर्च-निर्माण में खर्च किए तो उनके उत्तराधिकारी राष्ट्रपति बाइडन भी पूर्ण टीकाकरण से वक्त की चुनौती से पार पाने के लिए अमेरिकियों को समर्थवान बना रहे हैं। मतभिन्नताओं के बावजूद बाकी सभ्यताओं में लोक वैज्ञानिकता का वह मांइडसेट है, जिससे वायरस भेदा जा सका है। ठिक विपरित हमने कलियुगी दिमाग में क्या किया? या तो वायरस को झुठलाया या कोरोना को देवी बना देवालय में बैठाया! (जारी)

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