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‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

कलियुगी हिंदू ने समय को या तो टाइमपास बना रखा है या लकीर को गोलाकार बना कर गोल-गोल घूमते हुए गुजरी तकदीर से वह जुगाड़ की जुगत में है। हमारा वर्तमान फुदकता हुआ नहीं है। भविष्य का जहां सवाल है तो उसमें भी प्राचीन रामराज्य लौटाना है! अन्यथा पंडित नेहरू द्वारा 15 अगस्त 1947 की अंधेरी-आधी रात के देखे सपने हैं। यही नहीं हम सपनों के साथ डेस्टनी, भाग्य भी नत्थी रखते हैं।

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

कलियुगी भारत-9: हिंदू सतयुग की जो नंबर एक खूबी थी वहीं कलियुगी पतन की जड़ है। ऐसा होना त्रासद है। मैंने पहले भी लिखा है कि भरतवंशी ने सतयुग बनाया व्यक्ति को जीवंतता से जीने वाले वेद-मंत्र रच कर। शरीर-जीवन की स्वतंत्रता में लोगों ने, ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को समझा, आह्वान किया और ध्यान-तप-ज्ञान-बुद्धि के पौरूष विचार में समाज रचा। उस जीवन में ईश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म नहीं थे। न ही वक्त-जीवन को नियति, भाग्य में बांधा गया। फोकस व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता, उसकी गरिमा, उसे तेजमान, उर्जामान, गतिमान बनाने पर था। इसके लिए लोगों से प्रकृति के रहस्य याकि सत्य को जानने का आह्वान था। यह मानना गलत नहीं होगा कि ऋग्वेद ने तब गंगोत्री का काम किया। कुछ सदी (या कुछ हजार साल) तक वह सत्यवादी-सतयुगी जीवन की अकेले गंगा थी।

बाद में धीरे-धीरे मनुष्य की आजादी, विचार स्वतंत्रता, जीने के जिंदादिल अंदाज में विचार-ध्यान-तप-ज्ञान की अन्य धाराएं (ब्राह्मण ग्रंथ, कर्मकांड, उपनिषद्, महाकाव्य, पुराण, तीर्थंकर, बुद्धम् शरणम् गच्छामि आदि) विकसित हुई और इनका गंगा में आकर मिलना शुरू हुआ। क्रमशः कर्मकांड, ईश्वर सत्ता, आत्मा-परमात्मा, निर्वाण-मुक्ति का संगम में भंवर बनने लगा। वही संक्रमण काल था और सतयुग का धीरे-धीरे विलुप्त होना था। जीने की मौलिक स्वतंत्रता, गरिमा, तेज, ऊर्जा का आग्रह बंधनों में जकड़ने लगा। फिर नोट करें सनातनी धर्म का मौलिक सत्य जीने की वह पद्धति है, जिसमें न एक ईश्वर है न एक धर्मशास्त्र है और न यह बाध्यता कि अपने को छोड़ो और अपने धर्म अनुसार दुनिया को हरा-सफेद-लाल बनाओ!

भारत कलियुगी-7: कलियुग अपना पक्का, स्थायी!

तभी मानव विकास प्रक्रिया में भरतवंशियों के विकास का मूल शरीर-जीवन की स्वतंत्रता का संस्कार है।….वह बंधक और पराधीन नहीं है…. लेकिन प्राच्य काल का दुर्भाग्यपूर्ण कोई हादसा जो यह सनातनी संस्कार भ्रष्ट, करप्ट हुआ और सब उलटा पुलटा हो गया। जीवन कर्मकांडी, विषाक्त, असफल और बंधक बनने लगा। सतयुग कुम्हला गया। बरगद के तने में झूठ की कलमें रोपित हुईं। सनातनी की प्रतिभा जड़, अवरुद्ध हो गई। भरतवंशी शरीर के जीवाष्म जर्जर होने लगे। दिमाग जड़ जबकि दिल अतीत में अटका और अपनी चिंता में ऐसा भटका कि धर्म, कौम, नस्ल, सभ्यता-संस्कृति सब पर कलियुगी भंवर, ग्रहण का अंधकार छा गया!…

और अंधकार भी ऐसा घना, गहरा मानो ब्लैक होल! शरीर-जीवन को भान नहीं कि अंधकार के साथ हम अंधे भी हो गए हैं। कलियुग में रह रहे हैं लेकिन ज्ञान नहीं है कि कलियुग क्या है! दशा-दुर्दशा का भान है क्योंकि सतयुग की याद-स्मृति से चिपका दिमाग है। बावजूद इसके जीने की नारकीयता, लावारिस जीवन के कारण और इलाज की सुध लेने की दिमाग-बुद्धि में क्षमता नहीं। क्या गजब बात है सतयुग से कलियुग घटित हुआ और कलियुगी जीवन आचरण-व्यक्तित्व का बोध है बावजूद इसके अंधेरे में हमारा शोर है कि दुनिया वालों हम है विश्वगुरू! तुम लोग वायरस से मर रहे हो तो हमसे गोमूत्र, गोबर ज्ञान लो!

भारत कलियुगी- 6: सतयुग से कलियुग ट्रांसफर!

सचमुच फिर विचार करें कि सन् 2020-21 में भारत के हम लोगों ने कोविड-19 की महामारी की चुनौती के आगे अपने ज्ञान का जो घमंड दर्शाया, गोबर कैंप में गोबरवास दिखला कर दुनिया को ज्ञान, जीवन के जो फोटो दिखलाए वह क्या कथित विश्वगुरू की कलियुगी अवस्था का अंधकार प्रदर्शन नहीं था? त्रासद जो ऐसा करना अच्छे दिनों, सतयुगी पास्ट के भंवर के चिपके ज्ञान के हवाले था।

यह अनुभव प्रमाण है हमारे अंधकार, झूठ, मूर्खताओं के कलियुगी नरकवास का!

तभी गंभीर जरूरत कलियुगी शरीर के मनोविश्व (दिल-दिमाग, चित्त, मानस, अंहकार और बुद्धि व अवचेतन) की चीरफाड़, मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी की है। एक शरीर-जीवन की ऑटोप्सी चावल के दाने की तरह बता देगी कलियुगी कौम, नस्ल, सभ्यता और देश का लब्बोलुआब।

भारत कलियुगी-5: खोखा शरीर, मरघट पर अटका!

मैंने पहले तीन सौ सालों की महामारी घटनाओं में भारत के स्थायी सत्य याकि लावारिस मौतों में बार-बार एक से अनुभव की हकीकत में सवाल किया था कि ऐसा क्यों है जो भारत अनुभव दोहराते हुए होता है? पुनरावृत्ति और इतिहास का बार-बार दोहराना भारत में ही क्यों?

इसलिए कि हमने वक्त को हजारों साल पुरानी मान्यताओं, आस्थाओं के समय चक्र में बांधा हुआ है। कलियुगी हिंदू दुनिया की शायद अकेली नस्ल है जो वक्त की हर तारीख-तिथि को पांच-दस हजार साल पुरानी घटना की पुनरावृत्ति मान कर व्रत-उपवास-संकल्प से सोचती है कि जैसे पांच-दस हजार साल पहले फलां को आज के दिन ईश्वर से आशीर्वाद मिला, उसकी मनोकामना पूरी हुई वैसा ही उसके लिए आज की तारीख फलदायी है! ऐसे ही हर दिन आस्था का नाम है, जिसमें मंत्रोच्चार-व्रत-उपवास से फल संभव है क्योंकि अतीत से ऐसा मालूम है।

तभी हिंदू मनोविश्व वर्तमान में नहीं बल्कि भूतकाल में जीता है। हर तारीख, तिथि पास्ट की उपलब्धि, कथा की वह तिथि है, जिसमें मेहनत-तपस्या सावित्री ने करके फल पाया था लेकिन कलियुगी हिंदू यह ख्याल बनाए हुए है कि उस घटना की स्मृति-पूजा से वह भी ईश्वर को आशीर्वाद देने के लिए मजबूर कर देगा। ऐसा सतयुग में नहीं था। तब नित-नए सत्य, नए लक्ष्य बनते थे।

भारत कलियुगी-4: शववाहिनी गंगा और बूढ़ा बरगद!

बात गंभीर और उलझ गई है। मैं फिर पुरानी अपनी उस बात को दोहरा रहा हूं कि पृथ्वी के बाकी लोग, सभ्यताएं वक्त की लकीर पर चलते होते हैं। जो पीछे छूटा वह पास्ट और इतिहास। जहां खड़े हैं वह वर्तमान और आगे के कदम भविष्य की लकीर। मतलब वक्त लकीर है, जिस पर मनुष्य को सीधे चलते हुए जीवन जीना है। पृथ्वी का मानव विकास लकीर पर सतत चलते हुए है। अमेरिका, यूरोप, जापान जैसी सभ्यताओं ने, वहां के लोगों, धर्म ने इसी समझ के अपने मनोविश्व में बुद्धि, ज्ञान-विज्ञान विकास की मंजिल-दर-मंजिल लीनियर लकीर पर आगे कदम हैं। फिलहाल वक्त की लकीर मंगल ग्रह पर मानव बस्ती का सफर बनवा रही है। मतलब सभ्य-विकसित सभ्यताओं का सतयुग इसलिए है कि वहा के व्यक्ति लकीर पर सीधे चलते हुए है जबकि हम कलियुगी हिंदू चलते हुए भी पीछे से चिपके हुए हैं। हमें न वर्तमान जीना आता है और न भविष्य की उमंग है।

भारत कलियुगी-3: बैलगाड़ी से चंद्रयान…फिर भी गंगा शववाहिनी!

कलियुगी हिंदू ने समय को या तो टाइमपास बना रखा है या लकीर को गोलाकार बना कर गोल-गोल घूमते हुए गुजरी तकदीर से वह जुगाड़ की जुगत में है। हमारा वर्तमान फुदकता हुआ नहीं है। भविष्य का जहां सवाल है तो उसमें भी प्राचीन रामराज्य लौटाना है! अन्यथा पंडित नेहरू द्वारा 15 अगस्त 1947 की अंधेरी-आधी रात के देखे सपने हैं। यही नहीं हम सपनों के साथ डेस्टनी, भाग्य भी नत्थी रखते हैं। अंधकार में आधी रात का सपना और सपने के साथ नियति के भरोसे सफर असल में घूम फिर कर कलियुगी अंधेरे के गोले का चक्कर होता है। जहां से चलते है वहीं बार-बार पहुंचते हैं।

आचार्य रजनीश ने इस अजूबे को भारत का कंसेप्ट ऑफ टाइम बताया है। उनके अनुसार समय की हमारी जो धारणा है, वह गलत है। इससे हमारे जीवन का इतना अहित हुआ है जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। हम एक वृत्तीय, एक सरकुलर, एक चक्र में घूमते हैं। और ‘जो कौम ऐसा सोचती है कि समय एक चक्र में परिभ्रमण कर रहा है उस कौम का पुरुषार्थ नष्ट हो जाएगा। उस कौम को कुछ करने जैसा है, यह धारणा भी नष्ट हो जाएगी।’ ..अभी कलियुग है, फिर आएगा सतयुग, फिर आएगा कलियुग और घूमता रहेगा फिर। ऐसे में आपके करने और न करने का सवाल नहीं है, समय के चक्र पर आप घूम रहे हैं और घूमते रहेंगे।

ऐसी सोच ने हम लोगों को वक्त का महज दर्शक बनाया है, भोक्ता नहीं, कर्ता नहीं। और दर्शकों की क्या स्थिति हो सकती है जीवन के मार्ग पर? जिंदगी कोई तमाशबीनी नहीं है कि कहीं खड़े होकर हम तमाशा देखते रहें। जिंदगी जीनी पड़ती है!… जीने की धारणा तब पैदा होगी जब हमें यह विश्वास हो कि कुछ नया पैदा किया जा सकता है जो कभी नहीं था। हम नए को निर्मित कर सकते हैं, हमारे हाथ में है भविष्य। भविष्य पहले से निर्धारित नहीं है, निर्धारित होना है, और हम निर्धारित करेंगे। हमें निर्धारित करना है भविष्य को, आने वाला कल हमारा निर्माण होगा, किसी अनिवार्य व्हील ऑफ हिस्ट्री, इतिहास के चक्र के घूम जाने से नहीं।

भारत कलियुगी-2: महामारी से साबित स्थाई अंधयुग!

समय की इस धारणा ने बकौल आचार्य रजनीश, हमें भाग्यवादी बनाया, फेटेलिस्ट बनाया। गुलामी आई तो हमने कहा यह भाग्य है। दरिद्रता आई तो हमने कहा भाग्य है। हमने प्रत्येक चीज की एक व्याख्या खोज ली कि यह भाग्य है, इसमें कुछ किया नहीं जा सकता।

जो कौम मानती है कि आगे भी वापस वही पुनरुक्त होगा जो पीछे हो चुका है तो उसकी आंखें पीछे लग जाती हैं, आगे नहीं। …भारत की आंखें, भारत के राष्ट्र की आंखें सामने की तरफ नहीं हैं, पीछे की तरफ हैं। हम विचार करते हैं राम का, हम विचार करते हैं महावीर, बुद्ध का। हम कभी विचार नहीं करते आने वाले भविष्य का, आने वाले बच्चों का।….और जो कौम पीछे की तरफ देखने लगती है, उस कौम की आत्मा बूढ़ी हो जाती है, यह समझ लेना जरूरी है। बूढ़े! बूढ़े हमेशा अतीत में खोए रहते हैं।

यदि हम अतीत को ही सदा देखते रहें तो धीरे-धीरे हमारे चित्त में धारणा बनेगी कि हम कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि अतीत में कुछ भी नहीं किया जा सकता। और जिस चीज पर हम ध्यान देते हैं, हमारी चेतना फिर उसी में तल्लीन हो जाती है और एक हो जाती है। हम जो ध्यान करते हैं, जिसका मेडिटेशन करते हैं, उसी जैसे हो जाते हैं।

सचमुच कलियुगी हिंदुओं का जीना वक्त का मारा है। हम अंधेरी गुफा में भटक रहे हैं इसलिए अतीत ही उम्मीद है और उम्मीद यदि पूरी नहीं हो तो भाग्य-किस्मत जिम्मेवार!

भारत कलियुगी-1: अकेले भारत, हिंदू ही कलियुगी!

सतयुग में वक्त की लकीर पर हम चलते, बढ़ते हुए थे। कल्पना करें और याद करें जाग्रत इतिहास में ईसा पूर्व के तीन हजार साल के कैनवस पर। सनातनी धर्म के लोगों की बुद्धि-सत्य उपलब्धि के तब चार वेद लिखे गए थे। आगे बढ़ते हुए फिर ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद्, महाकाव्य, गीता, न्याय, मीमांसा, योग, तंत्र से सांख्य और वैशेषिक दर्शन व चरक, सुश्रुत और वाग्भट की चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा वाग्भट का अष्टांग संग्रह आदि सब वक्त में लगातार आगे बढ़ने की शास्त्रीय उपलब्धियां थीं। ऐसा होना तब के भरतवंशियों द्वारा वक्त की लकीर पर सीधे चलते हुए भविष्य के जीवन की चिंता में क्या नहीं था? भरतवंशी पीछे देखते हुए नहीं थे, आगे बढ़ते हुए थे तभी सभ्यता-संस्कृति की रचना, जीवन जीने की सनातनी पद्धति का विकास हुआ। शरीर की स्वस्थता और चित्त में बुद्धि-स्वतंत्रता के बल से सुख, अर्थ, धर्म, काम के तेज-ऊर्जा की साधना में सोचते-विचारते हम आगे बढ़े, सतयुग बना।

और उस सतयुग की नंबर एक खूबी व्यक्तिगत आजादी में व्यक्ति केंद्रित जीना था। तभी ज्योंहि वक्त का भंवर बना, लकीर को छोड़ कर गोलाकार चक्र के अंधकार में घुसे तो सतयुगी मनुष्य बाहर निकलने के लिए, अपनी मुक्ति के लिए अहम केंद्रित जीवन दर्शन बना बैठा। हमारी फिलॉसफी, हमारा जीवन-दर्शन फिर व्यक्ति को अहम-केंद्रित बनाने वाला हुआ। एक-एक व्यक्ति जन्म-पुनर्जन्म, नियति, मोक्ष की 84 लाख योनियों के समय चक्र का गुलाम हो गया। बेफिक्र, जिंदादिल भरतवंशी आत्मा-परमात्मा-मोक्ष की उस परिक्रमा में जा अटका, जिससे जीवन असार-अर्थहीन हुआ। (जारी)

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Grahan Web Series पर उमड़े संकट के बादल, सिख समुदाय ने की बैन लगाने की मांग

Grahan Web Series

नई दिल्ली । Grahan Web Series : OTT प्लेटफॉर्म डिज्नीप्लस हॉट स्टार पर कल रिलीज होने जा रही वेब सीरीज ‘ग्रहण’ (Grahan) पर संकट के बादल उमड़ आए हैं। ‘ग्रहण’ वेब सीरीज (Grahan Web Series) के खिलाफ लोगों की नाराजगी देखने को मिल रही है। इसे लेकर ट्विटर पर जबरदस्त हंगामा हो रहा है। सिख समुदाय (Sikh Community) के लोग इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। सिख समुदाय ने इस सीरीज से अपनी धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप लगाते हुए इसे बैन करने की मांग की हैं।

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रिलीज पर रोक लगाने की गुहार
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की अध्यक्ष बीबी जागीर कौर ने इसका विरोध करते हुए कहा कि, दंगों की घटनाओं पर आधारित ‘ग्रहण’ वेब सीरीज पर तत्काल बैन लगाया जाए। कौर ने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय से इस वेब सीरीज की रिलीज पर रोक लगाने की गुहार लगाई है।

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उन्होंने कहा कि 1984 के सिख जनसंहार पर आधारित ‘ग्रहण’ वेब सीरीज में एक सिख चरित्र को आपत्तिजनक तरीके से दिखाया गया है। इस सीरीज में एक सिख चरित्र के खिलाफ सिख नरसंहार का आरोप लगाया जा रहा है जो बेहद निंदनीय और मनगढ़ंत है। इस तरह की फिल्में समाज में सांप्रदायिक सौहार्द को भी आहत करती हैं।

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सोशल मीडिया पर विरोध
सोशल मीडिया पर इस सीरीज का विरोध शुरू हो गया है। कई यूजर्स इस सीरीज पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं। कई यूजर तो सेंसर बोर्ड से इसके अप्रूवल पर सवाल तक करते नजर आ रहे हैं।

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